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अब्बू हमें घर लौटना चाहिए

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अब्बू हमें घर लौटना चाहिए

निवेदिता

मैं नहीं जानती युद्ध कैसे आता है

पर जानती हूं उस देश को जहां मेरा बेटा रहता है

जानती हूं उस देश को जहां स्कूल के अहाते में बच्चों की लाश पड़ी है

जानती हूं उस देश को जो मलवे में बदल गया

मलवे के ढेर में पड़ी वह बच्ची मेरी कोई नहीं है

पर कुछ तो रिश्ता है, कि मेरी आँखें

आंसुओं में डूब रही है

उसमें अपने बच्चे का चेहरा नज़र आता है

उसकी अधखुली आँखें जैसे देख रही हो सपने

जैसे अभी – अभी आवाज देगी

“अब्बू ! अब्बू ! हमें घर

लौटना चाहिए

स्कूल के अहाते में बहुत सारे बस्ते पड़े हैं

ताज़ा लहू से भीगे हुए

जो शायद हमारे – तुम्हारे लिए ताज़ा ख़बर से ज्यादा कुछ भी नहीं है

जब विश्वासघात और हत्या का जश्न मनाया जा रहा हो

और दुनिया पागल हो गई हो—

ख़ून और गलाज़त में धुत हुक्मरान

अपने भयानक अंजाम पर ख़ुश हो रहे हों

तो फिर कविता क्या करे ?

क्या कविता में इतनी ताकत है कि शब्दों की दुनिया से निकलकर पागल ,सनकी और ताकतवर लोगों के खिलाफ खड़ी हो?

भले ही वो कमजोर आवाज हो पर

कविता को अपनी बात कहनी होगी

कहना होगा ये धरती नक़्शा-भर नहीं है,

हमारे कितने अपनों का घर है!

उसमें अनगिनत लोग रहते हैं

पहाड़, नदिया , जंगलों के साथ जीवन बसता है

दुनिया सिर्फ तेल का कारखाना नहीं है

ना ही फौजियों का अड्डा

मेरे लिए ये दुनिया मेरे बेटे की आवाज है

नन्ही बच्ची की हंसी है

खेत-खलिहान है!

फलों से लदे पेड़ है

साइकिल पर जाते हुए मजदूरों की कतार है

और वे तमाम चिडियाँ जिन्हें मैं हर रोज हरे पत्तों के

बीच चहकते देखती हूं

चाहती हूं ये सब बची रहें

ये धरती बची रहे

और हमारी कविता के शब्द बचे रहें

Nivedita Jha