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पुराणों व धर्मग्रन्थों में उल्लेखित जानकारी :महालय (पितृपक्ष) में मृत्यु तिथि के दिन पार्वण श्राद्ध करना चाहिए।

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श्राद्ध करते समय पूर्व, मध्य या अन्त में यथासंभव पुरुष सूक्त, पितृ सूक्त, रुचि स्तव तथा रक्षोघ्न सूक्त आदि का पाठ करना या ब्राह्मण से करवाना चाहिए। इससे पितृ अति प्रसन्न होते हैं।
👉 विवाह, जन्म या अन्य माङ्गलिक कार्य के समय किए जाने वाले श्राद्ध के समय श्राद्धकर्ता का पूर्व दिशा में मुख होना चाहिए।
👉 मृत्यु तिथि पर किए जाने वाले श्राद्ध के समय दक्षिण दिशा में मुख होना चाहिए।
👉 पार्वण श्राद्ध (यानि पर्व या आश्विन मास के श्राद्ध पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध) के समय श्राद्ध कर्ता का नैर्ऋत्य दिशा में मुख होना चाहिए।
👉 श्राद्ध चिन्तामणि के अनुसार-
मृत्यु के साढ़े ग्यारह महीने में बरसी करने के बाद (प्रथम वर्ष मृत्यु तिथि पर) श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं है, सिर्फ ब्राह्मण भोजन करा देना चाहिए।
👉 दूसरा वर्ष पूरा होने पर तीसरे वर्ष के प्रथम दिन अर्थात् दूसरे वर्ष की वार्षिक तिथि पर एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिए। इसके बाद जब भी आश्विन मास आए तब महालय (पितृपक्ष) में मृत्यु तिथि के दिन पार्वण श्राद्ध करना चाहिए। यानि श्राद्ध में मिलाना चाहिए।
👉 सरल भाषा में – इससे स्पष्ट हो गया है कि मृत्यु तिथि से पूरे 2 वर्ष होने के बाद ही आने वाले श्राद्ध पक्ष (आश्विन मास) में मृत्यु तिथि के दिन ही श्राद्ध में मिलाना चाहिए।

विजय अड़ीचवाल