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Flashback: मेरे कार्यकाल की उपलब्धियों में रही पीएचक्यू की इंटेलिजेंस शाखा!

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Flashback: मेरे कार्यकाल की उपलब्धियों में रही पीएचक्यू की इंटेलिजेंस शाखा!

बैतूल में श्रमिक दुर्घटना के बाद जनरल मैनेजर को हथकड़ी लगाने की घटना की जाँच करने आए तत्कालीन स्पेशल DG श्री एम नटराजन ने विस्मयकारी ढंग से मुझे अपनी ही शाखा में लेने के लिए चयनित कर लिया। आदेशानुसार बैतूल पुलिस अधीक्षक का प्रभार सौंप कर 6 जून, 1986 को मैंने इंटेलिजेंस शाखा में AIG सिक्योरिटी का पद ग्रहण कर लिया। मेरी 12 वर्ष की सेवा में यह पहली पदस्थापना पुलिस मुख्यालय में कार्यालयीन कार्य के लिए थी।

पहले दिन फ़ाइलों को देखकर मुझे बड़ा अटपटा सा लगा क्योंकि मुझे फ़ाइलों पर काम करने का कोई अनुभव नहीं था और न ही हमारे प्रशिक्षण में फ़ाइलों के बारे में कुछ सिखाया गया था। यहीं नहीं, मेरे पीए के कार्य के लिए राजकुमार शर्मा को पदस्थ किया गया जो स्वयं नई भर्ती के थे। उन्हें कार्य का अधिक अनुभव नहीं था। विशेष शाखा में घंटी ड्यूटी करने वाले चतुर्थ श्रेणी के एक चतुर कर्मचारी लालता प्रसाद ने मुझे आगाह किया कि आपका पीए कन्या राशि का ( अर्थात् कमज़ोर) है और आप उसे बदलवा लें। परन्तु मुझको उसमें क्षमता की संभावनाएँ दृष्टिगोचर हुई और मैंने उसके साथ ही साथ काम सीखने का निर्णय लिया। शर्मा शीघ्र ही डिक्टेशन लेकर काफ़ी शुद्ध टाइप करने लगे।

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 वे सभी फाइलों के आवागमन का अच्छा ध्यान भी रखने लगे। शर्मा PA के रूप में मेरे साथ पुलिस मुख्यालय में विभिन्न शाखाओं में लगातार चार वर्ष तक रहे और बहुत परिश्रमी और सक्षम सिद्ध हुए।मेरे कार्य में उनकी निष्ठा बहुत सहायक हुई। श्री शर्मा अभी हाल में उनकी मृत्यु होने तक स्वप्रेरणा से मेरे अनौपचारिक सहायक बने रहे।

कुछ ही दिनों में फाइलों का कार्य मुझे सहज लगने लगा। मैं उन्हें बहुत ध्यान से पढ़कर कार्यालय की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करता था। धीरे-धीरे मैंने फ़ाइल पर अपनी स्पष्ट टीप देना प्रारंभ कर दिया। कुछ दिनों के बाद मेरा ध्यान मेरे ही कक्ष में रखी अलमारी के ऊपर रखे हुए एक लाल कपड़े के छोटे बस्ते पर गया। उसे उतरवाकर खुलवाया तो मैं अवाक रह गया। उसमें अन्य काग़ज़ों के ढेर के साथ भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से भेजी गई इंटेलिजेंस ब्यूरो की नई सुरक्षा नीति से संबंधित एक पुस्तिका थी जिस पर त्वरित कार्रवाई करने के निर्देश थे।

उस पर कोई कार्रवाई न करते हुए ( ठंडे) बस्ते में रख दिया गया था। उस पुस्तिका में X,Y,Z श्रेणी की सुरक्षा महत्वपूर्ण व्यक्तियों को दिए जाने के निर्देश थे और इन श्रेणियों के व्यक्तियों के निर्धारण के लिए शासन स्तर पर एक कमेटी गठित करने के निर्देश थे। आज यह सब जानकारी सामान्य बात है परंतु उन दिनों यह एक नवीन अवधारणा थी। श्रीमती इंदिरा गांधी सहित अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों की आतंकवादियों द्वारा की गई हत्याओं के कारण VIP सुरक्षा देश के समक्ष एक बड़ी चुनौती बन गई थी। पुस्तिका का अध्ययन कर जब मैंने कार्रवाई हेतु निर्देश जारी करने के लिए फाइल वरिष्ठ अधिकारियों को प्रस्तुत की तो उन्हें भी इसकी गंभीरता का आभास हुआ। विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए इस पर कार्रवाई तुरंत प्रारंभ कर दी गई। शासन स्तर पर गठित कमेटी में मैं पुलिस मुख्यालय के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया।

17 सितंबर, 1986 को पूना के पास पिंपरी में ट्रक से हुई दुर्घटना के बाद मोटरसाइकिल का चालक सुखदेव सिंह सुक्खा नाम का एक व्यक्ति पकड़ा गया। उसकी मोटरसाइकिल वही थी जो 10 अगस्त को पूना सर्किट हाउस के T जंक्शन पर भारतीय सेना के रिटायर्ड जनरल ए एस वैद्य के दो हत्यारों ने उपयोग की थी। पुलिस हिरासत में पूना और पंजाब पुलिस की पूछताछ में उसने जनरल वैद्य की हत्या करना स्वीकार किया और सभी तथ्यों को उजागर किया। अन्य विवरण के अतिरिक्त उसने यह भी बताया कि वह दो बार (अविभाजित ) मध्य प्रदेश के दुर्ग शहर के एक सिख व्यवसायी के घर पर दो बार रुक चुका था।

इसका समाचार प्राप्त होते ही मध्यप्रदेश विधानसभा में हंगामा हो गया और तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री मोतीलाल वोरा, जो उसी क्षेत्र से थे, पर व्यक्तिगत आक्षेप सदन में लगाए गए। मुझे तत्काल कार्यालय से ही एक DSP और एक निरीक्षक के साथ पूना जाने के लिए आदेशित किया गया। घर से कुछ सामान बुलवाकर मैं एयरपोर्ट के टॉरमैक पर सामान सहित भागते हुए बम्बई के जहाज़ पर चढ़ गया। बम्बई पहुँच कर वहाँ से सड़क मार्ग से पूना पहुँचा। वहाँ अनेक राज्यों की पुलिस पहुँच चुकी थीं। मैंने घटनास्थल का निरीक्षण किया और सुक्खा से गहन पूछताछ की।

हमारी पूना की गतिविधियों की सुर्खियाँ मध्यप्रदेश के समाचारपत्रों में छप रही थीं। अर्जन दास और ललित माकन का हत्यारा सुक्खा और उसका साथी हरजिंदर सिंह ज़िंदा पाकिस्तान के लाहौर जेल में प्रशिक्षित हुए थे।खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स के इन सदस्यों ने हत्याओं के अतिरिक्त बैंकें भी लूटी थीं। जनरल वैद्य की हत्या के उद्देश्य से इन्होंने पूना में एक संपन्न क्षेत्र में किराये का घर ले लिया था। इन्होंने कई दिनों तक जनरल वैद्य की गतिविधियों पर निगाह रखी और विशेष रूप से उनके प्रत्येक रविवार को अपनी पत्नी और गनमैन क्षीरसागर के साथ बाज़ार जाने को बारीकी से देखा।

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10 अगस्त, रविवार को जब जनरल वैद्य की गाड़ी सर्किट हाउस T जंक्शन पर मुड़ने के लिए धीमी हुई तभी इन्होंने मोटरसाइकिल कार की ड्राइविंग साइड की तरफ़ लगा दी और मोटरसाइकिल के पीछे बैठे ज़िंदा ने कार ड्राइव कर रहे जनरल वैद्य की रिवाल्वर से गोली मारकर हत्या कर दी।मार्च 1987 के महीने में दिल्ली पुलिस ने जिन्दा को उसके पैर में गोली मारकर गिरफ़्तार कर लिया। इन दोनों हत्यारों पर बाद में पूना में मुक़दमा चला और इन्हें 9 अक्टूबर, 1992 को यरावडा जेल में फाँसी दे दी गई। पूना में मैंने सुक्खा से सघन पूछताछ की, परन्तु दुर्ग के सिख व्यवसायी के विरुद्ध कोई अपराधिक जानकारी नहीं मिली।भोपाल लौट कर मैंने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसी के आधार पर मध्य प्रदेश की सरकार द्वारा विधानसभा में जानकारी दे दी गई।

AIG सिक्योरिटी के दायित्वों में हवाई अड्डों की सुरक्षा भी सम्मिलित थी। उस समय हवाईअड्डों की सुरक्षा व्यवस्था स्थानीय पुलिस के पास थी और यह कार्य CISF को 2000 के बाद दिया गया। कार्यभार सँभालने के कुछ ही दिनों बाद सबसे पहले मैं भोपाल से ग्वालियर इंडियन एयरलाइंस की बम्बई दिल्ली हॉपिंग फ़्लाइट से वहाँ के एअरपोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था देखने गया। वह मेरी पहली हवाई यात्रा थी और उसके रोमांच का मैं वर्णन नहीं कर सकता। मैं बार बार हवाई जहाज़ के अंदर तथा खिड़की से नीचे झांक रहा था। अचानक मैंने देखा कि मेरी बग़ल में बैठे सहयात्री मुझे बहुत कौतुहल से देख रहे है। मैंने झेंपते हुए उन्हें तुरंत कहा कि मैं पहली बार जहाज़ में बैठा हूँ। सम्भवतः वे मेरी स्वीकारोक्ति से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने बातचीत करना प्रारंभ किया। वे भारत के एक प्रसिद्ध उद्योगपति थे।

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मेरे वरिष्ठ अधिकारी DIG सिक्योरिटी श्री एस सी अग्रवाल अपने कार्य को बहुत गंभीरता से लेते थे। वे उन कुछ अधिकारियों में से थे जो बिलकुल सही समय पर कार्यालय आते थे। उन्होंने मुझे राज्यपाल और मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था की पृथक-पृथक निर्देशिका बनाने का कार्य दिया। इसमें मुख्यमंत्री और राज्यपाल के निवास, कार्यालय, उनकी सभी प्रकार की यात्राओं तथा कार्यक्रमों की सुरक्षा व्यवस्था के लिए स्पष्ट निर्देशों का समावेश करना था। यह काम कठिन भी था और साथ ही संवेदनशील भी। इन निर्देशों में उपलब्ध संसाधनों का भी ध्यान रखा जाना था। लगभग दो महीने तक इसके लिए मैंने बहुत अध्ययन और भ्रमण किया।

मुख्यमंत्री निवास तथा राजभवन का अंदर और बाहर से सूक्ष्म अवलोकन किया। इसके बाद इन निर्देशों का एक प्रारूप तैयार कर श्री अग्रवाल के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने मेरे कार्य को देखा और उसका ध्यानपूर्वक अध्ययन किया और कुछ आवश्यक परिवर्तन किए। फिर अत्यंत प्रसन्न होकर वे मुझे स्पेशल DG इंटेलिजेंस श्री नटराजन के कक्ष में ले गए। उन्होंने श्री नटराजन को बताया कि उनके चाहे अनुसार मुख्यमंत्री और राज्यपाल की सुरक्षा की निर्देशिका AIG त्रिपाठी ने प्रस्तुत की है और मैं उससे संतुष्ट हूँ। श्री नटराजन ने निर्देशिका को सरसरी निगाह से देखा और बिना कोई विशेष टिप्पणी किये उसे अपने पास रख लिया। वे बातचीत में अपनी भावनाओं को अधिक प्रदर्शित नहीं करते थे। बाद में उन्होंने श्री अग्रवाल से इसकी सराहना की।

इसके कुछ ही दिनों के बाद श्री नटराजन ने, सम्भवतः तत्कालीन डीआइजी इंटेलिजेंस श्री नरेन्द्र प्रसाद से चर्चा करने के उपरांत, मुझे AIG स्पेशल ब्रांच जनरल के पद पर पदस्थ कर दिया। यह इंटेलिजेंस शाखा का मेरे स्तर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पद था।