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चुनाव जरूरी या जनता की जिंदगी?

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MP में ओबीसी आरक्षण को लेकर मचे बवाल से जनता भयभीत हो गई है ऐसा मान लिया जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मसला है राजनेताओं की अहमियत का कि वह पंचायतों का चुनाव कराकर हर हाल में अपनी काबिलियत पर उठे सवालों का जवाब देना चाहते हैं, लेकिन कोई भी नेता यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि पंचायतों के चुनाव से ज्यादा आज जनता की अहमियत बड़ी है।

और तो और राज्य निर्वाचन आयोग ने मध्यप्रदेश के राज्यपाल के निर्देश का फालूदा बनाते हुए यह कह दिया है कि पंचायत चुनाव टाले नहीं जा सकते।

अजीब बात है सुप्रीम कोर्ट ने यदि ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर कोई फैसला लिया है तो राज्य सरकार की महती जिम्मेदारी है, वह अपना कानूनी पक्ष सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे, परंतु यह भी एजेंडे में शामिल होना चाहिए कि पंचायतों के चुनावों से ज्यादा आम जनता की जिंदगी को बचाना, सुरक्षित रखना सरकार की ही जिम्मेदारी है और इस तर्क को सुप्रीम कोर्ट नजरअंदाज भी नहीं कर सकता।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि राजनीति में किसी भी चुनावी अवसर को हाथ से जाने देने के पक्ष में कोई राजनेता बड़ी मुश्किल से ही तैयार हो पाता है।

माना मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ओबीसी आरक्षण को लेकर बेहद संजीदा है, परंतु जनमत बटोरने के प्रयास में यदि वे जाएंगे तो उन्हें भी पता चल जाएगा कि आम जनता 50 प्रतिशत से अधिक के आरक्षण के पक्ष में बिलकुल नहीं है, जिसमें युवा वर्ग तो सहमत ही नहीं है कि 50 प्रतिशत से अधिक का आरक्षण किसी भी हालत में कानून का आकार लेकर अराजकता के नजदीक पहुंचे।

विनम्र आशय यह है कि राज्य सरकार ने पंचायतों के चुनाव कराने संबंधी अध्यादेश को इसलिए वापस लिया है क्योंकि ओमिक्रॉन वायरस की वजह से तीसरी लहर की 100 प्रतिशत आशंका सरकार को है।

इसीलिए यदि केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भोपाल के अपने संक्षिप्त प्रवास पर शिवराज सरकार से कहा कि आम जनता के स्वास्थ्य और जिंदगी की सुरक्षा के लिए मध्यप्रदेश को केन्द्र से जिस तरह की जिस समय स्वास्थ्य सुधार हेतु जो भी सुविधा की जरूरत पड़ेंगी उसको हर हाल में पूरा किया जाएगा।

उधर कांग्रेस के सबसे बड़े नेता पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी अंतत: दबी जुबान से मान ही लिया है कि चुनाव टाल देना ही इस वक्त बेहतर विकल्प है, क्योंकि आम जनता की जिंदगी से खेलने का खतरा उठाया नहीं जा सकता। चुनाव तो आज नहीं तो साल भर बाद भी हो जाएंगे।

उम्मीद की जानी चाहिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी ओबीसी के मुद्दे को लेकर चाहे जितनी भी खिंची हुई तलवारों को झुकाने की कोशिशों में कामयाब हो जाए, उन्हें भी ध्यान रखना होगा ओबीसी आरक्षण का मुद्दा तब तक सफल एवं कामयाब है जब तक आरक्षण का कोटा 50 प्रतिशत के भीतर है, वरना युवाओं के मन में अराजकता के भाव उपजे, आक्रोश पैदा हो यह समय उचित नहीं है।

इसलिए मुख्यमंत्री भी यदि पंचायतों के चुनाव को टालने के लिए तुरंत दूसरा अध्यादेश ले आएं, उसे पास कराने के लिए एक दिन का विधानसभा चाहे सत्र बुला लेवें हर्ज नहीं है। परंतु जनता को चुनावी आग में झुलसने से बचाने की जवाबदारी सरकार की है।

मध्यप्रदेश में ओमिक्रान के मरीज 9 मिले, 7 ठीक हो गए अलग बात है, परंतु तेजी से बढ़ते संक्रमण के खरते से आप इंकार नहीं कर सकते।

चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि ‘ओमिक्रान’ आ चुका है, कोरोना की तीसरी लहर का अंदेशा है, वे अपना जन्मदिन भी भीड़भाड़ में नहीं मना रहे हैें, तो सारंग के अंदेशों की ही सरकारी अफसर, निर्वाचन आयोग और सभी बड़े नेता खतरे का संकेत मानकर सर्वदलीय बैठक बुलाकर घोषित करें या संकल्प लें कि जब तक कोरोना, ओमिक्रान से मध्यप्रदेश पूरी तरह मुक्त नहीं होगा कोई भी चुनाव नहीं कराए जाएंगे, तभी राजनीति में आम जनता के प्रति आप के उत्तरदायित्व होने का प्रमाण मिलेगा।

इसके आगे बढक़र यदि सभी राजनीतिक दल, सरकारी तंत्र, न्यायपालिका और मीडिया एक साथ एक मंच पर जागरुकता अभियान चलाकर बुजुर्गों के लिए ‘बूस्टर डोज’ का इंतजाम जल्द से जल्द कैसे हो और 18 वर्ष से कम आयु के युवाओं एवं बच्चों का टीकाकरण कैसे किया जाए इस मुद्दे पर निर्णायक कदम उठाए जाएं, तभी सबके साथ सबका विकास का नारा चरितार्थ होगा और आम जनता की जिंदगी की अहमियत को लेकर हम, आप सब जिम्मेदार भारत के नागरिक की भूमिका में उस समय होंगे जब आपको पता नहीं है कल क्या होगा।