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राज-काज: कांग्रेस के 2 और विधायक देंगे पार्टी को गच्चा….!

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राज-काज: कांग्रेस के 2 और विधायक देंगे पार्टी को गच्चा….!

कांग्रेस के 2 और विधायक देंगे पार्टी को गच्चा….!

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पार्टी की नजर में कांग्रेस के दो और विधायकों की निष्ठा संदिग्ध हो गई है। ये हैं हरदा के आरके दोगने और टिमरनी से पहली बार जीते अभिजात शाह। दोनों को संघ से जुड़े एक कार्यक्रम में देखा गया है, जिसमें मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के साथ संघ के बड़े पदाधिकारी सुरेश सोनी भी मौजूद थे। कांग्रेस के लिए ये दोनों विधायक महत्वपूर्ण हैं। दोगने ने भाजपा के कद्दावर नेता पूर्व मंत्री कमल पटेल को एक बार के अंतर से दूसरी बार हराया है। हरदा कमल पटेल का गढ़ बन चुका था। वे तुकबंदी करते थे कि ‘मेरे क्षेत्र में कांग्रेसी ढूंढ़ कर लाओ, एक हजार का ईनाम पाओ’। उनके इस नारे ने जब ज्यादा जोर पकड़ा तभी दोगने ने उन्हें 2013 के चुनाव में पहली बार हराया था। 2018 में कमल पटेल जीते और 2023 में दोगने ने उन्हें फिर हरा दिया। भाजपा के गढ़ को तोड़ने वाला विधायक यदि संघ और भाजपा से नजदीकी बढ़ाए तो कांग्रेस के लिए चिंता की बात होना चाहिए। दोगने पहले भी संघ से जुड़े कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। इसलिए उनके भाजपा से दोस्ती बढ़ाने की चर्चा ज्यादा है। दूसरे टिमरनी विधायक अभिजात शाह प्रदेश सरकार में मंत्री विजय शाह के भतीजे हैं। उन्होंने टिमरनी में अपने चाचा संजय शाह को हराया है। उनका परिवार भाजपाई है, इसलिए उन पर भी नजर रखी जा रही है। दोगने-शाह ने कांग्रेस छोड़ी तो यह पार्टी के लिए बड़ा झटका होगा।

दिल्ली विजय से प्रदेश भाजपा को ‘दोहरी खुशी’….

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दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी जीत और अरविंद केजरीवाल की हार से भाजपा गदगद है। पूरे देश में कार्यकर्ता जश्न मना रहे हैं। दिल्ली की यह विजय प्रदेश भाजपा के लिए दोहरी खुशी लेकर आई है। पहली यही कि पार्टी पूरे 27 साल बाद दिल्ली की सत्ता में वापस आ रही है। पूरे देश में विजय पताका फहराने वाली भाजपा के लिए दिल्ली आंख में किरकिरी की तरह थी। दूसरी खुशी यह कि आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को प्रवेश वर्मा ने हराया है। केजरीवाल भाजपा की नाक में दम किए थे। वर्मा का मप्र से गहरा नाता है। वे भाजपा के वरिष्ठ नेता विक्रम वर्मा और विधायक नीना वर्मा के दामाद हैं। अपने दामाद के प्रचार में वर्मा दंपत्ति दिल्ली में डेरा डाले रहे हैं। खास बात यह भी है कि केजरीवाल को हराने के कारण प्रवेश वर्मा मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे हैं। वे पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय साहब सिंह वर्मा के बेटे हैं। इस नाते उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में मदद कर सकती है। ऐसा हुआ तो मप्र का दामाद दिल्ली का मुख्यमंत्री होगा। केजरीवाल को हराने के तत्काल बाद वर्मा की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात हो चुकी है। वे नया चेहरा भी हैं। हालांकि मोदी-शाह की जोड़ी चौकाने के लिए जानी जाती है। इसलिए वे मुख्यमंत्री पद के लिए किस नाम पर अपनी मुहर लगाएंगे, कयास लगाना कठिन है।

फिर उठे जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल….

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परिवहन विभाग के पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा मामले में लोकायुक्त और ईडी जैसी जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। सौरभ ने जिस तरह पहले सरेंडर का नाटक किया और लोकायुक्त पुलिस ने जिस तरह उन्हें गिरफ्तार किया, उसे देखकर जांच में लीपापोती की आशंका व्यक्त की जाने लगी है। पहले यह आरोप कांग्रेस ही लगा रही थी लेकिन अब भाजपा नेत्री पूर्व मुख्यमंत्री साध्वी उमा भारती ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने एक्स पर लिखा कि ‘चेक पोस्ट घोटाले में कुछ लोग पकड़े गए हैं। अगर जांच में यही साबित होता है कि सिर्फ इन्हीं लोगों ने घोटाला किया है, तो मामला और भी गंभीर हो सकता है। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियों पर लोगों का भरोसा है। देखना यह है कि एजेंसियां इस मामले को यहीं खत्म कर देती हैं या गहराई से जांच करती हैं। असली अपराधियों को पकड़ कर उन्हें सजा दिलाना एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती है।’ इससे पहले उन्होंने कहा था कि एक सिपाही करोड़ों रुपए लेकर भाग गया। यह घोटाला व्यापमं घोटाले से भी बड़ा लग रहा है। उन्होंने सौरभ शर्मा को इस मामले में एक चूहा बताया था। उनका कहना था कि असली मुजरिम यानी अजगर अभी बाहर आना बाकी है। अब जांच एजेंसियों पर है कि वे उम्मीदों पर कितना खरा उतरती हैं और अपनी साख बरकरार रख भी पाती हैं या नहीं।

विधानसभा का बजट सत्र छोटा होने पर उठे सवाल….

MP Vidhan Sabha

प्रदेश में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर विधानसभा का बजट सत्र एक बार फिर चर्चा में है। वजह है इसका छोटा होना। इस बार स्पीकर भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेंद्र सिंह तोमर हैं। उम्मीद थी कि वे विधानसभा की साख की बहाली के लिए कुछ ठोस कर पाएंगे, लेकिन वे भी कुछ समय से चल रहे ढर्रे का हिस्सा बनते दिख रहे हैं। बता दें, कुछ साल पहले तक बजट सत्र महीनों चलता था। बजट के साथ अनुदान मांगों पर विस्तार से चर्चा होती थी। पर अब ये बीते दिनों की बात हो गई। बजट सत्र की अधिसूचना के अनुसार इस बार भी सिर्फ 9 बैठकें होंगी। पिछले कुछ सत्रों के हश्र को देखते हुए यह कहना कठिन है कि ये 9 बैठकें भी हो पाएंगी या नहीं, क्योंकि हंगामें की आड़ में सदन की कार्रवाई अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना पंरपरा जैसी बन गई है। बजट सत्र के इतना छोटा होने से न कांग्रेस के विधायक खुश हैं, न ही सत्तापक्ष भाजपा के। भाजपा विधायकों की मजबूरी है कि वे चाहते हुए भी कुछ बोल नहीं सकते, पर कांग्रेस ने विरोध में राज्यपाल से मुलाकात की है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने उनसे हस्तक्षेप का आग्रह किया। विपक्ष की मांग को तवज्जो मिलेगी, इसकी उम्मीद कम ही है। फिर भी विधानसभा की साख की बहाली के प्रयास किए जाना चाहिए। इसकी पहल खुद स्पीकर को करना होगी, क्योंकि लोकतंत्र के इस मंदिर की गरिमा और धमक दोनों का क्षरण हो रहा है।

स्पीकर नहीं कर सके विधायक निर्मला मामले का निबटारा….

NIRMALA SAPARE

विधानसभा के बजट सत्र की अधिसूचना जारी होते ही बीना विधायक निर्मला सप्रे एक बार फिर चर्चा में आ गईं। विधानसभा के अंदर वे भाजपा की सदस्य हैं या कांग्रेस की, स्पष्ट नहीं है। निर्मला ने अपनी राजनीतिक नैतिकता को ताक पर रख रखा है लेकिन स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर भी उनके मामले का निबटारा नहीं कर सके। उनके द्वारा भाजपा और कांग्रेस अध्यक्षों से पूछा गया कि निर्मला उनके दल की सदस्य हैं या नहीं, पर जवाब नहीं मिला। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा की ओर से जवाब आया कि निर्मला ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण नहीं की है और कांग्रेस न तो स्पीकर के सामने उनकी सदस्यता रद्द करने की अर्जी लगा रखी है। कांग्रेस ने कहा है कि स्पीकर को उनसे इस तरह का सवाल पूछने का अधिकार ही नहीं है। बहरहाल, निर्मला अधर में है। सच यह है कि वे लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के सामने विधिवत भाजपा में शामिल हो चुकी थीं। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार किया और पार्टी की बैठक में हिस्सा लेने भाजपा कार्यालय भी पहुंची। अब वे यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहीं कि वे भाजपा में शामिल हो गई हैं। ऐसा कहा तो उनकी सदस्यता रद्द हो सकती है। उन्हें उप चुनाव का सामना करना पड़ सकता है। इसमें वे जीत ही जाएंगी इसकी गारंटी नहीं है। इधर निर्मला की सदस्यता रद्द कराने कांग्रेस कोर्ट तक पहुंच गई है। नतीजा कुछ भी हो पर निर्मला की छवि अब निर्मल नहीं रही।