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I Support My Friends : किशोरों की मानसिक सेहत के लिए संवेदनशील पहल जरुरी! 

'आई सपोर्ट माय फ्रेंड्स' नामक नया प्रशिक्षण मॉड्यूल लॉन्च किया गया!  

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I Support My Friends : किशोरों की मानसिक सेहत के लिए संवेदनशील पहल जरुरी! 

Bhopal : देश में किशोरों और युवाओं की बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने यूनिसेफ और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस (एनआईएमएचएएनएस) के साथ मिलकर आज भोपाल में आयोजित एक राष्ट्रीय परामर्श सत्र में किशोर एवं युवा मानसिक स्वास्थ्य पर एक राष्ट्रीय तथ्यपत्र और ‘आई सपोर्ट माय फ्रेंड्स’ नामक नया प्रशिक्षण मॉड्यूल लॉन्च किया। यह मॉड्यूल पहले से चल रहे राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत मौजूद साथी-समर्थन मॉड्यूल का विस्तार है।

यह नया मॉड्यूल किशोरों को ऐसे व्यावहारिक उपकरणों से लैस करता है, जिनकी मदद से वे अपने दोस्तों में भावनात्मक तनाव के संकेत पहचान सकें, संवेदनशीलता से उन्हें सहारा दे सकें, ज़रूरत पड़ने पर आगे मदद से जोड़ सकें और साथ ही अपनी सीमाओं और मानसिक भलाई का भी ध्यान रख सकें।

यूनिसेफ और डब्ल्यूएचओ के एक वैश्विक संसाधन पर आधारित इस मॉड्यूल को एनआइएमएचएएनएस ने भारत के परिप्रेक्ष्य में ढालकर विकसित किया है।

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यह एक दिवसीय यह प्रशिक्षण ‘लुक, लिसन, लिंक’ (देखो, सुनो और जोड़ो) रूपरेखा पर आधारित है, जिसमें इंटरैक्टिव गतिविधियाँ, परिदृश्य आधारित शिक्षण और मार्गदर्शित आत्ममंथन शामिल हैं। इसका उद्देश्य है किशोरों में भावनात्मक समझ, सहानुभूतिपूर्ण संवाद और ज़िम्मेदार साथी-सम्बंधों को बढ़ावा देना।

इस अवसर पर प्रदेश के स्वास्थ्य राज्यमंत्री एन शिवाजी पटेल ने कहा आज के किशोरों पर पढ़ाई, परिवार और सामाजिक माहौल का जबरदस्त दबाव है। हमें ऐसे सिस्टम तैयार करने होंगे जहां वे खुलकर बोल सकें, उन्हें सुना जाए और उन्हें पूरा समर्थन मिले। मानसिक भलाई में निवेश केवल नीति नहीं, बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी और हमारे साझा भविष्य के प्रति वचनबद्धता भी है।

प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला ने कहा कि हमारे किशोरों को खुद की और अपने साथियों की मानसिक सेहत का ध्यान रखने में सक्षम बनाना, मध्य प्रदेश और देश के उज्ज्वल भविष्य में निवेश करने जैसा है। राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम और यह नया साथी-समर्थन मॉड्यूल एक ऐसा समाज गढ़ने में मदद कर रहे हैं, जहां युवाओं की आवाज़ सुनी जाती है, उन्हें समर्थन मिलता है और वे आगे बढ़ने में सक्षम बनते हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय में किशोर स्वास्थ्य की डिप्टी कमिश्नर डॉ ज़ोया अली रिज़वी ने कहा कि यह मॉड्यूल देश में मानसिक स्वास्थ्य नीति और व्यवहार को सुदृढ़ करने की बड़ी राष्ट्रीय योजना का हिस्सा है। भारत अब एक ऐसे मानसिक स्वास्थ्य तंत्र की ओर बढ़ रहा है जो युवाओं की ज़रूरतों के प्रति उत्तरदायी हो। हमारा लक्ष्य है ऐसे राष्ट्रीय दिशा-निर्देश बनाना जो प्रारंभिक स्तर पर सहयोग को प्रोत्साहित करें, स्थानीय तंत्र को मजबूत करें और साथी-समर्थन जैसे वैज्ञानिक उपायों से किशोरों को सशक्त बनाएं।

एनआईएमएचएएनएस की निदेशक डॉ प्रतिमा मूर्ति ने कहा कि किशोरों की जटिल मानसिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं को देखते हुए ज़रूरी है कि स्कूलों और समुदायों जैसे रोज़मर्रा के माहौल में ही मानसिक स्वास्थ्य सहयोग की शुरुआत की जाए। ऐसे परामर्श सत्र, जहां तकनीकी विशेषज्ञ, युवा, नीति निर्माता और मीडिया एक साथ हों, ‘विकसित भारत’ की सोच को साकार करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

यूनिसेफ इंडिया के स्वास्थ्य प्रमुख डॉ विवेक सिंह ने भारत में हाल के वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुई प्रगति की सराहना करते हुए कहा कि अब ज़रूरत है कि हम प्रतिक्रियात्मक देखभाल से सक्रिय, समुदाय-आधारित मानसिक स्वास्थ्य प्रणालियों की ओर अग्रसर हों। हमें एक एकीकृत मानसिक स्वास्थ्य ढाँचे पर भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। यूनिसेफ इस बदलाव में सरकार को व्यापक, युवा-नेतृत्व वाले दृष्टिकोणों के माध्यम से सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है, खासकर ऐसे मॉडलों के ज़रिए जो बड़े पैमाने पर लागू हो सकें और जिनका नेतृत्व स्वयं युवा करें।

यूनिसेफ मध्य प्रदेश के फील्ड ऑफिस के प्रमुख अनिल गुलाटी ने कहा, “राज्य और समुदाय स्तर की व्यवस्थाएं ही राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं को ज़मीन पर उतार सकती हैं। यदि हम सुरक्षित वातावरण बना सकें, साथी-समर्थकों को प्रशिक्षित कर सकें और फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को सशक्त बना सकें, तो देश के किसी भी कोने में रहने वाला हर किशोर समर्थन, समझ और आशा पा सकेगा।

सत्रों के दौरान यह ज़ोर दिया गया कि मानसिक स्वास्थ्य स्थितियाँ, जैसे कि चिंता, आत्म-संकोच, डिजिटल लत, मानसिक अवसाद और आत्म-हानि, से जूझ रहे किशोरों को शुरुआती मदद मिलनी चाहिए और इनके इर्द-गिर्द बने सामाजिक कलंक को दूर करना होगा। चर्चा में यह भी उभरा कि सामाजिक सोच, पारिवारिक अपेक्षाएं, शैक्षणिक दबाव और रिश्तों में तनाव जैसे कारक किशोरों पर गहरा असर डालते हैं। देशभर से आए युवा प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि युवाओं के लिए सुरक्षित और सहयोगी वातावरण सबसे ज़रूरी है।

इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, स्कूल शिक्षा विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, डॉ सलोनी सिदाना (मिशन निदेशक, एनएचएम), डॉ सैयद हुब्बे अली (स्वास्थ्य विशेषज्ञ, यूनिसेफ) और अनिल गुलाटी (मुख्य फील्ड ऑफिसर, यूनिसेफ मप्र) समेत एम्स, टीआईएसएस, एनआईएमएचएएनएस और सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ लॉ एंड पॉलिसी के विशेषज्ञों ने भाग लिया।