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कानून और न्याय: सुप्रीम कोर्ट ने माना अवैध निर्माण एवं तोड़फोड़ पर सख्ती जरुरी!

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कानून और न्याय: सुप्रीम कोर्ट ने माना अवैध निर्माण एवं तोड़फोड़ पर सख्ती जरुरी!

विनय झैलावत का कॉलम 

सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली के चांदनी चौक में कथित अवैध और अनाधिकृत व्यावसायिक निर्माण और दिल्ली नगर निगम द्वारा इससे निपटने में विफलता की केंद्रीय जांच ब्यूरो से जांच कराने की इच्छा व्यक्त की थी। इसके बाद न्यायालय ने क्षेत्र में आवासीय भवनों को व्यावसायिक परिसरों में बदलने पर रोक लगा दी गई। न्यायालय ने दिल्ली नगर निगम को भी आगाह किया कि ऐसे मामलों में किसी भी तरह की अवमानना न केवल न्यायालय की अवमानना मानी जाएगी, बल्कि नगर निगम अधिकारियों और संबंधित बिल्डरों के बीच मिलीभगत के बारे में प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने का भी आधार बनेगी।

सुनवाई की शुरुआत में न्यायालय ने कहा कि आखिरकार दिल्ली नगर निगम अपनी नींद से जाग गया है और कुछ कदम उठा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की और उस क्षेत्र की सभी संपत्तियों को सील करने का निर्देश दिया, जहां अनधिकृत या अवैध निर्माण होता पाया जाता है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने दिल्ली पुलिस अधिकारियों से यह भी कहा कि आप रोज गश्त के लिए जाते हैं। अगर कोई ईंट लगाते पाया जाता है तो उसे तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए। यह नगर निगम के अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहा एक बड़ा धोखा है, इसे रोका जाना चाहिए।

आदेश में कहा गया कि पुलिस आयुक्त क्षेत्र में गश्त के लिए पुलिस दल तैनात करेंगे। वे यह सुनिश्चित करेंगे कि दिल्ली नगर निगम द्वारा पारित सभी ध्वस्तीकरण नोटिस, जिन पर अदालतों ने स्थगन नहीं दिया है, उनका सावधानीपूर्वक पालन किया जाए। जहां अवैध/अनधिकृत निर्माण हो रहे हैं, ऐसी संपत्तियों को तुरंत सील कर दिया जाए। स्थानीय पुलिस उपायुक्त द्वारा एक अनुपालन रिपोर्ट भी दाखिल की जाए। न्यायालय ने उस संपत्ति का भी संज्ञान लिया, जिसके भूतल पर एक वृद्ध महिला रहती है। इसमें नगर निगम के अधिकारियों से वह महिला एक बिल्डर द्वारा उसकी आवासीय संपत्ति पर व्यावसायिक मंजिल के अनाधिकृत निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करने की गुहार लगा रही है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने दिल्ली नगर निगम से पूछा कि सन 2022 में यह बिल्डर काम शुरू कर रहा है। यह वृद्ध महिला भूतल पर रहने वाली अधिकारियों के सामने रो रही है। दर-दर भटक रही है। आप कुछ नहीं करते। जब हम आदेश देते हैं, तो आप जाकर सब कुछ तोड़ देते हैं। आप इतने सालों से क्या रह थे? अपने आदेश में न्यायालय ने बिल्डर का विवरण मांगा, ताकि उसके खिलाफ उचित दंडात्मक कार्रवाई की जा सके। अंततः खंडपीठ ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसडी संजय से कहा कि वे दोषियों को तुरंत गिरफ्तार करवाएं। क्योंकि, वे अपने तौर-तरीके नहीं बदलेंगे। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने टिप्पणी कि देखते हैं उन्हें कौन जमानत देता है।

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हालांकि, इसने इस बात की जांच की कि निगम ने कुछ घरों के संबंध में क्या किया था, जिन्हें गुप्त तरीके से एक साथ मिला दिया गया था। घरों से संबंधित एक आवेदन पर दिल्ली नगर निगम से जवाब तलब करते हुए न्यायालय ने आदेश दिया कि किसी भी व्यावसायिक गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी। यदि आवश्यक हो तो संपत्तियों को सील किया जा सकता है। न्यायालय ने मौखिक रूप से दिल्ली नगर निगम को निरीक्षण रिपोर्ट दाखिल करने और याचिकाकर्ता को अनधिकृत निर्माण के किसी भी अन्य मामले को हलफनामे के साथ रिकॉर्ड पर लाने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मामले को समाप्त करने से पहले यह भी कहा कि हमारे आदेशों के बावजूद, ये लोग कितने दुस्साहस दिखा रहे हैं।

लेकिन, उच्चतम न्यायालय ने केवल अवैध निर्माण नहीं बल्कि अवैध तोड़फोड़ पर भी कड़ा रूख अपनाया। एक अन्य प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने बुलडोजर एक्शन पर भी सख्त रूख अपनाया है। उत्तर प्रदेश में एक मकान को ध्वस्त करने से संबंधित तमामले में सर्वोच्च न्यायालय ने शनिवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि बुलडोजर जस्टिस की कोई जगह नहीं है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि कानून के शासन में बुलडोजर न्याय की कोई जगह नहीं है।

उनका कहना था कि अगर इसकी अनुमति दी गई, तो अनुच्छेद 300ए के तहत संपत्ति के अधिकारों की संवैधानिक मान्यता खत्म हो जाएगी। न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को मुआवजे के रूप में पीड़ित व्यक्ति को 25 लाख रूपये देने का निर्देश भी दिए। उत्तर प्रदेश के महाराजगंज के रहने वाले मनोज टिबड़ेवाल आकाश का घर साल 2019 में सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत ध्वस्त कर दिया गया था। मनोज टिबड़ेवाल आकाश के इस घर पर बुलडोजर चलाया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय कहा था कि नागरिकों की संपत्तियों को नष्ट करने की धमकी देकर उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता। न्यायालय ने कहा कि बुलडोजर न्याय न केवल कानून के शासन के खिलाफ है बल्कि यह मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन करता है। अपने फैसले में न्यायालय ने कहा कि लोगों की संपत्तियों और उनके घरों को तोड़कर उनकी आवाज को नहीं दबाया जा सकता है। एक व्यक्ति के पास जो सबसे बड़ी सुरक्षा होती है, वह उसका घर ही है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार को किसी भी व्यक्ति की संपत्ति ध्वस्त करने से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए और उन्हें सुनवाई का मौका देना चाहिए।

न्यायालय का कहना था कि अगर किसी विभाग या अधिकारी को मनमाने और गैरकानूनी व्यवहार की इजाजत दी जाती है तो इस बात का खतरा है कि प्रतिषोध में लोगों की संपत्तियों को ध्वस्त किया जा सकता है। अवैध तरीके से मकान तोड़ने वालों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को कार्यवाही के निर्देश किए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा करने वाले सरकारी अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई करने को कहा है।

सर्वोच्च न्यायालय का कहना था कि न सिर्फ इस मामले में बल्कि इस तरह के अन्य मामलों में भी अगर कोई अधिकारी शामिल पाया जाता है तो उस पर कार्रवाई की जानी चाहिए। इस मामले में न्यायालय ने मुख्य सचिव से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के आदेश के तहत एफआईआर दर्ज करवाने के लिए भी कहा है। इसकी जांच सीबी-सीआईडी करेगी। सीबी-सीआईडी का नेतृत्व पुलिस महानिदेषक स्तर के आईपीएस अधिकारी करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि राज्य सरकार को सड़क चौड़ीकरण परियोजना लागू करने से पहले कुछ खास बातों का पालन करना चाहिए।

आधिकारिक रिकॉर्ड और मैप के मुताबिक सड़क की मौजूदा चौड़ाई का पता लगाना चाहिए। साथ ही चौड़ीकरण के समय सर्वे करना चाहिए और पुराने रिकॉर्डस को देखकर यह पता लगाना चाहिए कि कितना अवैध अतिक्रमण हुआ है। अगर अवैध अतिक्रमण पाया जाता है तो ऐसा करने वाले को उचित तरीके से लिखित नोटिस जारी कर, अतिक्रमण हटाने के लिए कहा जाना चाहिए। अगर सड़क चौड़ीकरण के समय राज्य सरकार को भूमि की जरूरत है तो कानून के मुताबिक भूमि का अधिग्रहण किया जाना चाहिए।