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Vallabh Bhawan Corridors to Central Vista : कहीं सरकार की नब्ज टटोलने तो नहीं आए अमित शाह!

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कहीं सरकार की नब्ज टटोलने तो नहीं आए अमित शाह!

कहीं सरकार की नब्ज टटोलने तो नहीं आए अमित शाह!

बीजेपी के कद्दावर नेता और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह चार महीने में दूसरी बार प्रदेश की यात्रा पर आए हैं। वैसे तो उनकी यात्रा को शासकीय कार्यक्रम से जोड़ा जा रहा है! लेकिन, अंदर की सियासी खबरों का इशारा है कि वे प्रदेश सरकार की नब्ज टटोलने आए हैं।

कहीं सरकार की नब्ज टटोलने तो नहीं आए अमित शाह!

वैसे तो फिलहाल शिवराज सिंह चौहान को कोई खतरा नजर नहीं आ रहा, पर जिस तरह से उन्हें बीजेपी संसदीय बोर्ड से हटाया गया उसके बाद से राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चा चल पड़ी है। ऐसे में आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश की राजनीति में कुछ नया देखने को मिले तो आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। कयास लगाए जा रहे हैं कि ‘कुछ’ भी हो सकता है, पर क्या ये कोई नहीं जानता!

बिखरी राजनीति को समेटने में लगे स्पीकर गौतम!

पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव के बाद विधानसभा स्पीकर गिरीश गौतम विंध्य की राजनीति में अलग-थलग से पड़ गए। सियासी गलियारों की खबरों पर अगर भरोसा किया जाए तो क्षेत्र के दो दिग्गज नागेंद्र सिंह और केदारनाथ शुक्ला अलग-अलग कारणों से गौतम के विरोधी बन गए। मिली जानकारी के अनुसार गत दिनों स्पीकर गौतम नागेन्द्र सिंह के घोर विरोधी और उनके पिछला चुनाव हारने का सबब बने कपिध्वज सिंह के यहाँ चले गए। खाँटी नेता नागेन्द्र सिंह उससे तिलमिला कर रह गए। उसी हफ्ते गौतम के कट्टर विरोधी उनके सगे भतीजे पद्मेश गौतम के घर मिलने चले गए। पद्मेश कांग्रेस की राजनीति करते हैं। बताया जाता है कि जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में पद्मेश गौतम ने ही स्पीकर गौतम के बेटे राहुल गौतम को हराया।

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गौतम के समर्थकों में बचे एक मात्र विधायक पंचूलाल की पत्नी पन्नाबाई भी जिला पंचायत के चुनाव में निपट गई। स्पीकर ने कांग्रेसी अभय मिश्रा का स्वागत सत्कार ग्रहण करने से सेमरिया विधायक केपी त्रिपाठी और भी ज्यादा खफा हो गए और स्थिति संवादहीनता तक पहुंच गई। इस बीच जिला पंचायत व स्थानीय निकाय चुनाव में नागेन्द्र सिंह फिर राजेन्द्र शुक्ल से जा मिले और इस जोड़ी ने जिला पंचायत के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष दोनों को जिता लिया।

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इस तरह देखा जाए तो विंध्य में सभी महत्वपूर्ण नेता उनके विरोध में हो गए। इसलिए इसे अब यह गौतम की मजबूरी ही कहा जाएगा कि वे राजेंद्र शुक्ला के निकट आए। इसकी एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि राजेन्द्र शुक्ल वर्तमान में संगठन की दोनों नीति नियंता समितियों में हैं यानी कि बीजेपी की चुनाव समिति व कोर कमेटी दोनों में। चुनाव को 14 महीने शेष बचे हैं और तब तक शुक्ल इसी भूमिका में बने रहेंगे। गौतम चाहेंगे कि अगली टिकट उन्हें मिले, लेकिन इसके आड़े उम्र आएगी। उनके सामने गुढ के नागेन्द्र सिंह का दृष्टांत है कि किस तरह चुनाव समिति में पैरवी करके शुक्ल ने उम्रदराज की बाधा के बावजूद भी टिकट दिलवा दी थी। गौतम की कोशिश होगी कि यदि उन्हें नहीं तो उनके पुत्र राहुल गौतम को देवतालाब से टिकट मिल जाए। इस ह्रदयपरिवर्तन के पीछे ऐसा ही कुछ माना जा रहा है।

निकाला प्रीतम लोधी को सबक उमा भारती को!

बीजेपी संगठन ने शिवपुरी जिले के OBC नेता प्रीतम लोधी को पार्टी से निकाल दिया। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के रिश्तेदार प्रीतम लोधी को ब्राह्मण और महिला विरोधी बयान देने की सजा मिली। पूरा घटनाक्रम देखा जाए, तो सजा भले प्रीतम लोधी को दी गई, पर सबक उमा भारती को सिखाया गया है। ब्राह्मणों और महिलाओं के खिलाफ लोधी की इस टिप्पणी को पार्टी ने बेहद गंभीरता से लिया। उनके अपराध को अक्षम्य पाया गया, इसलिए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा ने शुक्रवार को लोधी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया।

कहीं सरकार की नब्ज टटोलने तो नहीं आए अमित शाह!

प्रीतम लोधी ने अपने माफीनामे में उमा भारती का जिक्र करते हुए लिखा था कि दीदी को जैसे ही जानकारी मिली उन्होंने मुझे बिना लाग लपेट के माफ़ी मांगने का निर्देश दिया! उन्हें लगा था कि ‘दीदी’ के नाम का उल्लेख करने से पार्टी नरम पड़ेगी, पर ऐसा नहीं हुआ! क्योंकि, इस बहाने बीजेपी ने उमा भारती को भी संदेश दिया कि वे भी अनुशासन के दायरे में रहे, अन्यथा उन्हें भी प्रीतम लोधी की तरह किसी दिन पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है!

कहीं सरकार की नब्ज टटोलने तो नहीं आए अमित शाह!

इसलिए कि पिछले दिनों उमा भारती ने बहुत कुछ ऐसा किया जो सही नहीं कहा जा सकता! शराबबंदी की मांग के बहाने शराब दुकान पर पत्थर मारना और गोबर फेंकने के अलावा रायसेन किले के शंकर मंदिर को खुलवाने के लिए धरना देना! समझ नहीं आ रहा कि बीजेपी उनकी ऐसी अनुशासनहीनता और आपराधिक गतिविधियों को क्यों सहन कर रही है! लेकिन, प्रीतम लोधी के साथ जो हुआ, उससे समझा जा सकता है कि आगे क्या हो सकता है!

केंद्र में MP केडर के IAS अधिकारियों की संख्या में कमी

केंद्र में मध्य प्रदेश काडर के IAS अधिकारियों की संख्या कम होने लगी है। जानकारों का कहना है कि एक समय ऐसा था जब मध्य प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक IAS अधिकारी सचिव हुआ करते थे। लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं है। राजेश कुमार चतुर्वेदी के रिटायर होने के बाद केन्द्र में मध्यप्रदेश काडर के चार IAS अधिकारी सचिव है। इनमें से भी कोयला सचिव अनिल जैन अक्टूबर में और इस्पात सचिव संजय सिंह दिसंबर में अवकाश ग्रहण करेंगे। जैन 1986 और सिंह 1987 बैच के IAS अधिकारी है।

कहीं सरकार की नब्ज टटोलने तो नहीं आए अमित शाह!

सूत्रों का कहना है कि सचिव स्तर पर राज्य के अधिकारियों का एम्पैनलमेट न होना एक मुख्य कारण है। अब प्रश्न उठता है कि क्या एम पी काडर के IAS अधिकारी 360 डिग्री फार्मूला पर खरे नहीं उतर रहे?

भल्ला को सेवा विस्तार मिलने से कई IAS अधिकारियों की आशाओं पर कुठाराघात

जैसी कि संभावना व्यक्त की गई थी, गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को तीसरा सेवा विस्तार मिल गया है। अब वे अगले साल 22 अगस्त तक अपने पद पर बने रहेंगे। वे 1984 बैच के असम – मेघालय काडर के आईएएस अधिकारी है।

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बहरहाल, उनका कार्यकाल बढने से इस प्रतिष्ठित पद को हथियाने वाले 1987 से 1990 बैच तक के आईएएस अधिकारियों की आशाओं पर जबरदस्त कुठाराघात हुआ है। अगले एक साल में 1987 और 1988 बैच के अधिकांश आईएएस अधिकारी रिटायर हो जायेंगे।


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संयोग: राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को एक ही बैच के सचिव मिले

यह भी एक संयोग कि देश नये राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति मिले लेकिन इनके सचिव एक ही बैच के मिले। राष्ट्रपति के सचिव राजेश वर्मा उडीसा काडर के और सुनील कुमार गुप्ता पश्चिम बंगाल काडर के आईएएस अधिकारी है। दोनों ही 1987 बैच के आईएएस अधिकारी है। गुप्ता दिसंबर 2023 में और वर्मा अगस्त 2024 में रिटायर होंगे।

कमिश्नर और कलेक्टर सामान बांधकर इंतजार में!

प्रदेश के एक संभाग के कमिश्नर और संभागीय मुख्यालय के कलेक्टर निकाय चुनाव के बाद से अपने तबादले आदेश का इंतजार कर रहे हैं। उनका बोरिया बिस्तर बंधा हुआ है, इंतजार बस आदेश का हैं। इस संभागीय मुख्यालय से नगरीय निकाय चुनाव में मेयर के चुनाव में बीजेपी वह हार झेलनी पड़ी थी। उसके बाद से यह माना जा रहा था कि कमिश्नर और कलेक्टर पर तबादले की गाज गिरेगी। सूत्रों पर भरोसा किया जाए, तो मुख्यमंत्री ने इस संबंध में अपनी यात्रा के दौरान संकेत भी दे दिए थे।

लगता है कि मुख्यमंत्री अन्य जरूरी व्यस्तताओं के कारण अभी तक ब्यूरोक्रेटिक रिशफल पर ध्यान नहीं दे पाए हैं। जिस दिन भी प्रशासनिक फेरबदल होगा इस संभाग के कमिश्नर और मुख्यालय के कलेक्टर का बदला जाना तय माना जा रहा है। अब आप सोचिए कि वो कौन हो सकते हैं