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भाजपा की चार राज्यों में वापसी, हवा के विपरीत जंग जीतने जैसा कमाल!

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पाँच विधानसभाओं के चुनाव परिणामों की उत्तेजना की धूल अब बैठ चुकी है।इन विधानसभाओं के चुनावों के पहले सभी विश्लेषकों द्वारा इन चुनावों को अत्यधिक महत्वपूर्ण और 2024 की लोक सभा चुनाव की दिशा बताने वाला कहा गया था। इनमें गोवा और मणिपुर में कुछ विरोध के बाद तथा उत्तरांचल में सरलता से BJP ने दोबारा सत्ता प्राप्त कर ली।

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पंजाब का चुनाव असाधारण चुनाव था जिसमें स्टार्टअप आप पार्टी ने अपने शैशव काल में ही पंजाब जैसे राज्य पर क़ब्ज़ा कर लिया है। कांग्रेस हाई कमान के द्वारा कैप्टन अमरेंद्र सिंह को हटाना और सिद्धू को भेजना तथा चन्नी की जाति पार्टी के काम नहीं आयी। वास्तविकता यह है कि पंजाब में बदलाव की आकांक्षा पिछले कई दशको की अकाली और कांग्रेस सरकारों की घोर अव्यवस्थाओं के कारण बहुत बलवती थी। पंजाब के बाद अब आप पार्टी का एजेंडा पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि वह उन राज्यों में पैर पसारने का प्रयास करेगी जहां केवल कांग्रेस पक्ष या विपक्ष में है।

इन चुनावों में न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व का ध्यान भारत के हृदय स्थल भारी भरकम राज्य उत्तर प्रदेश की तरफ़ था। यहाँ एंटी इंकम्बेंसी अपने चरम पर थी। बेरोज़गारी, महँगाई, कोविड-19 काल में अव्यवस्था, किसान आंदोलन जैसी अनेक विपरीत हवाओं का सामना योगी को इस चुनाव में करना पड़ा। इस सबके उपरांत भी जिस ऊर्जा के साथ BJP वापस सत्ता में आयी है उसने पूरे भारत की सभी विपक्षी पार्टियों को हताश कर दिया है। योगी की जीत में हिंदुत्व के साथ क़ानून व्यवस्था का बुल्डोजर और तकनीक की सहायता से लाभार्थियों को सटीक लाभ पहुँचाने वाली अनेक प्रकार की योजनाएँ थी।

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इसी के साथ अमित शाह की बनायी हुई चुनाव की मज़बूत गाड़ी के पहिए इस बार भी भारी पड़े। कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका गांधी को समस्त अधिकार देकर उत्तर प्रदेश भेजा था। उन्होंने पार्टी का नारा ‘मैं लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ दिया। उन्होंने 40 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देने के साथ धुआँधार प्रचार किया। इसके बावजूद 7 सीटों से 2 सीटें हो गईं।वोट प्रतिशत 6.25% से 2.33% रह गया। अखिलेश यादव के साथ अल्पसंख्यकों का ज़बरदस्त ध्रुवीकरण हुआ तथा अनेक जातियों का संगठन एकत्र हुआ। सपा ने दूसरे विपक्षी दलों को तो साफ़ कर दिया लेकिन वह विक्टरी पॉइंट से बहुत दूर रह गयी।

सत्तारुढ़ दल के कुछ लोग कांग्रेस को चिढ़ाने के लिए यह याद दिलाते रहते हैं कि प्रजातंत्र में सशक्त विपक्ष का होना आवश्यक है। भारत का पूरा विपक्ष कांग्रेस का सहारा लिए बिना राष्ट्रीय स्तर पर सफल नहीं हो सकता है।विपक्षी एकता की धुरी कांग्रेस ही हो सकती है। लेकिन विरोधाभास यह है कि TMC और आप जैसी पार्टियां कांग्रेस के वोट बैंक को ही खाने के लिए तत्पर दिख रही है।

कांग्रेस क गांधी परिवार का नेतृत्व जनता में प्रभावहीन हो चुका है तथा यह पार्टी एक ऐसे दलदल में फँस चुकी है जहाँ गांधी परिवार के बिना उसके विघटन का ख़तरा है और इस परिवार को सर माथे पर लेकर चलने से जनता को प्रभावित करना असंभव होता जा रहा है।इन चुनावों के बाद फिर कांग्रेस में वही सब हुआ जो उसमें सभी पूर्व हारों के बाद होता रहा है।अब एक बार फिर कांग्रेस आगामी हार अथवा किसी छोटी मोटी जीत के लिए प्रतीक्षारत है।

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मोदी विरोधी एक वरिष्ठ पत्रकार सागरिका घोष ने कांग्रेस सहित विपक्ष को यह सलाह दी है कि वे 2024 के लोक सभा चुनाव के बारे में सोचना बंद करके 2029 के लोक सभा चुनाव को अपना लक्ष्य बनाकर चलें। इसके विपरीत चुनाव विशेषज्ञ प्रशांत किशोर ने क्षत विक्षत विपक्ष को एक आशा की किरण दिखाई है। उन्होंने कहा है कि यदि विपक्षी पार्टियां और विशेष रूप से कांग्रेस दिन- प्रतिदिन के आधार पर जनता के बीच अभी से काम करना शुरू कर दे तो हिन्दू ध्रुवीकरण के बावजूद BJP को सत्ता से उखाड़ फेंकना संभव है। सम्भवतः कांग्रेस का थका हारा नेतृत्व अधिक परिश्रम, साहस और त्याग के लिए तैयार नहीं हैं।

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