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Forest Rights Act Stalled : भाजपा के राज में वन अधिकार अधिनियम ठप, जल-जंगल-जमीन से आदिवासियों की बेदखली का षड्यंत्र!

उमंग सिंघार ने कहा 'आदिवासियों के हक की लड़ाई सड़क से विधानसभा तक लड़ी जाएगी!'

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Forest Rights Act Stalled : भाजपा के राज में वन अधिकार अधिनियम ठप, जल-जंगल-जमीन से आदिवासियों की बेदखली का षड्यंत्र!

Bhopal : गुरुवार को आयोजित कांग्रेस की संयुक्त पत्रकार वार्ता में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य कमलेश्वर पटेल ने प्रदेश की भाजपा सरकार पर आदिवासियों के साथ अन्याय के आरोप लगाए। कहा कि आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन से झूठे आरोप लगाकर बेदखल किया जा रहा है। तीनों वरिष्ठ नेताओं ने सरकार की नीतियों को आदिवासी विरोधी बताते हुए कहा कि भाजपा विकास के मुद्दों से भटक चुकी है। अब वह केवल धर्म की राजनीति कर रही है। नेता प्रतिपक्ष ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को इस आशय के पत्र भी लिखे हैं।

उन्होंने कहा कि बुरहानपुर के नेपानगर में आदिवासियों की जल-जंगल-जमीन से बेदखली का षड्यंत्र रचा गया है। भाजपा के राज में वन अधिकार अधिनियम पूरी तरह ठप हो गया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि 15 दिन की समय सीमा में यदि आदिवासी भाइयों को उनके अधिकार वापस नहीं मिले, तो कांग्रेस जन आंदोलन शुरू करेगी। आदिवासियों के हक की लड़ाई सड़क से विधानसभा तक लड़ी जाएगी।

उमंग सिंघार ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि वह आदिवासियों को उनके पारंपरिक अधिकारों से वंचित कर रही है। हजारों आदिवासी परिवारों के पट्टे बिना किसी पूर्व सूचना के खारिज कर दिए गए। सरकार की इस कार्रवाई से स्पष्ट है कि वह जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों का हक छीनना चाहती है। उन्होंने यह भी कहा कि मध्य प्रदेश में अब तक केवल झाबुआ जिले में पाँच पट्टे दिए गए, जो दर्शाता है कि सरकार की मंशा आदिवासियों को उनका अधिकार देना नहीं, बल्कि उन्हें उनके ही घर और जंगल से बाहर करना है।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि आदिवासी जल जंगल और जमीन की बात करता है, लेकिन उन्हें धर्मों में बांटा जा रहा है। आदिवासी प्रकृति की पूजा करता है। उन्होंने कहा कि हमारी पहचान धर्म नहीं धरती और जंगल से है। भाजपा और संघ गांव-गांव में जाकर सबको बांटने में लगी है। क्योंकि, भाजपा अगर बात करती है तो सिर्फ धर्म की करती है। सिंघार ने कहा कि अगर 15 दिन में सरकार ने आदिवासियों की पट्टे की मांगे नहीं मानी, तो उग्र आंदोलन किया जाएगा।

वन अधिकार अधिनियम, आश्वासन बहुत, अधिकार नहीं

17 साल बाद भी भाजपा वन पट्टों का अधिकार नहीं दे रही है। वन अधिकार अधिनियम (2006) को लागू हुए 17 साल हो चुके, लेकिन भाजपा सरकार ने आज तक लाखों आदिवासी परिवारों को उनका कानूनी हक वन भूमि पर मालिकाना हक नहीं दिया। देशभर में 8 लाख से अधिक वन अधिकार दावे अभी तक लंबित पड़े हैं। यह दर्शाता है कि वन अधिकार अधिनियम के सही क्रियान्वयन में सरकार बुरी तरह विफल रही।

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दावे खारिज करने में सबसे आगे मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश सरकार ने 2024 तक आदिवासियों द्वारा किए गए 6.5 लाख वनाधिकार दावों में से 3 लाख से ज़्यादा दावे बिना स्पष्ट कारण बताए खारिज कर दिए। जबकि, नियम 12ए (6) के तहत दावा खारिज करने पर लिखित कारण देना अनिवार्य है। वन अधिकार नियम 2007 नियम 12ए में किसी दावे को अस्वीकार या संशोधित करने की स्थिति में, इसके कारण संबंधित व्यक्ति को स्थानीय भाषा में लिखित रूप में अवश्य बताए जाने चाहिए।

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खनिज संपदा होने से आदिवासियों को हटाया जा रहा

नेता प्रतिपक्ष ने यह भी कहा कि नेपानगर के जंगलों में खनिज संपदा होने के कारण सरकार वहाँ के आदिवासियों को जबरन विस्थापित करना चाहती है, ताकि निजी कंपनियों के लिए रास्ता साफ किया जा सके। मंत्री कुंवर विजय शाह को निशाने पर लेते हुए उन्होंने कहा कि मंत्री ने सिर्फ मौज काटी है। सरकार आदिवासियों पर यह झूठा आरोप लगा रही है कि वे जंगल काट रहे हैं। जबकि, सच्चाई यह है कि वे जंगलों की रक्षा कर रहे हैं और वहां पेड़ लगा रहे हैं। जंगलों को नुकसान पहुंचाने वाले कुछ और तत्व हैं, जिनकी सरकार अनदेखी कर रही है।

कॉरपोरेट हितों के लिए यह सरकार की चाल

पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि नेपानगर के आदिवासी जंगल से हटाए जा रहे हैं। जबकि, वही आदिवासी स्वयं पर्यावरण की रक्षा में जुटे हैं। उन्होंने कहा कि यह सरकार की चाल है कि वह आदिवासियों को जंगलों से बेदखल कर कॉरपोरेट हितों को साधना चाहती है।

कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य कमलेश्वर पटेल ने कहा कि सरकार द्वारा आदिवासियों को दिए गए पट्टों का मालिकाना हक उनके बच्चों को भी मिलना चाहिए, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रह सके। उन्होंने आरोप लगाया कि सिंगरौली क्षेत्र में अदानी कंपनी द्वारा आदिवासी समुदाय का शोषण और छल किया जा रहा है, और सरकार इसमें साझेदार बनी हुई है।

तीनों नेताओं ने सरकार को 15 दिन की समय सीमा देते हुए स्पष्ट किया कि यदि इस अवधि में आदिवासी भाइयों को उनके अधिकार वापस नहीं मिले, तो कांग्रेस पार्टी जन आंदोलन शुरू करेगी और आदिवासियों के हक की लड़ाई सड़क से विधानसभा तक लड़ी जाएगी।