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कविता-प्रकृति का चैतन्य

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प्रकृति का चैतन्य

 डॉ. रश्मि जोशी

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असीम होकर भी झुका हुआ,
अपने डैनों पर रुका हुआ,
कोई पंछी उड़कर आया है,
जिसने आकाश बनाया है!

किस गुरु-आँगन में जाकर यह
अविरल प्रवाह सीख आती है,
गति से कंकर को शंकर कर
मृदुल भजन सुनाती जाती है,
यह नदी कहाँ से आती है!

ओस-बिंदु ने हृद अपने
सकल आकाश समाया है,
प्रकृति ने किस कौशल से
यह अद्भुत दर्पण बनाया है!

फूलों की कोमल पाखों ने
क्या अनुपम धैर्य सँजोया है,
काँटों को भी अपना कहकर
स्नेहिल अपनत्व सिखाया है।

यह प्रकृति की ममता-माया है,
जिसमें चैतन्य समाया है,
इसके कण-कण के स्पंदन ने
जीवन का अर्थ बताया है।

नभ, निर्झर, वन, पर्वत, सागर,
सब परम तत्त्व का सतत स्वर।
यह दृश्य नहीं, उपदेश नहीं,
न ही केवल सौंदर्य-विन्यास,
प्रकृति तो परम चेतना का
जीवंत रूप , संदेश प्रकाश,

जब जब प्रकृति के सानिध्य में
क्षण भर भी मन को साधा है,
तब तब अपने ही अंतस में
ईश्वर का स्पर्श समाया है।