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IAS सैयद अली मुर्तजा रिज़वी का VRS बना राजनीतिक विवाद का केंद्र

आबकारी मंत्री का दावा — एआईजी अस्पताल से ₹10 लाख की नौकरी मिली, अस्पताल ने कहा "सिर्फ चर्चा चल रही है"

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IAS सैयद अली मुर्तजा रिज़वी का VRS बना राजनीतिक विवाद का केंद्र

– रुचि बागड़देव की रिपोर्ट

Hyderabad : तेलंगाना के वरिष्ठ IAS अधिकारी सैयद अली मुर्तजा रिज़वी की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। आबकारी मंत्री जुपल्ली कृष्ण राव ने दावा किया है कि रिज़वी को AIG Hospital में ₹10 लाख प्रतिमाह के वेतन पर नौकरी मिली है, जिसके चलते उन्होंने सेवा से स्वैच्छिक रिटायरमेंट का विकल्प चुना। हालांकि, एआईजी अस्पताल की ओर से जारी प्रतिक्रिया में कहा गया है कि “रिज़वी से बातचीत जरूर हुई है, लेकिन नियुक्ति को लेकर अभी तक कोई औपचारिक अनुबंध या वेतन निर्धारण नहीं हुआ है।

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*कौन हैं सैयद अली मुर्तजा रिज़वी*

1999 बैच के IAS अधिकारी सैयद अली मुर्तजा रिज़वी ने अपने प्रशासनिक करियर में कई अहम पदों पर काम किया है। वे बीआरएस शासनकाल के दौरान स्वास्थ्य सचिव और हाल ही में प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य एवं वाणिज्य कर) के पद पर तैनात थे। स्वास्थ्य सेवाओं के आधुनिकीकरण और आरोग्यश्री योजनाओं में उनके निर्णयों को लेकर वे कई बार विवादों में भी रहे।

रिज़वी ने 31 अक्टूबर 2025 से प्रभावी वीआरएस का आवेदन दिया है, जिसे राज्य सरकार ने स्वीकार भी कर लिया है। उनकी सेवा अवधि में अभी लगभग दस वर्ष बाकी थे।

**आबकारी मंत्री का गंभीर आरोप**

मामला तब राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन गया जब आबकारी मंत्री जुपल्ली कृष्ण राव ने सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगाया कि रिज़वी ने वीआरएस इसलिए लिया क्योंकि उन्हें एआईजी अस्पतालों में ₹10 लाख प्रति माह की नौकरी का ऑफर मिला है।

राव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा—“रिज़वी ने उच्च वेतन वाली नौकरी के चलते सेवा छोड़ने का फैसला किया। जब वह खुद निजी क्षेत्र में जा रहे हैं, तो आबकारी विभाग के टेंडरों को रोकने का कोई औचित्य नहीं बनता।”

**होलोग्राम टेंडर विवाद का पेंच**

दरअसल, मंत्री राव और रिज़वी के बीच मतभेद की जड़ उच्च सुरक्षा होलोग्राम टेंडर का मामला है। यह वही होलोग्राम हैं जो शराब की बोतलों पर लगाए जाते हैं, जिनसे आबकारी विभाग बोतल की उत्पादन से लेकर बिक्री तक की ट्रैकिंग कर पाता है।

मंत्री राव का आरोप है कि रिज़वी ने नई निविदा प्रक्रिया में जानबूझकर देरी की, जिससे पुराने विक्रेता को 2019 से अब तक बिना प्रतिस्पर्धा के काम जारी रखने का मौका मिला।

राव ने मुख्य सचिव को शिकायत भेजकर कहा कि– “जब टेंडर ही जारी नहीं किए गए, तो मुख्यमंत्री के दामाद या किसी अधिकारी पर सवाल उठाने का कोई मतलब नहीं। रिज़वी ने 14 महीने में एक भी बैठक नहीं की और फ़ाइलें 4 से 5 महीने तक रोकी रहीं, जिससे सरकार को करीब ₹230 करोड़ का राजस्व नुकसान हुआ।”

**एआईजी अस्पताल की सफाई**

मंत्री के इस बयान के बाद जब मामला मीडिया में उछला, तो एआईजी अस्पताल ने स्पष्ट किया कि रिज़वी से “संभावित पद” को लेकर चर्चा चल रही है, लेकिन अभी तक कोई औपचारिक अनुबंध या वेतन निर्धारण नहीं हुआ है।

अस्पताल प्रबंधन के मुताबिक– “रिज़वी एक अनुभवी प्रशासक हैं और उनसे बातचीत प्रारंभिक स्तर पर हुई है। किसी नियुक्ति का अभी कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है।”

**राजनीतिक हलकों में गर्माहट**

रिज़वी के वीआरएस और टेंडर विवाद ने तेलंगाना की राजनीति को नए मोड़ पर ला दिया है। पूर्व सत्तारूढ़ दल बीआरएस ने सरकार पर नौकरशाहों को “राजनीतिक प्रतिशोध” के तहत निशाना बनाने का आरोप लगाया है, जबकि सरकार का दावा है कि वह “पारदर्शिता और जवाबदेही” के सिद्धांत पर काम कर रही है।

बीआरएस प्रवक्ता ने कहा- “रिज़वी जैसे अधिकारियों को निशाना बनाकर कांग्रेस सरकार अपने अफसरशाही पर दबाव बनाना चाहती है।”

**क्यों अहम है यह मामला**

रिज़वी न केवल एक वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं, बल्कि उन्हें तेलंगाना प्रशासन में “नीतिगत फैसलों के विशेषज्ञ” के रूप में जाना जाता है। उनके वीआरएस और उसके पीछे के कारणों पर उठे सवाल नौकरशाही की कार्यशैली और राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच के तनाव को उजागर करते हैं।

राज्य प्रशासनिक हलकों में अब चर्चा है कि क्या यह केवल एक “नौकरी का मामला” है या इसके पीछे राजनीतिक मतभेदों की बड़ी पटकथा छिपी है।

सैयद अली मुर्तजा रिज़वी का VRS फिलहाल तेलंगाना की नौकरशाही और राजनीति के लिए एक “टेस्ट केस” बन गया है। जहां एक ओर आबकारी मंत्री इसे “व्यक्तिगत लाभ का मामला” बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” कह रहा है।

सच क्या है– यह तो समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि रिज़वी की यह विदाई शांतिपूर्ण नहीं रही।