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फिल्म समीक्षा : अन्धविश्वास को बढ़ाने वाली फिल्म शैतान

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फिल्म समीक्षा : अन्धविश्वास को बढ़ाने वाली फिल्म शैतान

शैतान फिल्म को साईकोलॉजिकल थ्रिलर, होस्टेज ड्रामा, सुपरनेचुरल ड्रामा और न जाने क्या क्या कहा गया है, लेकिन यह फिल्म काला जादू और वशीकरण जैसे अंधविश्वासों का प्रचार मात्र है। शुरू में ही डिस्क्लेमर डाल दिया गया है कि फिल्म का उद्देश्य काला जादू जैसी बातों को बढ़ावा देना नहीं है, लेकिन फिल्म में ऐसी ही बेसिर-पैर की घटनाएं दिखाई गई हैं।

काला जादू करनेवाला यह कृत्य क्यों करता है? वह किसको शिकार चुनता है? क्या वशीकरण से बचने की कोई विधि है? वशीकरण विज्ञानसम्मत है या कपोल कल्पना? क्या इस तरह की किसी आसुरी शक्ति उपयोग करनेवाला बालक या बालिका के माता-पिता की अनुमति लेता है? भारत में ताकत और जवानी वापस पानेवालों और वशीकरण की शक्ति चाहनेवालों की संख्या बहुत बड़ी है और उनके साथ ठगी होना आम बात है। ऐसे में यह फिल्म लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करती ही लगती है।

 

मूल गुजराती फिल्म वश का यह ऑफिशियल हिन्दी रीमेक है। इसमें शैतान से बचने के लिए हनुमान चालीसा या गंडे-ताबीजों का सहारा लिया गया था, हिन्दी फिल्म में ऐसा कुछ नहीं। गुजराती में शैतान के वश में आई लड़की का रोल जानकी बोडीवाला ने किया था, हिन्दी फिल्म में भी शैतान की शिकार बनी लड़की जानकी ही है। शैतान में आर माधवन और अजय देवगन आमने सामने हैं। बुरे पात्र की भूमिका निभा रहे माधवन के लिए अभिनय के ज़्यादा मौके थे। अजय देवगन ने फिर दृश्यम सीरीज़ की दोनों फिल्मों की तरह ही एक ऐसे पिता का रोल किया है जो अपने बच्चों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है।

 

‘शैतान’ फिल्म में तांत्रिक बने माधवन के पास असीम शक्तियां हैं। क्या सचमुच किसी के पास होती है ऐसी शक्तियां? क्या सचमुच किसी के द्वारा तांत्रिक क्रिया की हुई कोई चीज खाने से वशीकरण के चक्कर में कोई फंस सकता है? क्या सचमुच कोई तांत्रिक किसी गुड़िया में शक्ति फूंक सकता है? फिल्म देखने के बाद दूर बने फार्म हाउस में रहनेवाले लोगों के मन में ज़रूर डर फ़ैल जायेगा।

 

इस फिल्म में शुरू में ही दर्शकों को अंदाज़ हो जाता है कि आगे कुछ गड़बड़ होनेवाली है जब आठ साल के बच्चे को वीडियो एडिटिंग करते और उसकी मन को भीगा हुआ मोबाइल चावल के डिब्बे में छुपाते हुए दिखाया गया था। इंटरवाल तक तो फिल्म में घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन उसके बाद का हिस्सा निहायत ही ढीला और हास्यास्पद है। निर्देशक विकास बहल ने क़्वीन जैसी फ़िल्में भी दी हैं, लेकिन इसमें वे बहक गए हैं। माधवन पूरी फिल्म में अजय देवगन पर भारी पड़े।

 

फिल्म झेलने लायक भी नहीं है। इसे देखते वक्त अलग ही जुगुप्सा, घृणा और वीभत्स भाव जागृत होते हैं। सरकार को चाहिए कि इसे मनोरंजन टैक्स से मुक्त कर दे, क्योंकि इसमें मनोरंजन का अंश तो है ही नहीं।