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राज-काज: सरकारी बंगलाें के मोह में नेता करा रहे अपनी फजीहत….

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राज-काज: सरकारी बंगलाें के मोह में नेता करा रहे अपनी फजीहत….

* दिनेश निगम ‘त्यागी’

सरकारी बंगलाें के मोह में नेता करा रहे अपनी फजीहत….

– दिल्ली में अरविंद केजरीवाल रहे हों, प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हों या फिर जीता-हारा कोई भी अन्य राजनेता, सरकारी बंगलों के मोह से मुक्त नहीं हो पा रहा है। केजरीवाल बदनाम हुए क्योंकि उन्होंने सरकारी बंगले को शीशमहल बना दिया था। शिवराज चर्चा में हैं क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते अपने लिए दो बंगलों को एक कर लिया और उनके रिनोवेशन में करोड़ों खर्च कर डाले। ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित अन्य कई नेता भी बंगला प्रेम के लिए चर्चित रह चुके हैं। कुछ अन्य नेता बंगलों के मोह में अपनी फजीहत करा रहे हैं लेकिन बंगला छोड़ने के लिए तैयार नहीं। इनमें एक हैं पूर्व मंत्री रामपाल सिंह। ये विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं लेकिन सरकारी बंगला खाली करने के लिए तैयार नहीं हैं। प्रभात झा अब इस दुनिया में ही नहीं हैं लेकिन उनके बेटे आवंटित बंगला नहीं छोड़ना चाहते। इन दोनों को 13 जनवरी तक बंगला खाली करने का नोटिस भेजा गया है। स्वत: खाली न करने पर जबरन खाली कराने की चेतावनी दी गई है। इसी तरह पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा, यशोधरा राजे सिंधिया, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और अरविंद सिंह भादौरिया भी सरकारी बंगलों में काबिज हैं लेकिन छोड़ने लिए तैयार नहीं हैं। इनमें से कोई ऐसा नहीं है, जो खुद के बंगले में न रह सकता हो लेकिन सरकारी बंगले के मोह में अपनी छीछालेदर करा रहे हैं।

 * जिसे दलितों को जोड़ने का दायित्व सौंपा, वे ही खफा….* 

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– कांग्रेस से दलितों का मोह पहले ही भंग हो चुका है। इस वर्ग को पार्टी के साथ जोड़ने की लगातार कोशिश हो रही है। इसकी जवाबदारी कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार को सौंप रखी गई है लेकिन वे ही प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व से खफा हैं। उनके एक बयान से दलितों को कांग्रेस से जोड़ने की कोशिशों काे धक्का तो लगा ही, पार्टी के अंदर हड़कंप मच गया। विडंबना यह है कि एक तरफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी कह रहे हैं कि विपक्ष की जवाबदारी मजबूती से निभाने में हमसे कमी रह गई और दूसरी तरफ उनही ही मौजूदगी में प्रदीप अहिरवार कह रहे हैं कि प्रदेश कांग्रेस द्वारा दलितों को तवज्जो नहीं दी जाती। सावित्रीबाई फुले की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में प्रदीप ने आरोप लगाया कि प्रदेश कांग्रेस में दलितों को सम्मान नहीं मिलता। दलितों के अपमान की घटनाओं पर कांग्रेस के विधायक विधानसभा में आवाज नहीं उठाते। उन्होंने यह भी कहा कि हम अपना पैसा लगाते हैं और कांग्रेस को समय देते हैं, लेकिन बदले में सम्मान नहीं मिलता। प्रदीप जब ये आरोप लगा रहे थे तब मंच पर जीतू पटवारी खुद मौजूद थे। साफ है कि खुले आम उनके नेतृत्व पर ही सवाल उठाए जा रहे थे। सवाल यह है कि जब दलितों को पार्टी के साथ जोड़ने का दायित्व संभालने वाले को ही शिकायत है तो कांग्रेस अपने उद्देश्य में सफल कैसे होगी?

 *जीतू पटवारी ने खुद स्वीकार कर ली अपनी नाकामी….!* 

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– कमलनाथ के लगभग डेढ़ साल के कार्यकाल को छोड़ दें तो कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए लंबे समय से जद्दोजहद कर रही है। काफी विमर्श के बाद कांग्रेस आलाकमान ने प्रदेश में पार्टी को खड़ा करने का दायित्व युवा जोड़ी जीतू पटवारी और उमंग सिंघार के कंधों पर डाला। ये दोनों अपने-अपने स्तर पर कांग्रेस को मजबूत करने की दिशा में सक्रिय नजर भी आते हैं लेकिन यदि प्रदेश अध्यक्ष पटवारी ही कह दें कि कांग्रेस को विपक्ष की जिम्मेदारी और मजबूती से निभानी चाहिए थी, लेकिन इसमें कहीं न कहीं कमी रही। उन्हें यह भी कहना पड़े कि जनता की आवाज को और प्रभावी ढंग से उठाने में पार्टी को और सक्रिय होना होगा। इसका मतलब तो यह हुआ कि खुद प्रदेश अध्यक्ष पटवारी ने अपनी नाकामी स्वीकार कर ली। वे खुद मान रहे हैं कि कांग्रेस विपक्ष के तौर पर मजबूती से अपना दायित्व निभाने में असफल है। सवाल यह पैदा होता है कि यदि ऐसा है तो इसके लिए जवाबदार कौन है? पटवारी ने यह बात इंदौर में उस समय कही जब वे दूषित पेयजल से हुई मौतों के सिलसिले में कैलाश विजयवर्गीय का इस्तीफा मांगते हुए दोषियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की बात कर रहे थे। दरअसल, जब से कांग्रेस सत्ता से बाहर है तब से ही पार्टी का कोई न कोई नेता सेल्फ गोल वाले बयान दे डालता है। पटवारी का यह बयान भी इसी श्रेणी का है।

 * पानी पर नेताओं के बयान छिड़क रहे जले में नमक….* 

– इंदौर में दूषित पानी पीने से 20 मौतों और हजारों के बीमारी की चपेट में आने के बाद प्रदेश भर में पेयजल सिस्टम की नाकामी उजागर होने लगी है। लगभग हर बड़े और छोटे शहर से दूषित पेयजल आपूर्ति की खबरें सामने आ रही हैं। कई जगह यह पानी जहर बन गया है। व्यवस्था को ठीक करने की बजाय कुछ नेता अपने बयानों से लोगों के घाव में छिड़क रहे हैं। पहले इंदौर के कुछ नेताओं के बयानों ने जहर घोला और अब खंडवा सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने एक सवाल के जवाब में शर्मनाक बयान दे डाला। उन्होंने कहा कि खंडवा हो, नगर निगम, नगर पालिका, नगर परिषद हो या कोइ भी ग्राम पंचायत, इंदौर की घटना से हम सभी को सबक लेना चाहिए। सिर्फ सरकार ही सब कुछ करे, सरकार के भरोसे हम रहें, ये ठीक नहीं है। जनता की भी एक जिम्मेदारी बनती है। इस तरह सांसद ने सीधे जनता को ही सफाई का जिम्मा सौंप दिया और गंदगी का ठीकरा उनके सिर पर फोड़ दिया। सवाल यह उठता है कि क्या अब जनता खुद सड़कें खोद कर पाइप लाइन बिछाए और निगम की टंकियों को साफ कर सप्लाई वाला पानी घर-घर पहुंचाने का काम करे। नेताओं की इस मानसिकता के कारण ही लोग पानी की जगह जहर पीने को मजबूर हैं। पेयजल सप्लाई की जवाबदारी निकायों के पास है और यहां चुने हुए नेता ही बैठे हैं।

 *0 कई सर्वे रिपोर्ट खोल चुकीं पेयजल सिस्टम की पोल….!* 

– इंदौर सहित प्रदेश के कई शहर अलग-अलग श्रेणियों में लगातार स्वच्छता आवार्ड हासिल कर रहे हैं जबकि कई एजेंसियों की सर्वे रिपोर्ट्स बताती हैं कि प्रदेश में पेयजल सप्लाई का पूरा सिस्टम फेल है। पीने का पानी जहर बन रहा है, पर सरकार नहीं चेतती। मध्य प्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य कार्य योजना 2022-27 के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016 से 2020 तक सिर्फ 5 साल में राज्य के 10 जिलों में 18 लाख 93 हजार 673 लोग पानी से होने वाली बीमारियों से प्रभावित हुए। हेल्थ डेटा और हालिया घटनाएं साफ संकेत देती हैं कि इंदौर, भोपाल, उज्जैन और ग्वालियर जैसे शहरी इलाकों में पानी की गुणवत्ता पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है। इंदौर में बीते वर्षों में दूषित पानी से बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े, मौतें हुईं लेकिन नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही तय नहीं हुई। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट नंबर 3/2019 सरकार की पोल पहले ही खोल चुकी है। इसके अनुसार इंदौर और भोपाल नगर निगमों ने 8.95 लाख परिवारों को दूषित पेयजल सप्लाई किया। पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट ने 2013 से 2018 के बीच 5.45 लाख पानी से होने वाली बीमारियों के मामले दर्ज किए। साफ है कि सरकार की नाक के नीचे सब उसकी जानकारी में होता रहा, लेकिन हालात सुधारने की कोशिश नहीं हुई।

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