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जिन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की बात: बरामदा… बारिश… और वो ख़ामोशी।

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संस्मरण -8

जिन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की बात: बरामदा… बारिश… और वो ख़ामोशी।

बरसात की वो पहली रात…

वो दिन… जब दिल ने पहली बार किसी के लिए धड़कना सीखा था।
कॉलेज के शुरुआती दिन थे, और राज…
बस नज़रें मिलती थीं, और दिल की दुनिया रंगीन हो जाती थी।
कोई बात नहीं होती थी, लेकिन हर मुलाक़ात ख़ामोशी से हो जाती थी।
जैसे कोई अधूरा गीत… जिसकी धुनें बस दिल ही सुनता था।
राज ने कई बार मिलने की ख्वाहिश जताई थी,
और जाने क्यों, उस दिन… मैंने “हाँ” कह दिया।
हम मिले।
राज बाइक पर आया था — वही पुरानी-सी बाइक, लेकिन उस दिन सबसे खास लग रही थी।
बस दो मिनट ही चले होंगे कि आसमान फट पड़ा…
मानो कुदरत भी हमारी पहली मुलाकात को यादगार बनाना चाहती हो।
बारिश मूसलधार थी… हर बूंद जैसे कोई राज खोल रही थी।
सामने मेरा स्कूल दिखा — मेरी यादों का पिटारा।
वहीं के एक पुराने बरामदे में हम जाकर खड़े हो गए।
बरामदा… बारिश… और वो ख़ामोशी।
मैं काँप रही थी — शायद सर्दी से नहीं, एहसासों से।
उसने कुछ नहीं कहा, मैंने भी नहीं…
लेकिन दिल ने बहुत कुछ कह डाला उस भीगी रात में।
वो पहली बारिश… पहली मुलाक़ात…
पहला एहसास…
आज भी रूह तक भीगा देता है।
कभी-कभी कोई एक पल, पूरी ज़िंदगी की कहानी बन जाता है।
और मेरे लिए… वो पल था — बरसात की वो रात।

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सुरेखा सरोदे
इंदौर

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