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झूठ बोले कौआ काटे! जातिगत जनगणना का सवाल, मोदी का भौकाल

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झूठ बोले कौआ काटे! जातिगत जनगणना का सवाल, मोदी का भौकाल

– रामेन्द्र सिन्हा

एक दशक तक चुनावी हाशिए पर रहने के बाद, विपक्षी दलों ने बिहार के जातिगत जनगणना की रिपोर्ट के बहाने भाजपा की हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भौकाल को चुनौती दे दी है। जबकि, सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास का नारा देने वाले पीएम मोदी ने पलटवार करते हुए कहा है कि ‘इस देश में अगर सबसे बड़ी कोई जनसंख्या है तो वह गरीब है, इसलिए गरीब कल्याण ही मेरा मकसद है।’

झूठ बोले कौआ काटे! जातिगत जनगणना का सवाल, मोदी का भौकाल

बिहार की जातिगत जनगणना के निष्कर्षों के अनुसार, बिहार की जनसंख्या 13.1 करोड़ है, जिसमें से 36% अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी), 27.1% अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और 19.7% अनुसूचित जाति (एससी) से संबंधित हैं। कुल मिलाकर, ओबीसी और ईबीसी जनसंख्या कुल जनसंख्या का 63% है, जबकि बाकी जनसंख्या, जिसमें सवर्ण जातियां शामिल हैं, 15.5% है।

रिपोर्ट में जाति सहित 17 सामाजिक-आर्थिक संकेतकों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, और इसमें उप-जातियों का प्रतिशतवार विभाजन भी शामिल है। उदाहरण के लिए, ओबीसी समूह में, यादव 14.26% हैं और राज्य में सबसे बड़ा समूह है। इसके अतिरिक्त, कुल जनसंख्या में अनुमानित 82% हिंदू हैं, जबकि मुसलमान 17.7% हैं।

उधर, पटना साहिब से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद तथा भाजपा के चार विधायकों ने आरोप लगाया कि उनके घर गणनाकर्मी आये तो थे लेकिन न तो घर के मुखिया होने के नाते उनसे जानकारी ली गई और न ही हस्ताक्षर लिया गया। बाहर से किसी से पूछकर कॉलम भर दिया गया। राष्ट्रीय लोक जनता दल (आरएलजेडी) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने भी इसी प्रकार के आरोप लगाए। वहीं, जदयू के प्रदेश महासचिव प्रगति मेहता ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर धानुक जाति के आंकड़ों पर सवाल उठाया है।

बोले तो, सबसे पहले अंग्रेजों ने 1872 में जातिगत जनगणना करवाई थी। जिसके बाद ये सिलसिला लगातार 1931 तक चला था। जिसमें जातियों के हिसाब से आंकड़े जारी किए गए थे। लेकिन आजादी के बाद 1951 में पहली बार आजाद भारत की जनगणना हुई थी। इसमें जातिगत आंकड़ों को सीमित कर दिया गया था। सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को ही शामिल किया गया था। इसके बाद, जनगणना 1961, 1971, 1981, 1991, 2001 और 2011 में करवाई गई।

लेकिन, बताया जाता है कि पीएम मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 2011 में जो जनगणना हुई, उसमें सामाजिक-आर्थिक और जाति के हिसाब से आंकड़े दर्ज किए गए थे। लेकिन इस डाटा को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। यहां तक कि कर्नाटक में भी, सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार, जिसने 2015 में जाति जनगणना की थी, ने सर्वेक्षण प्रकाशित नहीं करने का फैसला किया। 2021 में होने वाली जनगणना को कोरोना के चलते टाल दिया गया था।

झूठ बोले कौआ काटेः

2009 के आम चुनाव में भाजपा को 22% ओबीसी वोट मिले थे, जो 10 साल में दोगुने हो गए। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 44% वोट मिले। वहीं क्षेत्रीय पार्टियों का हिस्सा 2009 के 42% वोटों से घटकर 27% रह गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिन-प्रतिदिन बढ़ती लोकप्रियता और भौकाल कांग्रेस सहित संपूर्ण विपक्ष के गले की हड्डी बन चुका है। भ्रष्टाचार के आरोप में विपक्ष के बड़े-बड़े नेताओं के सलाखों के पीछे जाने का सिलसिला अलग भूत बन कर खड़ा है। मोदी का सवाल है कि देश का माल चोरी किया है तो कहां रहना चाहिए?

झूठ बोले कौआ काटे! जातिगत जनगणना का सवाल, मोदी का भौकाल

यही नहीं, पीएम मोदी ने बिहार की जातिगत जनगणना की रिपोर्ट आने के बाद एक चुनावी रैली में कहा, ‘…कांग्रेस ने एक अलग राग अलापना शुरू कर दिया है। ये कहते हैं- जितनी जनसंख्या, उतना हक। मैं कहता हूं इस देश में अगर सबसे बड़ी कोई जनसंख्या है तो वह गरीब है, इसलिए गरीब कल्याण ही मेरा मकसद है।’ उन्होंने पूर्व पीएम मनमोहन सिंह का बयान जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है, की याद दिलाते हुए यह भी कहा कि अगर जनसंख्या के हिसाब से ही देश के संसाधनों का बंटवारा होगा, तो सबसे बड़ी जनसंख्या वाले हिंदू आगे बढ़कर अपना सारा हक ले लें!

जाति जनगणना के निष्कर्ष जारी होने के तुरंत बाद, कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी भारतीय दलों ने इस कदम का स्वागत किया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी का मानना है कि जातिगत जनगणना हिंदुस्तान का एक्स-रे है। इससे पता लग जाएगा कि देश में ओबीसी, आदिवासी और सामान्य वर्ग के कितने लोग हैं। एक बार आंकड़ा आ जाएगा तो देश सबको लेकर आगे चल पाएगा। ओबीसी महिलाओं को भागीदारी देनी है। सबको भागीदारी देनी है तो जातिगत जनगणना करानी होगी।

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि केंद्र या भाजपा ने हिंदुओं या मुसलमानों के लिए क्या किया है। “सवाल यह है कि उन्होंने एससी और एसटी के लिए क्या किया है? क्या उन्होंने अत्यंत पिछड़ी जातियों को कोई मान्यता दी है।” विपक्ष का मानना है कि जाति जनगणना, सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरक्षण पर लगाई गई 50 प्रतिशत की सीमा को हटाने की राजनीतिक मांग का मार्ग प्रशस्त करेगी।

भाजपा ने जाति जनगणना पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे “आँख में धूल झोंकना” करार दिया। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जाति आधारित राजनीति करते हैं। पिछड़ा वर्ग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है लेकिन नीतीश कुमार ने पिछड़े वर्ग के लिए कुछ नहीं किया है…बिहार के मुख्यमंत्री ने राज्य के विकास के लिए कुछ नहीं किया है”, बिहार भाजपा अध्यक्ष सम्राट चौधरी का आरोप है।

सवाल ये भी है कि सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों के बिना जाति जनगणना के निष्कर्ष क्यों जारी कर दिए गए। सही मायने में समाज में हाशिए पर बैठे लोगों को न्याय तो तभी मिल सकेगा जब सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों के साथ रिपोर्ट प्रकाशित होती। चर्चा है कि सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों के साथ रिपोर्ट पेश होने में करीब डेढ से 2 महीने अभी और लगेंगे। बताया जाता है कि जातियों की जनगणना के मुद्दे को आगामी चुनावों तक जीवित रखने के लिए यह रणनीति अपनाई गई है।

बोले तो, 80 के दशक में जातियों पर आधारित कई क्षेत्रीय दल उभर कर आए। इन दलों ने सरकारी शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण दिए जाने को लेकर अभियान चलाया। इसी दौरान, जातियों की संख्या के आधार पर आरक्षण की मांग सबसे पहले उप्र में बसपा नेता कांशीराम ने की। भारत सरकार ने साल 1979 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने के मसले पर मंडल आयोग का गठन किया।

मंडल आयोग ने ओबीसी को आरक्षण देने की सिफारिश की। इस सिफारिश को 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लागू किया। मंडल आयोग के बाद की राजनीति में विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश में राजद व जदयू बिहार में और सपा उत्तर प्रदेश में ओबीसी मतदाताओं का जबर्दस्त समर्थन पाने में सफल रहे। जबकि, पिछले दशक में पीएम मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने हिंदुओं के बीच एक विविध मतदाता आधार बनाने की कोशिश की है, जिसमें आदिवासियों और दलितों सहित प्रमुख और हाशिए पर रहने वाली जातियां शामिल हैं। मोदी, स्वयं “पिछड़ी जाति” से हैं। उन्होंने ‘सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास’ के नारे के साथ जन कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से जो जनाधार बनाया है, उसे हिला पाना इतना आसान नहीं है।

बोले तो, संविधान के संस्थापकों ने स्वतंत्र भारत में नौकरियों और शिक्षा में कोटा को एक स्थायी विशेषता के रूप में नहीं देखा था। तर्क यह है कि ऐसी कोई भी जनगणना पहले से ही खंडित समाज को और विभाजित कर देगी और असंभव मांगों को जन्म देगी, जिससे टकराव बढ़ेगा। ऐसे में, इस मांग का आधार राजनीतिक प्रतीत होता है, जहां जाति-आधारित पार्टियां चुनावी लाभ के लिए इस मुद्दे को चर्चा का मुद्दा बनाना चाहती हैं। सवाल ये भी उठेगा कि जाति जनगणना की वकालत करने वालों ने अपने शासन वाले राज्यों या केंद्र में सत्तारूढ़ रहने के दौरान सुपात्रों के लिए कितना और क्या काम किया?

और ये भी गजबः

संविधान में अनुच्छेद 246 जनगणना के बारे में है। लेकिन इसमें ये जिक्र नहीं है कि जनगणना कब होगी। कितना अंतर रहेगा। सेंसस ऑफ इंडिया एक्ट 1948 में भी इस बाबत कोई प्रावधान नहीं किया गया है। 1872 के बाद अंग्रेज हर 10 साल में गणना करवाते थे। उसी नियम को अबतक जारी रखा गया है। दुनिया के अधिकतर देशों में हर 10 साल में गणना होती है। लेकिन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में 5 साल पर भी गणना होती है। चूंकि, भारत में 2021 में गणना हुई नहीं है। इसलिए वास्तविक जनसंख्या के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र की ओर से कहा गया था कि जिस हिसाब से भारत की जनसंख्या बढ़ रही है। उस हिसाब से भारत 2023 में चीन को पीछे छोड़ देगा। अभी माना जा रहा है कि भारत की जनसंख्या 142 करोड़ से अधिक हो चुकी है।