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व्यंग:रावण हर किसी के अंदर घुसा बैठा है,आधार कार्ड बनवा चुका और नागरिकता के पूरे काग़ज़ात भी!

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व्यंग:रावण हर किसी के अंदर घुसा बैठा है,आधार कार्ड बनवा चुका  और नागरिकता के पूरे काग़ज़ात भी !

मुकेश नेमा

दशहरा के दिन सारे हिंदुस्तानी लगे पड़े रहे फ़ेसबुक पर ,ट्विटर व्हाट्सएप पर। मार दो ,मार दो ,अपने अंदर के रावण को मार दो। मज़े की बात ये है कि हर आदमी को पक्का भरोसा है कि सामने वाले के अंदर एक रावण मौजूद है। और वो उसे मारना नहीं चाहता। उसे ये पता नहीं कि सामने वाला भी उसके बारे में सेम टू सेम यही सोचता है। दरअसल रावण हर किसी के अंदर घुसा बैठा है। आधार कार्ड बनवा चुका वो और नागरिकता के पूरे काग़ज़ात भी है उसके पास। ऐसे में उसे बाहर धकियाना ,निपटाना मुश्किल होगा। और फिर सबसे बड़ी बात रावण को मारने के लिये राम चाहिए । ऐसे मौके बिरले ही मिलेंगे आपको जब हमे लगे कि राम हमारे या सामने वाले के अंदर मौजूद है। राम विदा कर दिये गये है ऐसे मे अंदर का रावण निश्चिंत बैठा है। वह जानता है कि उसे मारने बाबत ये सारी कहासुनी बेमतलब का बवाल है। और लोग ऐसा केवल इसलिये कह रहे हैं क्योंकि दशहरा है।

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और फिर मरने मारने पर उतारू भाईसाहबो से मेरा सवाल यह भी है कि रावण को मारना ही क्यों है ? और यदि उसे दशहरे पर मारना ही था तो साल भर उसे तर माल खिला कर बड़ा करने में क्या तुक था।

रावण अंदर कैसे बना हुआ है हमारे ? दरअसल लोगों को अपना रावण तो भला भला लगता है और दूसरो के रावण से तकलीफ़ होती है। दूसरों के रावण से असुरक्षित महसूस करते है हम सभी। और बस यही चाहना होती है सभी की दुनिया भर के रावण चल बसे और हमारा वाला निष्कंटक राज्य करे। सोने की लंका हो तो हमारी हो। बाक़ी पूरी दुनिया तपस्वी राम हो जाये ,दर दर भटके और हम मूँछों पर ताव देते हुये राज करे।

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आप पुरानी सत्तर के जमाने की ,कोई भी हिंदी फ़िल्म देख लें। शुरू की तेईस रील हीरो पिटता था। बेरोज़गार फिरता था। विधवा माँ सिलाई करके घर चलाती थी उसकी और विलेन अपने रंगबिरंगे अड्डे पर शराब की नदियाँ बहाता मोना डार्लिंग के साथ ऐश करता था। और बस फिल्म के आखरी सीन मे पिटता था। शिक्षाप्रद फिल्में होती थी वो। इन फ़िल्मों से हम सभी यह सीखे कि तेईस रीलों के मज़े के लिये आख़री के चुनिंदा सीनो मे पिटने मे क्या ख़राबी हो सकती है ? सोने की लंका हमेशा भारी पड़ती है चित्रकूट पर । यही वजह है कि रावण हमारे अन्तरमन मे बसा है और राम जंगल जंगल भटकते है।

सच बात तो यह है कि हमारे अंदर वाला रावण ही हमे महफ़ूज़ रखे हुये है।वही लड़ता भिड़ता रहता है दूसरों के रावण से। यदि किसी को यह खबर हो जाये कि आप अपने रावण से हाथ धो बैठे है तो वो पहली फ़ुरसत में आपकी नाभि में तीर मार देगा।

यह बात गाँठ में बाँध लें लोग आपके रावण को मरवा कर आपको निहत्था कर देने पर तुले है। निहत्थे हुए आप और निपटे। इसलिये लफ्फाजो की बातों में आने से बचें। अपने अंदर के रावण से पूरी इज़्ज़त से पेश आये महफ़ूज़ रखे उसे ,और दूसरो की ही तरह बाक़ी दुनिया को अंदर के रावण को मार देने की सलाहे देते रहें। इसी मे सार है और हम सभी को यही करना चाहिए।

मुकेश नेमा

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