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Ganesh Chaturthi: डूंगरपुर के हलुवावाड़ा गाँव में दाल बाटी और चूरमा के खान पान के अनोखे उत्सव की परम्परा हुई लुप्त

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Ganesh Chaturthi: डूंगरपुर के हलुवावाड़ा गाँव में दाल बाटी और चूरमा के खान पान के अनोखे उत्सव की परम्परा हुई लुप्त

गोपेंद्र नाथ भट्ट की रिपोर्ट

गणेश चतुर्थी आते ही बचपन की मधुर यादें स्मृतियों के सागर में तैरने लग जाती हैं और अनायास ही वे अविस्मरणीय पल सजीव हो उठते हैं जिन्हें हमने कभी बहुत शिद्दत के साथ जिया था।

हमारी जन्म भूमि दक्षिणी राजस्थान के वागड़ अंचल में ऐतिहासिक नगर डूंगरपुर। डूंगरपुर गुजरात की राजधानी गाँधी नगर और अहमदाबाद शहर तथा विश्व प्रसिद्ध पर्यटक उदयपुर से सटा हुआ राजस्थान के सबसे प्राचीनतम शहरों में से एक है।
डूंगरपुर नगर से कुछ ही दूरी पर अहमदाबाद मार्ग पर थाना गाँव से पहले बरसाती नदी के तट पर बसा हुआ है एक छोटा सा गाँव था हलुवावाड़ा। इस गाँव में पटेल किसानों की आबादी बहुत अधिक संख्या में थी। पाटीदार समाज के यह लोग गुजरात के किसानों की तरह ही प्रगतिशील किसान थे। अपने नाम के अनुकूल हलुवावाड़ा गाँव के पटेल भी खाने और खिलाने के बहुत शौक़ीन थे। ये पटेल किसान हर वर्ष गणेश चतुर्थी का बेसब्री से इन्तज़ार करते थे क्योंकि इस दिन गाँव में एक अलग ही तरह का उत्सव होता था। यह उत्सव आज की तरह भव्य गणेश पूजा का उत्सव नहीं होता था बल्कि आतिथ्य सत्कार का अनूठा उत्सव होता था। आत्मीयता से भरपूर और दाल बाटी और चूरमा के खान पान का यह अनोखा उत्सव बेमिसाल था। इस दिन हलुवावाड़ा गाँव के पटेल अपने कर्म कांडी पण्डितों विशेष कर डूंगरपुर के भट्टमेवाड़ा समाज को अपने गाँव में आमन्त्रित कर उनसे दाल बाटी और चूरमा के भोज के लिए पक्की रसोई बनवाते थे तथा भगवान गणेश जी को मोदक का भोग लगने के बाद पंडितों और उनके परिवारों को खिलाते और स्वयं के परिवार और परिजनों को भी खिलाते थे। उस दिन गाँव के हर घर की खपरेल या खलिहान से उठता धुआँ दूर-दूर से देखा जा सकता था।

उस जमाने में गैस के चूल्हे और दाल बाटी के कुकर आदि आधुनिक साधन नही होते थे और पण्डित किसी हलवाई के हाथ का बना खाना भी नही खाते थे। इसलिए सवेरे से ही गाँव में खाने पीने की कच्ची सामग्री और लकड़ी जला कर खाना बनाने वाले ईंटों के चूल्हे तथा गोबर के उपलों तथा कंडों आदि के प्रबंध और शहर से गाँव पहुँच कर पण्डितों के घरों की महिलायें नदी या कुओं पर स्नान आदि के बाद रेशमी पीताम्बर वस्त्र पहन कर अपने पुरुषों और बच्चों के साथ मिल कर खाना पकाने का काम शुरू करते थे। गोबर के उपलों एवं कंडों पर पकती बाटियाँ और चूरमा बनाने के लिए बड़ी बाटियाँ को सेकने के साथ ही गाँव में बने शुद्ध घी से बाटियों को घी से तरबतर करने के बाद घी से भरपूर चूरमा और अन्य व्यंजन बनते थे ।साथ में उड़द चना मूँग आदि की मिली जूली दाल तथा सिल बट्टे पर पीसतीं चटनी तथा गाँव में बच्चों और पशुओं का कोलाहल, खेलकूद, गाँव के खेत खलिहानों की सोन्धी ख़ुशबू, ग्रामीणों का अपनापन और सम्मान आदि सभी दृश्य देखने योग्य होते थे। इस गाँव के पटेल हमारी भुआओं ब्रज बाला और ब्रजललना द्विवेदी के यजमान थे।

हम भाई बहन गणेश चतुर्थी के एक दिन पहले दोनों भुआओं के घर से हलुवावाड़ा गाँव में सपरिवार जीमन में जाने के निमन्त्रण का इन्तज़ार करते थे और कभी निमन्त्रण नही आता तो बहुत निराश हो जाते थे। भुआओं के वहाँ से कभी कभी गणेश चतुर्थी के दिन अल सुबह ही निमन्त्रण आता था तो हमारी निराशा उल्लास एवं उमंग से भर उठती थी। हम दिन भर ग्रामीण जन जीवन, खेत-खलियानों, नदी-नालों, कुओं तथा ग्रामीण खेल कूद का आनन्द लेते और दाल बाटी और चूरमा आदि स्वादिष्ट राजस्थानी व्यंजनों का भरपूर स्वाद और आनन्द लेने के बाद सूर्यास्त होते होते पुनः शहर की ओर प्रस्थान करते थे। इस दौरान हमें अपने बड़े बुजुर्गों से यह सख्त हिदायत मिलती थी कि गणेश चतुर्थी की रात हमें आकाश में चन्द्रमा को किसी हालत में नहीं देखना है क्योंकि यह किवदंती है कि गणेश चतुर्थी के दिन चाँद देखने वालों पर चौरी चकारी का दोष एवं आरोप लग सकता है।

गणेश चतुर्थी की वे यादें आज भी हमारे ज़ेहन में बीतें कल की तरह तरों ताजा हैं। यदि किन्ही अपरिहार्य कारणों से किसी वर्ष भुआओं के वहाँ से हमें गणेश चतुर्थी पर हलुवावाड़ा गाँव जाने का निमन्त्रण नहीं आता तो हमारी मौसी राधिका भट्ट जिनके यजमान निकटवर्ती थाना गाँव में थे, हमारे बुझें मनों को खुश करने के लिए हमें गणेश चतुर्थी के बाद स्कूल के छुट्टी के दिन थाना गाँव ले जाती थी और हलुवावाडा के वंचित आनन्द की डबल पूर्ति करवा वापस शहर की ओर ले कर आती थी।

थाना गाँव की भी अपनी एक ऐतिहासिक कहानी है। यहाँ के साला शाह सेठ एक ऐसा भव्य मन्दिर बनवा रहे थे जिसके शिखर से रात के समय अहमदाबाद के दीये भी देखे जा सके, लेकिन तत्कालीन रियासत क़ालीन सरदारों ने राजा को उसकी चुग़ली कर उन्हें बरगरा दिया कि यदि इतना ऊँचा और भव्य मन्दिर बन गया तो आपसे भी अधिक नाम और सम्मान साला शाह सेठ का हों जायेगा। फिर क्या था!साला शाह सेठ को साज़िश पूर्ण ढंग से मौत के घाट उतार दिया गया। किवंदती है कि मरते समय सेठ ने राजा को श्राप दिया कि “साला शाह .. राजा गड़ेदा ना पारखी यानी आपको असली इंसानों की परख नहीं है वरन गधों की हैं। बताते हैं कि आज हलुवावाड़ा गाँव का अस्तित्व और स्वरूप किसी ओर राजस्व गाँव और डूंगरपुर नगर के विस्तार में मिल कर लुप्त हो गया है या पहले जैसा नही रहा है। वैसे भी शहरीकरण की बाढ़ में गाँवों के अस्तित्व पर मँडरा रहे ख़तरे से भला हलुवावाडा कैसे अछूता रहता। आज गणेश चतुर्थी पर डूंगरपुर के हलुवावाड़ा गाँव में दाल बाँटी और चूरमा के खान पान के अनोखे उत्सव की यह परम्परा लुप्त प्रायः सी हो गई है।

खैर! बचपन की उन मधुर यादों का स्मरण कर आज भी उन दिनों में खो जाने और बचपन के मित्रों के साथ घुलमिल जाने तथा उन जीवन मूल्यों से हर किसी को आत्मसात कराने की मुराद अभी भी जीवन्त हैं!