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राज-काज: क्या सच सबकी नजर में खटकने लगे ब्राह्मण….?

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राज-काज: क्या सच सबकी नजर में खटकने लगे ब्राह्मण….?

* दिनेश निगम ‘त्यागी’

0 क्या सच सबकी नजर में खटकने लगे ब्राह्मण….?

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– भाजपा का परंपरागत वोटर ब्राह्मण पार्टी से नाराज दिखने लगा है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य मे भाजपा के अपने विधायक तक गोलबंद होने लगे हैं। मप्र में एक चुनाव से पहले दलितों और ब्राह्मणों के विवाद में कूदते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘कोई माई का लाल…’ जैसा एक वाक्य बोल दिया था। इसके बाद चंबल-ग्वालियर अंचल के ब्राह्मणों ने भाजपा को सबक सिखा दिया था। एक बार फिर वैसे ही हालात बन रहे हैं। इसकी वजह बने हैं प्रयागराज के माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी का अपमान और यूजीसी की नई गाइडलाइन। दोनों मुद्दों पर भाजपा का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध हुआ है। नतीजा यह हुआ कि शंकराचार्य जी को बिना गंगा स्नान किए वापस जाना पड़ा और यूजीसी मामले में सुप्रीम कोर्ट को रोक लगाना पड़ी। प्रदेश के गोपाल भार्गव जैसे कद्दावर भाजपा नेता गोपाल भार्गव को कहना पड़ गया कि ब्राह्मण सभी की नजरों में खटकने लगे हैं। राजनीतिक दलों और संगठनों का एक ही लक्ष्य है, ब्राह्मणों को मारो या दबाओ’। भार्गव ने कहा कि पहले हमारे सीएम, अधिकारी होते थे, आधी कैबिनेट हमारी होती थी। लेकिन अब गिने-चुने लोग ही बचे हैं। उन्होंने ब्राह्मण समाज को धर्म की रक्षा के लिए एक होने का आह्वान किया और चिंता जताई कि सारे नियम-कानून ब्राह्मणों के खिलाफ बन रहे हैं। यह नाराजगी भाजपा पर भारी पड़ सकती है।

0 कब खत्म होगा ‘तारीख पर तारीख’ का इंतजार….

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– एक फिल्म में सनी देओल द्वारा बाेला गया डॉयलाग ‘तारीख पर तारीख…’ इतना चर्चित हुआ था कि आज तक लोगों की जुबान है। अब यह भाजपा सरकार में की जाने वाली राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर बोला जाने लगा है। दावेदार कहते हैं कि आखिर कब खत्म होगा ‘तारीख पर तारीख’ का यह इंतजार। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल कई बार नियुक्तियां जल्दी होने की बात कह चुके हैं। हाल ही में उन्होंने इसे लेकर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के साथ मंथन किया है। इसने दावेदारों की टेंशन बढ़ा दी है। दोनों ने दिल्ली दौरा किया तो खबर आई कि बस सूची फाइनल ही होने वाली है। यह भी बताया जाने लगता है कि पहले मंत्रिमंडल का विस्तार होगा या निगम-मंडलों में नियुक्तियां। कई बार तो माह और तारीख भी बता दी जाती है लेकिन हो रहा है सिर्फ इंतजार। खबर है कि प्रदेश संगठन की ओर से करीब 15 प्राधिकरणों और निगमों के अध्यक्षों के नामों की प्रस्तावित सूची दिल्ली भेजी गई थी। केंद्रीय संगठन ने यह कह कर वापस भेज दी कि जिले से लेकर प्रदेश स्तर तक जितने भी पदों पर नियुक्तियां होनी हैं, सबके लिए नाम मंगाकर पूरी सूची तैयार करें। इसे लेकर मंथन बैठकों का दौर चल रहा है। सूत्रों के अनुसार पहले इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन, जबलपुर जैसे बड़े शहरों के प्राधिकरणों में नियुक्तियां होंगी। इसके बाद निगम मंडलों, आयोगों और बोर्ड की बारी आएगी। पर यह कब होगा कोई नहीं जानता।

0 मंत्री ने खुद को बताया ईमानदार, अन्य को रिश्वतखोर….

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– प्रदेश के कई मंत्री समय-समय पर अपने बयानों से अपनी ही सरकार को असहज करते रहते हैं। इनमें से एक हैं राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा। पहले उन्होंने लाड़लियों को लेकर बयान दिया कि वे शीघ्र ही योजना का लाभ लेने वाली लाड़लियों को कार्यक्रम में बुलाएंगे। जो नहीं आएंगी, उनके नाम योजना से काट दिए जाएंगे। बवाल मचा तो मंत्री जी को पलटना पड़ा। अब उन्होंने भ्रष्टाचार को लेकर सभी को घेर लिया। उन्होंने खुद को ईमानदार और अन्य को रिश्वतखोर ठहराया दिया। उन्होंने कलेक्टरों को भी लपेटे में ले लिया। कहा कि कलेक्टर ही मुझसे कहते हैं कि थाेड़ा बहुत तो चलता है। इससे पहले मुख्य सचिव अनुराग जैन कह चुके हैं कि कलेक्टरों द्वारा रिश्वत लेने की शिकायतें मुख्यमंत्री तक पहुंची हैं। मंत्री वर्मा ने कहा कि जो रिश्वत लेता है, वह राष्ट्रद्रोही है। उन्होंने कहा कि मैं 8 चुनाव जीता हूं लेकिन रिश्वत लेने का मन नहीं करता है। बेईमान आदमी को चाहे मंत्री, तहसीलदार, इंजीनियर या कुछ भी बना दो, वह अपनी आदत नहीं छोड़ता। ऐसा नहीं है कि मैं दावा कर रहा हूं। कई तहसीलदार हैं, जिन्हें मैंने सस्पेंड किया है। राजगढ़ आया तो सस्पेंड किया। आष्टा गया तो सीमांकन पर सस्पेंड किया है। सिवनी गया, वहां भी सस्पेंड किया। साफ है कि सरकार भ्रष्टाचार पर नकेल नहीं लगा पा रही। अब तो मुख्य सचिव और मंत्री तक यह सच स्वीकार करने लगे।

0 नितिन की टीम में मप्र का कितना रहेगा दबदबा….?
– बिहार के अपेक्षाकृत युवा नेता नितिन नबीन के भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनकी टीम को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। खासकर यह कि उनकी टीम में मप्र का कितना दबदबा रहेगा? इसकी वजह यह भी है कि भाजपा की केंद्रीय टीम में मप्र को हमेशा अच्छा प्रतिनिधित्व मिलता रहा है। इसे ध्यान में रखकर प्रदेश के दावेदार नेता उम्मीद लगा कर बैठ गए हैं। नितिन सवर्ण हैं और कायस्थ समाज से आते हैं। देश में जैसी राजनीति चल रही है। उसे देख कर लगता है कि टीम में सवर्ण कम पिछड़े, दलित और आदिवासी ही ज्यादा होंगे। फिर भी कुछ सवर्ण लिए जाएंगे। इनमें पहला नाम सांसद वीडी शर्मा का है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के नाते टीम में उनकी जगह पक्की मानी जा रही है। इनके अलावा अरविंद भदौरिया और नरोत्तम मिश्रा को भी प्रमुख दावेदार बताया जा रहा है। दलित नेताओं में लाल सिंह आर्य और आदिवासियों में गजेंद्र सिंह पटेल, सुमेर सिंह के नामों की चर्चा है। महिलाओं में राज्य सभा सदस्य कविता पाटीदार को जगह मिल सकती है। ये तो हुए संभावना वाले कुछ नाम, लेकिन नरेंद्र मोदी- अमित शाह की जोड़ी पार्टी में नए लोगों को आगे लाकर चौंकाने के लिए जानी जाती है। नितिन की टीम में वे ही लिए जाएंगे, जिन्हें यह जोड़ी चाहेगी। इसलिए पूरी टीम ही चौंकाने वाली हो तो अचरज नहीं करना चाहिए।

0 हाईकमान के निर्देश ने बढ़ाई प्रदेश कांग्रेस की टेंंशन….

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– संगठनात्मक दृष्टि से भाजपा और कांग्रेस में एक बड़ा फर्क है। भाजपा की प्रदेश और जिले की टीम में पदाधिकारियों की संख्या तय है। गठन के समय से इनमें कुछ पद खाली भले रह जाएं लेकिन ज्यादा नहीं हो पाते। इसके विपरीत कांग्रेस में इसका कोई मापदंड नहीं है। प्रदेश और जिला कांग्रेस की टीम कितनी बड़ी हो सकती है, कोई नहीं जानता। कई बार उपाध्यक्ष, सचिव और महासचिव की संख्या सैकड़ों में पहुंच जाती है। इसीलिए कांग्रेस की टीम जंबो होती है। चुनाव नजदीक हों तब तो कांग्रेस में पदाधिकारियों की नियुक्तियों का सिलसिला लगातार जारी रहता है। पर राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल के ताजा निर्देश ने प्रदेश नेतृत्व की टेंशन बढ़ा दी है। उन्होंने राज्यों को निर्देश दिया है कि जिला कार्यकारिणी छोटी होगी। इसके साथ बड़े और छोटे जिलों के लिए संख्या भी निर्धारित कर दी है। उन्होंने राज्य और जिलों को पत्र लिख कर कहा है कि बड़े जिलों में 55 और छोटे जिलों में 35 सदस्य बनाए जाएंगे। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की उपस्थिति में हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया है। बता दें, प्रदेश में अलग-अलग गुटों को साधने के लिए जम्बो कार्यकारिणी के गठन की परंपरा रही है। कांग्रेस इस टेंशन से कैसे निबटती है, देखने लायक होगा।