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याद आते हैं ठण्ड के वे दिन

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याद आते हैं ठण्ड के वे दिन

डॉ. सुमन चौरे

दीवाली गई और दीया भरकर ठण्ड दे गई। और दिप-दिपाती बातियाँ सब पुरानी यादों को मन मस्तिष्क में जगमगाती चली गईं। भाई बीज के बाद दूसरा बड़ा पर्व आता है आँवला नवमीं। कई वर्ष बीत गए; किन्तु अभी भी साफ़-साफ़ दीखती है भीम सिंग भाई की बाड़ी, उस बाड़ी की आँवळई और आँवळई की धूप छाँव में पूजा करता हमारे कालमुखी गाँव का महिला परिवार भी भूला नहीं जाता। कुल मिलाकर चालीस पचास महिलाएँ और उतनी ही आरतियाँ, उतने ही दीपक और उतनी ही प्रसाद (भोजन) का वैविध्य अब भी याद आता है।

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पलाश की हरी पत्तलों पर जब आँवली माता के लिए भोजन परोसा जाता था, तो लगता था, आँवली माता बहुविध उन व्यंजनों में से एक-एक कौर भी खायँगी तो उनका पेट भर ही जायगा और इस तरह सबका स्वाद आँवलों में आ जायगा। उस समय हमारा बाल-मन ललचाता था कि कब जल्दी से ऐसा ही परोसा हुआ प्रसाद हम बच्चों को भी मिले; किन्तु हमें तो इसके उलटे और भी ज़्यादा कठिन काम मिलता था, इस हिदायत के साथ, कि जब तक पूजा पूरी नहीं हो, तब तक भोजन की रखवाली करते रहना, ताकि कोई कुत्ते या बन्दर आकर कुछ गड़बड़ न कर जायँ।

इस बीच हम समवय भाई-बहन गुप्त रूप से जाँच पड़ताल कर यह ज़रूर देख लेते थे कि सेठानी जीजी के पीतल के साकल-कुन्दे वाले डिब्बे में मावे के गुजिये हैं, तो बिलई वाली माय के टाके के डिब्बे में सेव-पपड़ी है, तो चपटे डिब्बे में अनारसे। बेसन गट्टे हों या फरका बेसन हो या मूँग की दसमी हो या फिर सादी दसमी हो, इस समय इन सबसे हमारा क्या रिश्ता, हम सब जानते थे कि यह पर सब हमें खाने को तभी मिलेगा, जब आरती के बाद आँवला-नवमी की वार्ता पूर्ण होगी।

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वार्ता शुरू होती थी- ‘‘एक डोकरी माँय थी। वह कार्तिक स्नान करती थी। रोज आँवळा दान करती थी। एक बार राम-लक्ष्मण बालक का वेश लेकर आए। माँय ने उन्हें आँवला दिया। बालकों ने पूछा, ‘‘माय श्याळा (ठंड) की ऋतु कैसी?’’ माँय बोली, ‘‘ओ बेटा, श्याळा (ठंड) की ऋतु तो बड़ी ही अच्छी, सोन्ना जसी। ओको तो सुखजऽ न्यारो। अच्छो घाम तापो। गरम पानी से न्हाओ। दूदकड़ी पेओ। कढ़ी फुड़काओ। खूब तातो-तातो सीरो खाओ। खूब घीव हलती गुड़ खिचड़ी खाओ। मूँग उड़द का लड्डू खाओ। तापड़ी तापो और रात मऽ अच्छा सीऽ दुलई-सिरका में दबी कर सो जाओ। यह अच्छी सैत (सेहत) बनाने का मौसम है। श्याळा की ऋतु तो बड़ी उम्दा होती है।’’ बालकों ने फिर पूछा – ‘‘माँय, उँढाल्या (गर्मी) की ऋतु कैसी?’’ माँय बोली- ‘‘ओ बेटा, उत्तम, अति उत्तम। ठण्डा पाणी सीऽ न्हाओ, पंखा की हवा खाओ, अम्बा खाओ।’’ अब बालकों ने पूछा- ‘‘माँय, वरसात कैसी?’’ माँय बोली- ‘‘बेटा, खूब चाण्डी (सुन्दर), सब खुशहाल, सब हरो-भर्यो। वैसे यह कथा बड़ी लम्बी है। इसमें खान-पान के महत्त्व का उल्लेख है। पूरी कथा फिर अलग से कभी कहेंगे।

ठंड की ऋतु सही में बड़ी उम्दा होती थी, जब हम छोटे थे तब, क्योंकि हम लोग बहुत कुछ खाते थे और बड़ी रुचि से खाते थे। आजकल बच्चे जिसे ‘फै़ट’ कहते हैं, उससे परहेज़ करते हैं, उससे डरते हैं, पर हम उस ‘फै़ट’ को जी भर-भर कर खाते थे। हम उस ‘फै़ट’ में आकंठ डूबे रहते थे। हमारी आजी माँय कहती थी – ‘‘बाळपण की खाई, बुढ़ापा मंऽ काम आई।’’ अर्थात् जो बालपन में खाओगे, वह ताउम्र ताकत देगा। तभी तो कहते हैं, ‘वे मजबूत हड्डी वाले हैं।’

हम रात में ठण्ड भगाने के लिए अपनी आजी माँय के पास चिपक कर सोते थे। उनके शरीर की प्रेममयी ऊष्णता और उनकी वाणी की उर्जा हमारे लिए औषधि जैसे हुआ करती थी। माँय कहती थी, ‘‘बेटा, ठण्ड गरम कपड़े से नहीं भागती, वह भागती है खाने से। अब पूछो, कैसे?’’ हम पूछते थे, ‘‘कैसे?’’ तब माँय कहती थी, ‘‘खबू दूध, घी और बादाम खाओ। खूब खून बनेगा, खूब ताक़त आयगी और जब ताक़त आयगी तो ठण्ड एक तरफ़ पड़ा रहेगा।’’ सच में, बहुत याद आती है बचपन की खाई।

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दिन निकलते ही आँगन के बड़े चूल्हे पर लोहे के बड़े दुुकड़े में पानी गरम होना शुरू हो जाता था। सुबह पाँच बजे से ही बाबूजी चूल्हा जला देते थे। चूल्हे के पास ही बैठकर गरम पानी से मुँह धोया, बड़े भाई-बहनों के छोटे हुए बण्डी-कोट पहने और बाड़े में पहुँच जाते थे घाम लेने। वहाँ बैठकर सब मुँह खोलकर भाप छोड़ते थे और एक दूसरे को यह बताते हुए कहते थे, ‘‘देखो! हमारे अन्दर कितनी गरमी है। हमारे भीतर एक चक्की चल रही है, जो शरीर को गरमी देती है।’’ फिर एक दूसरे की चक्की पर ठण्डा हाथ रखकर देख लेते थे कि चक्की चल रही है या नहीं। ऐसे में कभी-कभी मारा-पीटी भी हो जाती थी, क्योंकि ठण्डे हाथ छाती पर लगते, तो हम कँपकँपा जाते थे। इसी बीच बड़ी बाई या माँय आवाज़ देती थी, ‘‘चलो भाई-बहन, जल्दी आओ, लड्डू तैयार हैं…।’’ मूँग-उड़द के लड्डू घर में ठण्ड शुरू होते ही बन जाते थे। दीवाली के सँजोरी-गूजे खतम हुए, कि लड्डू शुरू। माँय उन लड्डुओं को फोड़कर चूल्हे की अंगार पर गरम कर हमें पीतल की छोटी-छोटी तपकड़ियों में दे देती थीं। वे सबको अपने सामने बैठाकर खिलाती थीं। खिलाने के बाद वे कहती थीं, ‘‘अब जाओ, शरीर सेंक लो घाम में।’’ घाम में शरीर सेंकते-सेंकते हम पट्टी पर पेम से बारहखड़ी और पट्टी की दूसरी तरफ़ उल्टी-सीधी गिनती लिखकर अपने स्कूल का अभ्यास भी कर लेते थे। शाला में भी गुरुजी सब बच्चों को घाम में पट्टी बिछवाकर उस पर बैठाते थे।

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माटी, धूल में खेलते-खेलते हमारे पैर हाथ इतने तिड़ (फट) जाते थे, कि उस जगह से खून तक निकल आता था। रात को सोने के पहले बाबूजी सेठ दाजी की दुकान से काग़ज़ की पुड़िया में कोकम के तेल की डली ले आते थे, जिसे वे गरम करके, पिघलाकर हमारी फटी एड़ियों तथा हाथ-पैर पर लगा देते थे। सुबह वही बेसन-हल्दी में थोड़ा-सा तेल डालकर शरीर पर मस देते थे। फिर हम गरम पानी से नहा लेते थे।

ठंड के दिनों में आँगन के चूल्हे पर ही भोजन बनता था। हम धूप में बैठकर गरम-गरम भोजन कर ठंड को मात देते थे। ऊल-चूल के चूल्हे पर एक तरफ़ तवे पर सिकता रोटा, दूसरी तरफ़ कभी कढ़ी उबलती, तो कभी मेथी की दाल, तो कभी दाल बोर-भाजी की, तो कभी केवटी दाल, तो कभी बड़ी बनती। अंगारे पर फूला रोटा, आधा-आधा कर सबको थाली में मिलता था। परोसने वाली बाई या माँय गरम रोटे पर लोणी का गोला डाल देती थी। जिस दिन लोणी तपता था, उस दिन भोजन में बेरी के साथ गुड़ का स्वाद ही अलग आता था। इन दिनों जब अम्माड़ी की भाजी बनती थी, तब हमें बड़े लोगों के साथ भोजन करना अच्छा लगता था। दादा कहते थे, ‘‘राई का तड़का तेज होय।‘‘ जब थाली में अम्माड़ी की भाजी पर राई वाला गरम उबलता तेल डाला जाता था, तो तेल छुन्न से बजता था। यह सब देख-सुनकर हम बच्चों को बड़ा आनंद आता था। फिर गरम रोटे का स्वाद ही अलग होता था।

 

रात को बनती थी चरकी या सादी खिचड़ी। उसके साथ होते थे घी, गुड़, और पापड़। हम खूब गरम गरम गपका जाते थे। माँय कहती थी, ‘‘ठण्ड लगऽ ठण्ड लगऽ खिचड़ी नी भावऽ, नऽ काँगण भर खिचड़ी मऽ काकरो नी पावऽ। अर्थात् ठंड में भोजन ज्यादा ही खवा जाता है। कांगण भर खिचड़ी बनती है और एक कण भी नहीं बचता। रात के समय हल्दी का दूध, कभी तेज ठण्ड हो तो खारिक का दूध पीते थे। ‘पोस (पौष) मास में पोस का पेट फोड़ते थे’। दूद-कड़ी या खीर ज़रूर बनती थी। सब घरों में दोपहर में गरम-गरम चरके व मिठ्ठे ताये बनते थे। आँगन में दो-दो तवे चलते थे, सब लोग मिल बैठकर भोजन करते थे। एक को दिया नहीं, कि दूसरे की थाली खाली। बड़ी होड़ लगती थी कि ‘कौन कितने ताये खायगा’।

 

एक बड़ा आयोजन और होता था खिची का। खिची यानी जुवार के पापड़ बनाने के लिए विभिन्न सामग्रियों और विशेष विधि से तैयार की गई जुवार के बारीक आटे की लुगदी। खिची बनाने के लिए पापड़ खार/संचरा, पिसा जीरा, हींग आदि का उपयोग किया जाता है। यह कलात्मक व निपुण हाथों तथा बड़े परिश्रम से बनाई जाती है। खिची को खाते समय इस पर मीठा तेल और पिसा हुआ जीरा डालते हैं। कहते हैं, गरम-गरम खिची खाने से ठण्ड भाग जाती है। हम खिची, गरम-गरम खिची, का आनंद लेते थे। दुनिया के सब व्यंजनों से अलग स्वाद होता था खिची का, छप्पन भोगों से भी बड़ा और अलग स्वाद जुवार की खिची का होता था। खिची खाने के लिए प्रियजनों को भी आमंत्रित करते थे। मकर-संक्राति आते ही आँगन में बाटी का जगरा चेता जाता था। गरम दाल-बाटी और दूसरे दिन गरम खिचड़ी के साथ पापड़ी और तिल्ली की चटनी बनती थी।

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संक्राति पर पूरण पोळई और कंदधारी भी बनती थी। उन्हें तो हम बच्चे गरम-गरम ही खाते थे, चाहे जीभ ही क्यों न जल जाय। उन्हीं दिनों तिल्ली के लड्डू और साथ में मग्दळ (खड़े मूँग के) लड्डू भी। खाते समय मूँग के लड्डू तालू में चिपक जाते थे, पर उसका स्वाद भी अव्यक्त रहता था। गुड़ की दूद-कड़ी पीते थे, तो फिर ठंड भागता फिरता था।

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संजा हुई, कि सभी के घरों में तापड़ी चेत जाती थी। आँगन के चूल्हे पर गुलाब सिंग भाई जुवार के भुट्टे संेकते थे, फिर कपड़े में उसको लपटे दे कर लकड़े से भुट्टा झोड़ते थे। दाने कपड़े में इकट्ठे हो जाते थे, फिर उन्हें सूपड़े से झाड़ कर उसकी फाँस निकालते थे। पहले भगवान् के यहाँ भोग लगाते थे, फिर उसमें कच्ची तिल्ली मिला कर हम खाते थे। वानी खतम होती, तो कभी-कभी रात में तापते-तापते सेंगळई सेंक कर खाते थे।

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संक्रांति के साथ आ जाते थे होला-उम्बी। होला सेंकने की अपेक्षा हम बच्चे उसके छोड़ पकड़ते थे और उसमें से तोड़-तोड़कर हरी-हरी घेंटियाँ ही खाते थे। गुलाब सिंग भाई उम्बी सेंक कर सूपड़े में मसलते थे, फिर सूपड़े से झाड़कर उसकी कुसी निकालकर हमें देते थे। हम बड़े शौक से उम्बी के नरम और गरम दाने खाते थे। यह सब रात के ही आयोजन होते थे। संध्या समय ही खेत से गट्ठर भर कर होला आ जाता था।

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वह चाहे होला हो या उम्बी (बाल), उनके सिंकते और खाते समय बहुत-सी चर्चाएँ हुआ करती थीं। कभी भी कोई व्यक्ति अकेला न होला खाता था, न वानी और न ही उम्बी (बाली)। उनके खाने के आनन्द की अपेक्षा मिलजुल कर बैठने और बातचीत करने का आनन्द कहीं अधिक होता था। चावड़ी पर भी इन दिनों होला-उम्बी का बड़ा आयोजन होता रहता था। इस समय कई किस्से और कहानियाँ भी चलती थीं तथा गाँव-खेत-खलिहान की चर्चा भी होती थी। वहीं पर कभी तीरथ यात्रा, तो कभी घर-परिवार में हुए नफ़ा-नुकसान की चर्चा भी हो जाती थी।

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मुझे याद आता है, तब कितने सीमित साधन थे ठंड से बचाव के; किन्तु फिर भी सब स्वस्थ रहते थे। उन दिनों हम भाई-बहनों के पास गरम कपड़े भी अधिक नहीं होते थे। कारण यह था, कि तब पहनने के लिए ही कपड़ा पहना जाता था, न कि प्रदर्शन के लिए। हाँ, अब तो प्रदर्शन ही प्रदर्शन रह गया है, हर पहनावा मैचिंग का।

हम सब भाई-बहनों के पास रुई की बड़ी सुन्दर और उपयोगी बण्डियाँ हुआ करती थीं। इन्हें हमारे आजा, मुंशी दाजी दर्ज़ी को बुलवाकर अपने सामने ही बनवाते थे। वह शरीर पर चिपकी रहती थी। फिर ऊपर से कुछ भी गरम पहनों। उनका कहना था, ‘‘छाती और कान को सर्द हवा से बचा लो, तो ठंड हमारा बाल भी बाँका नहीं कर सकती।’’ संजा के समय वे स्वयं भी, कान बाँधते थे पंछे से और हम बच्चों के कान भी बाँध देते थे।

ठंड कैसी भी हो, पर ठंड का सुख तो मन से कभी नहीं बिसरता। सच में ठाठ-बाट तो ठंड में ही हैं। जब भी याद आती है उन दिनों की तो मन करता है, वही दिन, वही उमर, वही ठंड फिर आ जाय। एक बात और याद आती है जब माँय अपने घुटने पर हमारा सिर रखकर, कान में गुन-गुना तेल डालती थी। पहले एक कान में, फिर दूसरे कान में, और फिर हथेली से कान को हौले हौले हिलाती थीं, तो ठंड की ऋतु सार्थक हो जाती थी।

डॉ. सुमन चौरे

डॉ. सुमन चौरे, लोक संस्कृति विद्, भोपाल

भोपाल मो: 09424440377