WhatsApp Image 2025 08 07 At 9.31.47 PM
Home न्यूज़ प्रादेशिक

Curbing The Arbitrariness of Private Schools : अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने उठाया निजी स्कूलों की मनमानी का मुद्दा!

अभिभावकों पर आर्थिक भार डालने पर रोक लगाने के लिए कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन!

350

Curbing The Arbitrariness of Private Schools : अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने उठाया निजी स्कूलों की मनमानी का मुद्दा!

Ratlam : निजी शिक्षण संस्थाओं की मनमानी रोकने के लिए अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत की रतलाम इकाई ने प्रांतीय उपाध्यक्ष अनुराग लोखंडे के नेतृत्व में कलेक्टर कार्यालय में आयोजित जनसुनवाई में लिखित शिकायत दर्ज कराई गई। ग्राहक पंचायत शिक्षण संस्थाओं द्वारा पुस्तकों, यूनिफार्म और फीस आदि के माध्यम से अभिभावकों पर हर साल अनावश्यक रूप से डाले जाने वाले आर्थिक भार पर प्रभारी रोक लगाने की मांग की गई। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने प्रशासन को बताया कि सभी बच्चों को अच्छी और गुणवत्तायुक्त शिक्षा सुलभ हो इसके लिए भारत सरकार और मप्र सरकार प्रतिबद्ध है। इसके बावजूद हर साल अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत को अभिभावकों के माध्यम से निजी स्कूलों द्वारा अनावश्यक आर्थिक भार डालने की शिकायतें मिलती रहती हैं। चूंकि वर्तमान में भी स्कूलों में प्रवेश की प्रक्रिया चल रही है अतः तत्काल प्रभाव से ऐसी ठोस व्यवस्था और निगरानी हो ताकि निजी स्कूल प्रबंधन एन-केन-प्रकारेण अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ नहीं डाल सकें।

 

प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर से कहा कि अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत चाहती है कि जिला प्रशासन द्वारा ऐसी व्यवस्था और मॉनिटरिंग की जाए जिससे अभिभावक अनावश्यक आर्थिक भार वहन किए बिना अपने बच्चों को अच्छी और गुणवत्तायुक्त शिक्षा दिलवा सकें। इसके लिए प्रशासन और अभिभावकों की एक ऐसी संयुक्त टीम गठित करने का सुझाव भी दिया जो स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया चलने के दौरान आकस्मिक जांच कर सके। इस टीम में ग्राहकों/उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं/संगठनों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना चाहिए ताकि कार्रवाई निष्पक्ष रूप से हो सके। इस टीम की रिपोर्ट पर तत्काल कार्रवाई हो इसकी, इसकी व्यवस्था करने की मांग भी की गई। प्रतिनिधिमंडल में प्रांतीय उपाध्यक्ष अनुराग लोखंडे, महेंद्र भंडारी, सत्येन्द्र जोशी, श्याम ललवानी, नरेश सकलेचा, संजीव राव, जिला प्रचार प्रमुख नीरज कुमार शुक्ला आदि शामिल रहें।

IMG 20260225 WA0043

इन बिंदुओं पर आकर्षित किया ध्यान!

स्कूलों द्वारा एनसीईआरटी द्वारा नियत पाठ्यक्रम और पुस्तकों के अलावा भी निजी पब्लिशर्स की पुस्तकें अनिवार्य कर दी जाती हैं जो काफी महंगी होती हैं। प्रायः इन पुस्तकों में पाठ्यवस्तु में रिक्त स्थानों की बहुलता होती है जिन्हें विद्यार्थियों को पुस्तक में ही पूर्ण करना होता है। ऐसी पुस्तकों को पाठ्यक्रम में शामिल करने एक बड़ी वजह यह है कि इनका अगले वर्ष उपयोग नहीं हो सके जिससे विद्यार्थियों को हर साल नई पुस्तक क्रय करना पड़े। ज्यादा रिक्त स्थान होने से पुस्तकों का आकार-प्रकार भी बढ़ता जाता है जिससे उनकी लागत भी बढ़ती हैं। निजी प्रकाशकों की होने से इनके दाम भी बहुत ज्यादा होते हैं। अतः ऐसी पुस्तकों को चलन में लाने से रोका जाना चाहिए, स्कूल प्रबंधन प्रतिवर्ष लगभग हर कक्षा के पाठ्यक्रम में एक-दो पुस्तकें बदल दी जाती हैं जो निजी प्रकाशकों की ही होती हैं। ऐसा करने के पीछे संस्था संचालकों का उद्देश्य सिर्फ अभिभावकों को नई पुस्तकें क्रय करने के लिए बाध्य करना है। अतः जब तक पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं हो तब तक अनावश्यक नई पुस्तकों को न तो शामिल किया जाए और न ही बदला जाए, ताकि- विद्यार्थी पुरानी पुस्तकों का पुनः उपयोग कर सकें और अभिभावकों पर आर्थिक भार नहीं पड़े।

स्कूल प्रबंधन द्वारा हर वर्ष किसी न किसी कक्षा की यूनिफार्म भी बदल दी जाती है जिसका कोई उचित आधार नहीं होता है। इस पर भी ठोस और उचित रोक लगाए जाने की आवश्यकता है, लगभग हर निजी संस्था का किसी न किसी दुकान संचालक से आर्थिक अनुबंध होता है जिससे उनके द्वारा हर साल अभिभावकों को उन्हीं दुकानों से ही पुस्तकें, यूनिफार्म और अन्य शिक्षण सामग्री खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है। कई विद्यालयों द्वारा तो ये सामग्री अपने यहां से ही प्रदाय की जाती हैं और अभिभावकों से उसकी मनमानी कीमत वसूली जाती है।