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नेत्रदान- एक राष्ट्रीय आवश्यकता, एक परोपकार- खुशियां दे हजार

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नेत्रदान- एक राष्ट्रीय आवश्यकता, एक परोपकार- खुशियां दे हजार

डॉ. घनश्याम बटवाल, मंदसौर

आप कल्पना करिए आंखों के आगे अंधेरा ही नहीं धुंधलापन हो तो भी हम व्यग्र और बैचेन होजाते हैं, और यह भी सच है कि नेत्रों की नज़र में ही तो सारा जहान है।

क्या रंग, क्या सुख और क्या दुःख, प्रकृति और पर्यावरण, नदियां और पहाड़, खेत और खलिहान, उद्योग और संस्थान, भाई बहन ही नहीं माता पिता और संसार सब नेत्रों में ही तो समाया है।

आंखों आंखों में ही बात कर लेते हैं, प्यार कर लेते हैं, और तिरछी नज़र से घायल भी, मतलब अनेत्र और नेत्र का महत्व को जीवन में मनुष्यों ही नहीं प्राणिमात्र में देखा-जाना-समझा जा सकता है।

आज विश्व और देश मे करोड़ों लोग दृष्टिहीन हैं। इसमें से लाखों लोग ऐसे है जो नेत्र कॉर्निया प्रत्यारोपण (आंख की पुतली बदलने) द्वारा दृष्टि पा सकते हैं। लेकिन यह तभी सम्भव है जब कोई मरणोपरांत अपने परिजनों का नेत्रदान करे।

अगर बात करें पहले नेत्र प्रत्यारोपण की तो यह 1905 में पहली बार किया गया और नेत्र बैंक की स्थापना 1944-45 में हुई। हमारे देश में 1985 में नेत्रदान पखवाड़े की शुरुआत हुई ताकि समाज और राष्ट्र में चेतना के साथ जागरूकता हो और लोगों को प्रेरणा मिले।

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इन दिनों 39 वां नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जारहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक अंधेपन से प्रभावित लोगों में से 80 प्रतिशत इलाज, प्रत्यारोपण और चिकित्सा से ठीक किया जा सकता है। भारत में राष्ट्रीय अंधत्व एवं दृष्टि क्षीणता नियंत्रण कार्यक्रम चलाया जा रहा है। भारत में अंगदान को सामाजिक और शासन की मान्यता प्राप्त है पर इसमें जागरूकता की कमी और प्रोत्साहन के चलते कार्नियल ब्लाइंडनेस की पूर्ति नहीं हो पा रही, जानकारों के मुताबिक फिलहाल 10 प्रतिशत ही सक्रियता और जागरूकता होने से, कार्निया मिलने से अंधत्व निवारण में बड़ी मदद मिल सकती है।

आज नेत्र चिकित्सक, नेत्र बैंक आई हॉस्पिटल, मोबाइल वेन, स्वयं सेवी संस्थाओं, संगठनों का नेटवर्क मिलकर महानगरों, शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच कर कॉर्निया प्रत्यारोपण की सुविधा सम्भव होने पर भी इतने लोग अंधकारमय जीवन जीते हैं, यह चिंता का विषय है। जरूरत है समाज को नेत्रदान हेतु प्रेरित करने की, जागरूक करने की।

मंदसौर अनंता नेत्रालय के विशेषज्ञ नेत्र चिकित्सक डॉ किशोर शर्मा ने बताया कि यह ऐसा दान है जो किसी अन्य के जीवन में रोशनी के साथ खुशियों का संचार कर सकता है, अपनी या अपने परिजनों की मृत्यु उपरांत भी किसी अन्य व्यक्ति अव्यक्त प्रसन्नता प्रदान कर सकता है, अर्थात जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी नेत्रदान जीवंतता देने वाला परोपकार है।

डॉ शर्मा ने समाज के सभी वर्गों से अपील की है कि इस महत्वपूर्ण सेवा कार्य में सहयोग, जागरूकता और प्रेरणा की आवश्यकता है।

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🔸नेत्रदान से जुड़े कुछ तथ्य-

1. नेत्रदान के लिए उम्र जाती धर्म का कोई बन्धन नही है। चश्मा पहनने वाले, मोतियाबिंद का ऑपरेशन हो चुके तथा बीपी शुगर वाले व्यक्ति भी नेत्रदान कर सकते है।

2. दुर्घटना मृत्यु में यदि पुतलियां ठीक हो तो पुलिस की अनुमति से नेत्रदान किया जा सकता है।

3. नेत्रदान मृत्यु के 4 से 5 घण्टे के अंदर ही हो सकता है।

4. नेत्रदान से पहले नेत्रदाता की आंखे बन्द रखें।

5. नेत्रदान के लिए जरूरी नही की नेत्रदाता ने शपथपत्र दिया हो, परिजन व रिश्तेदार अपनी इच्छा पर भी मृत्युपरांत नेत्रदान करवा सकते है, यह एक समाजिक जागरूकता का कार्य है।

6. ज़हर से, पानी से, संक्रमित बीमारी से या केन्सर से मृत्यु हो, मरीज 3 दिन से ज़्यादा आईसीयु में रहे अथवा आँख की काली पुतली पर सफेद छाला हो तब नेत्रदान नही कर सकते

7. हम चाहे तो अभी से ही शपथपत्र भरकर परिजनों को अपनी नेत्रदान की इच्छा से अवगत करा सकते है।

सूचना मिलते ही टीम नेत्रदाता के घर जाकर नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी करती है, इसमें मात्र 10 से 15 मिनट लगते हैं। इससे नेत्रदाता का चेहरा बिल्कुल भी विद्रूप नहीं होता है।😊😊

🔸 नेत्रदान के मिथक और तथ्य

अन्यान्य कारणों से, धार्मिक और रुढ़िवादी मान्यताओं, जागरूकता की कमी, प्रेरित करने वाले कारकों के चलते मांग की तुलना में नेत्रदान कम है। इसके अभाव में कार्नियल ब्लाइंडनेस उपचार नहीं मिल पा रहा है। जबकि मांग में 60 फ़ीसदी किशोर वय के बालक बालिकाओं को दृष्टिदोष दूर करने के लिये कार्निया रिप्लेसमेंट की जरूरत है।

नेत्रदान से किसी का जीवन बदल सकता है, कोई अंधकार के अभिशाप से बाहर निकल सकता है। जीवित अवस्था मे पाप-पुण्य हमारे बस में नहीं रहता पर मरणोपरांत तो हम समाज का कुछ ऋण चुका ही सकते हैं।

आइये हम इस अभियान में आगे आये, एक नयी क्रांति जगाये, सहयोग करे, प्रचार करे, किसी की मृत्यु होने पर परिजनों को नेत्रदान करने के लिए प्रेरित करे। यह एक राष्ट्रीय आवश्यकता है, और पुण्य का कार्य भी।

हम नेत्रदान को समाज ओर परिवारों की परंपरा बनाये।

(अगस्त के तीसरे सप्ताह से सितंबर प्रथम सप्ताह तक प्रतिवर्ष राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा रहता है, कृपया आप भी इस यज्ञ में नेत्रदान कर जागरूकता फैलाएं।)

आजकल तो समाज में आगे बढ़कर अंगदान के साथ देहदान के मामले भी प्रकाश में आ रहे हैं। यह समाज जीवन के लिये परिवारों और देहदानियों की जीवंतता का प्रमाण है। चिकित्सा सुविधाएं बढ़ रही हैं तो अंगों के साथ उपलब्धता भी होने लगी। पहले रक्तदान की महत्ता को समझा गया अब नेत्रदान के प्रति भ्रम मिट रहे हैं निश्चित इसके सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं जब कार्निया उपचार के बाद पीड़ितों के जीवन में रोशनी का संचार होगा ओर वे देश दुनिया देख सकेंगे।