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Lok Nayak Karpuri Thakur: जनता के दर्द और प्रगति के पथ प्रदर्शक हैं लोक नायक कर्पूरी ठाकुर

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Lok Nayak Karpuri Thakur: जनता के दर्द और प्रगति के पथ प्रदर्शक हैं लोक नायक कर्पूरी ठाकुर

सहज, सरल, मृदुभाषी, ईमानदारी की प्रतिमूर्ति, गरीबों तथा वंचितों की सशक्त आवाज एवं कुशल राजनीतिज्ञ रहे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर। मंडल कमीशन लागू होने से पहले कर्पूरी ठाकुर बिहार की राजनीति में वहां तक पहुंचे जहां उनके जैसी पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति के लिए पहुँचना लगभग असंभव ही था। वे बिहार ही नहीं देश की राजनीति में गरीबों के शीर्ष नेता और प्रेरक रहे। पिछले पचास वर्षों में मुझे पत्रकार के रूप में अनेक प्रादेशिक और राष्ट्रीय नेताओं, मुख्यमंत्रियों, प्रधान मंत्रियों से मिलने के अवसर मिले हैं, लेकिन कर्पूरी ठाकुर की तरह गांधीवादी सरल स्वाभाव और ईमानदार शीर्ष नेता देखने को नहीं मिला। बिहार के नेताओं में भी राज्यपाल रहे सत्यनारायण सिन्हा, भीष्म नारायण सिंह या ललित नारायण मिश्र, जगन्नाथ मिश्र, भागवत झा आज़ाद, केदार पांडे जैसे नेताओं से दिल्ली या पटना में भेंट होती रही, लेकिन 1977 में मुख्यमंत्री के रुप में अथवा बाद में भी प्रतिपक्ष के नेता के रुप में कर्पूरीजी से मिलकर गरीबी, पिछड़ेपन, शिक्षा, हिंदी भाषा, साहित्य,संस्कृति सहित विभिन्न विषयों पर लम्बी बातचीत कर बहुत अच्छा लगता था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अपने से भिन्न विचार वाले अथवा विरोधियों के प्रति उनकी निजी नफरत कभी देखने सुनने को नहीं मिली। कांग्रेस अथवा तत्कालीन जनसंघ  से  गंभीर विरोध और टकराव के बावजूद उन पार्टियों के नेताओं से अच्छे सम्बन्ध रखने का असाधारण व्यवहार देखने को मिलता था। वर्तमान दौर में कर्पूरीजी के आदर्श अधिक लाभदायक हो सकते हैं। शताब्दी वर्ष में उनके पुण्य स्मरण को आदर्शों के पालन के संकल्प से लिया जाना चाहिए।

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जननायक कर्पूरी ठाकुर भारत के स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक राजनीतिज्ञ थे। कर्पूरी सरल हृदय के राजनेता माने जाते थे और सामाजिक रूप से पिछड़ी जाति से जुड़े थे, लेकिन उन्होंने राजनीति को जनसेवा की भावना के साथ जिया था. उनकी सेवा भावना के कारण ही उन्हें जननायक कहा जाता है। कर्पूरी ठाकुर बिहार में एक बार उपमुख्यमंत्री, दो बार मुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे। 1952 की पहली विधानसभा में चुनाव जीतने के बाद वे बिहार विधानसभा का चुनाव कभी नहीं हारे। अपने दो कार्यकाल में कुल मिलाकर ढाई साल के मुख्यमंत्रीत्व काल में उन्होंने जिस तरह की छाप बिहार के समाज पर छोड़ी है, वैसा दूसरा उदाहरण नहीं दिखता। ख़ास बात ये भी है कि वे बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे। 1967 में पहली बार उपमुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म किया। इसके चलते उनकी आलोचना भी ख़ूब हुई लेकिन हक़ीक़त ये है कि उन्होंने शिक्षा को आम लोगों तक पहुंचाया। इस दौर में अंग्रेजी में फेल मैट्रिक पास लोगों का मज़ाक ‘कर्पूरी डिविजन से पास हुए हैं’ कह कर उड़ाया जाता रहा। इसी दौरान उन्हें शिक्षा मंत्री का पद भी मिला हुआ था और उनकी कोशिशों के चलते ही मिशनरी स्कूलों ने हिंदी में पढ़ाना शुरू किया और आर्थिक तौर पर ग़रीब बच्चों की स्कूल फी को माफ़ करने का काम भी उन्होंने किया था। वो देश के पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने अपने राज्य में मैट्रिक तक मुफ्त पढ़ाई की घोषणा की थी। उन्होंने राज्य में उर्दू को दूसरी राजकीय भाषा का दर्जा देने का काम किया। 1971 में मुख्यमंत्री बनने के बाद किसानों को बड़ी राहत देते हुए उन्होंने गैर लाभकारी जमीन पर मालगुजारी टैक्स को बंद कर दिया। बिहार के तब के मुख्यमंत्री सचिवालय की इमारत की लिफ्ट चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों के लिए उपलब्ध नहीं थी, मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने चर्तुथवर्गीय कर्मचारी लिफ्ट का इस्तेमाल कर पाएं, ये सुनिश्चित किया उस दौर में समाज में उन्हें कहीं अंतरजातीय विवाह की ख़बर मिलती तो उसमें वो पहुंच जाते थे। समाज में एक तरह का बदलाव चाहते थे।

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बिहार में जो आज दबे पिछड़ों को सत्ता में हिस्सेदारी मिली हुई है, उसकी भूमिका कर्पूरी ठाकुर ने बनाई थी। 1977 में मुख्यमंत्री बनने के बाद मुंगेरीलाल कमीशन लागू करके राज्य की नौकरियों आरक्षण लागू करने के चलते वो हमेशा के लिए सर्वणों के दुश्मन बन गए, लेकिन कर्पूरी ठाकुर समाज के दबे पिछड़ों के हितों के लिए काम करते रहे। यही नहीं आर्थिक रुप से कमजोर ऊँची जाति के लोगों के लिए और महिलाओं के आरक्षण की पहल उन्होंने की। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य के सभी विभागों में हिंदी में काम करने को अनिवार्य बना दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने राज्य सरकार के कर्मचारियों के समान वेतन आयोग को राज्य में भी लागू करने का काम सबसे पहले किया था। युवाओं को रोजगार देने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी थी कि एक कैंप आयोजित कर 9000 से ज़्यादा इंजीनियरों और डॉक्टरों को एक साथ नौकरी दे दी। शिक्षा व्यवस्था को आम लोगों के बीच पहुंचाने के लिए माध्यमिक शिक्षा को पूर्ण रूप से फ्री कर हर तबके के लोगों के लिए शिक्षा का द्वार खोला। भूमि सुधार जैसे कार्यक्रम एवं मुंगेरी लाल कमीशन की रिपोर्ट को लागू कर पिछड़े एवं अति पिछड़ों वर्गों को सरकारी सेवा में आरक्षण की व्यवस्था लागू करवाया। सामंती अत्याचार से लड़ने के लिए दलितों के हाथों में भी हथियार का लाइसेंस देने की मांग उठायी थी। वर्षों से चली आ रही वर्ण व्यवस्था एवं जाति प्रथा को समूल नाश के लिए जीवन पर्यंत लड़ाई लड़ते रहे।

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कर्पूरी ठाकुर बहुमुखी प्रतिभा के धनी नेता थे। वे जितना राजनीति और समाजवादी विचारधारा में पैठे थे, उतना ही साहित्य, कला और संस्कृति में। हर सफ़र में अक्सर किताबों से भरा बस्ता उनके साथ होता था। दिन रात राजनीति में ग़रीब गुरबों की आवाज़ को बुलंद रखने की कोशिशों में जुटे कर्पूरी की साहित्य, कला एवं संस्कृति में काफी दिलचस्पी थी। 1980-81 की बात होगी, पटना में  पुस्तकों की एक दुकान पर  एक लेखक ने उन्हें हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशास्त्र ख़रीदते खुद देखा। छह खंड वाली किताब उस वक्त तीन-साढ़े तीन हज़ार रुपये की थी। वे पढ़ने का समय निकाल ही लेते थे। उनका अपना प्रशिक्षण समाजवादी विचारधारा में हुआ था। लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, नागरिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार जैसे मूलभूत आधुनिक मूल्यों के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता थी। सादगी और अपने पद का अपने परिवार और मित्रों के लिए किंचित भी फायदा नहीं उठाने की उनकी खूबी उनके स्वाभिमानी व्यक्तित्व के अलावा गांधीवादी-समाजवादी धारा से भी जुड़ी थी। उनकी ‘छोटी’ जाति सहित बहुत-सी बाधाएं उनके रास्ते में आती रहीं, लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक संघर्ष और विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से उन बाधाओं का मुकाबला किया। कभी सांप्रदायिक जातिवाद और जातिवादी अस्मितावाद का सहारा नहीं लिया। लिहाजा, वे किसी जाति-विशेष के नेता नहीं, ‘जननायक’ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान खुद कर्पूरी ठाकुर ने  ‘हम सोए वतन को जगाने चले हैं’ शीर्षक कविता बनाई थी: “हम सोए वतन को जगाने चले हैं/ हम मुर्दा दिलों को जिलाने चले हैं।/ गरीबों को रोटी न देती हुकूमत,/ जालिमों से लोहा बजाने चले है।/ हमें और ज्यादा न छेड़ो, ए जालिम!/ मिटा देंगे जुल्म के ये सारे नज़ारे।/ या मिटने को खुद हम दीवाने चले हैं/ हम सोए वतन को जगाने चले हैं।’’ यह कविता एक समय समाजवादी आंदोलन के संघर्ष में ‘प्रभात फेरी’ का गीत बन गई थी। यह कविता भी बताती है कि कर्पूरी ठाकुर वंचित-शोषित समूहों के नेता थे।