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ऊधौ मोहि ब्रिज बिसरत नाही

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RAKESH ANCHAL

सत्ता के लिए तीन दशक पुराने रिश्तों को त्यागकर कांग्रेस और एनसीपी के साथ खड़ी शिवसेना महाराष्ट्र और राष्ट्र में अगले चुनावों से पहले दोबारा भाजपा की नव में सवार हो जाये तो किसी को हैरानी नहीं होना चाहिए .महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने इस बारे में संकेत देना शुरू कर दिए हैं .दरअसल शिवसेना तीन साल बीतने के बावजूद कांग्रेस और एनसीपी के साथ सहज नहीं हो प् रही है .
क्रिकेट और राजनीति का स्वभाव एक जैसा है.इन दोनों में कब क्या हो जाये,कोई नहीं जानता .सब कुछ समय और परिस्थितियों पर निर्भर करता है. पिछले दिनों औरंगाबाद में एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भाजपा के वरिष्ठ नेता और रेल राज्य मंत्री राव साहेब दानवे की ओर देखते हुए उन्हें अपना पूर्व और भावी सहयोगी बताया।इसके जवाब में मंत्री रावसाहब दानवे ने कहा कि शिवसेना और भाजपा के साथ आने से मतदाता खुश होंगे। दोनों नेताओं के इस बयान के बाद राज्य में सियासी अटकलबाजियां एक बार फिर शुरू हो गई है।
राजनीति में शिवसेना और भाजपा का डीएनए लगभ्ग एक जैसा है. दोनों तीव्र हिंदुत्व की पक्षधर पारितियाँ हैं. इसी बिना पर दोनों दलों के बीच तीन दशक तक खूब निभी,लेकिन 2019 में भाजपा के बदले हुए तेवरों से नाराज होकर शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी के साथ खड़ी हो गयी थी.इसका प्रतिसाद भी शिवसेना को मिला.सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री बनने का सपना कांग्रेस और एनसीपी ने ही पूरा किया .शिवसेना अपने वजूद को बचाये रखने के लिए असंगत राजनीति कर तो गयी लेकिन अब उसे कांग्रेस और एनसीपी के साथ अपना भविष्य नजर नहीं आ रहा इसलिए सेना प्रमुख ने नहाजपा में अपने शुभचिंतकों के जरिये पुन : संबंध स्थापित करने की शुरुवात कर दी है .
शिवसेना की वजह से सत्ताच्युत हुए पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के नेता देवेंद्र फडणवीस कहते हैं कि राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है। उनका कहना है कि -‘हालांकि भाजपा की भूमिका बहुत स्पष्ट है। हम सत्ता की ओर नहीं देख रहे हैं। हम एक सक्षम विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं।’
ठाकरे का सनकेट पाते ही शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत भी सक्रिय हो गए.उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कसीदे काढ़ना शुरू कर दिया है राउत ने बिना किसी देरी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर उन्हें बधाई दी और कहा कि-‘ मोदी जैसे कद का कोई दूसरा नेता भारत में नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद बीजेपी को शिखर पर लाने का काम पीएम मोदी ने किया है। पहले बीजेपी दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन करके सरकार बनाती थी, लेकिन पीएम मोदी के कार्यकाल में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला है।’
आपको याद होगा कि सुशांत सिंह मामले के बाद शिवसेना और भाजपा के रिश्तों में अचानक खटास बढ़ गयी थी. संजय राउत भाजपा के शीर्ष नेताओं को लगभग गरियाने लगे थे,लेकिन अब सब कुछ बदला-बदला सा नजर आ रहा है.मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के संकेतों के बाद एनसीपी नेता और उप मुख्यमंत्री अजित पवार ने कहा, ‘वह राज्य के मुखिया हैं। मैं कैसे कहूं कि उनके मन में क्या चल रहा है? गौरतलब है कि अजित पंवार भी पूर्व में भाजपा में जाकर रातोंरात एनसीपी में वापस आ गए थे. वे एनसीपी नेता शरद पंवार के राजनितिक उत्तराधिकारी भी माने जाते हैं.
शिवसेना का दुर्भाग्य ये है कि अपने जन्म से लेकर आजतक उसे महाराष्ट्र के बाहर कोई ज्यादा समर्थन नहीं मिला.उसकी हैसियत भी बसपा और सपा जैसी ही क्षेत्रीय दल की तरह सीमित होकर रह गयी है..शिवसेना को अनुभव होने लगा है कि भाजपा का हाथ पकड़कर उसे महाराष्ट्र में सत्ता से जोड़े रखने में कोई अड़चन नहीं होने वाली लेकिन कांग्रेस के साथ उसकी ज्यादा दिनों तक निभने वाली नहीं है.,क्योंकि कांग्रेस और शिवसेना का चाल,चरित्र और चेहरा कांग्रेस से बिकुल अलग है .भाजपा भी महाराष्ट्र में सत्ता के खेल में मात खाने के बाद सम्हलकर चलती दिखाई दे रही है .
महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना गठबंधन ने 1995 में पहली बार कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था अन्यथा राज्य में कांग्रेस का ही एकछत्र राज्य था .अपनी गलतियों की वजह से सत्ताच्युत हुयी कांग्रेस 1999 में फिर सत्ता में वापस आ गयी लेकिन पहले जैसी स्थिरता नहीं दे सकी .कांग्रेस 2014 तक सत्ता में रही लेकिन उसके मुख्यमंत्री जल्दी,जल्दी बदले गए. राष्ट्रपति शासन के बाद 2014 में भाजपा शिवसेना के साथ फिर सत्ता में वापस तो लौटी लेकिन सत्ता के बंटवारे को लेकर पांच साल बाद ही दोनों में अनबन हो गयी और भाजपा को मात्र तीन दिन बाद ही सत्ताच्युत होना पड़ा था …
महाराष्ट्र में राजनीति का रंग यूपी की राजनीति जैसा हो गया है. महाराष्ट्र में भी शिवसेना बसपा की तरह अवसरवादी राजनीति में पारंगत हो गयी है .अब देखिये आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीती किस करवट बैठती है ?