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रविवारीय गपशप :मेरा वेतन ज्यादा, बाकी का कम, उलझे सवाल का सटीक जवाब

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रविवारीय गपशप:मेरा वेतन ज्यादा, बाकी का कम, उलझे सवाल का सटीक जवाब

आनंद शर्मा

आम तौर पर सभी नौकरी वाले इन्सानों को पहली तारीख़ का , समय समय पर मिलने वाली पदोन्नति और उसके फलस्वरूप मिलने वाली वेतन वृद्धि का इंतजार रहता है , उसी तरह सरकरी नौकरी वाला बंदा भी इन सबसे मुतास्सिर रहा करता है , फ़र्क़ बस इतना है कि सरकारी नौकरी में पे कमीशन की सिफारिशों के आधार पर मिलने वाली वेतन वृद्धि की तारीख़ों का चयन करना थोड़ा तकनीकी विषय है ।


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मुझे नौकरी की शुरुआत में ही गिरधर की कुण्डलियों सरीखी एक सीख मिल गई थी और वो ये कि तीन लोगों से हमेशा दोस्ती बनाये रखना ; बॉस का स्टेनो , ऑफिस का सुपरवाईजर तथा लेखा अधिकारी , और पूरी नौकरी मैंने इसका पालन किया । राजगढ़ में कलेक्टर के पद से जब मैं भोपाल स्थित सचिवालय यानी वल्लभ भवन में पदस्थ हुआ तो मेरे और भी साथी वहाँ पदस्थ थे । मेरी पदस्थापना सामान्य प्रशासन विभाग में अपर सचिव के पद पर थी सो मेरा कमरा दूसरे साथियों से बेहतर और बड़ा था इस कारण मध्य अंतराल में चाय शाय के लिए अक्सर साथी मेरे कमरे में आ जाया करते थे । ऐसे ही एक दिन मेरे बैचमेट अशोक भार्गव मेरे कमरे में बैठे चाय का आनंद ले रहे थे तभी स्टेनो ने लाकर वेतनपर्ची मेरे समक्ष रख दी । अशोक ने सहज भाव से पर्ची उठाई और बोला देखें तुम्हें कितनी तनख्वाह मिल रही है और थोड़ी देर बाद कहने लगा “ अरे तुम्हारी तनख्वाह मुझसे ज़्यादा कैसे है ? “ प्रश्न स्वाभाविक था , आख़िर हम एक ही साथ के भर्ती अधिकारी थे । मैंने कहा , क्या पता पहले कभी परिवार नियोजन की सुविधाओं के कारण ये फ़र्क़ हो , अशोक ने न की मुद्रा में सर हिलाया और बोला वो फ़र्क़ तो पे फिक्सेशन में बराबर हो जाता है , कुछ गड़बड़ है । मैंने कहा भाई मेरे मेरी तनख़्वाह कम मत करा देना । अशोक बोला तुम्हारी कम क्यों कराऊँ मैं तो अपनी बढ़वाऊँगा ।


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अशोक ने ये रहस्य अन्य बैचमेट्स को बताया और उन सबने समान्य प्रशासन विभाग में ये अर्जी लगा दी कि उनकी तनख्वाह भी आनंद शर्मा की भाँति की जाए । तब जी.ए.डी. में अकाउंट सेक्शन देखने वाला अधिकारी बड़ा खुर्राट था और उसने ना जाने कितने अधिकारियों की वसूली निकाल रखी थी । मैं थोड़ा विचलित तो हुआ कि अब ना जाने क्या हो ? पर सारी समीक्षा के बाद पाया गया कि मेरा वेतन सही था और सारे साथियों के अभ्यावेदन निरस्त कर दिए गए । मुझे आश्चर्य हुआ कि ये कैसे हो पाया तो मैं उसी खुर्राट अफ़सर के पास पहुँचा , तब उसने बताया कि पे फ़िक्सेशन के वक्त आप से पूछा जाता है कि आप वेतन वृद्धि किस तारीख से रखना चाह रहे हो एक जुलाई या एक जनवरी , और आपने जो तिथि चुनी उसके हिसाब से आपका वेतन सही बना है । मुझे याद आया , पे फिक्सेशन के वक्त में ग्वालियर में परिवहन विभाग में पदस्थ था और तारीख चुनने का मसला थोड़ा तकनीकी था तो मैंने विभाग में हमारी साथी श्रीमती मंजू शर्मा जो लेखा सलाहकार के पद पर पदस्थ थीं से राय ली थी । मुझे तब उन्होंने ही कहा था कि फ़लाँ तारीख चुनने में अभी एरियर्स ज़्यादा मिलेगा पर भविष्य में ज़्यादा फ़ायदा दूसरी तारीख़ चुनने में है । अब मुझे महसूस हुआ कि मंजू शर्मा जी की सलाह कितनी लाभप्रद थी और नौकरी की शुरुआत में मिली सीख एकदम दुरुस्त थी ।