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महाराष्ट्र की राजनीति:पुश्तैनी राजघरानों और राजनीतिक घरानों में जंग 

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महाराष्ट्र की राजनीति:पुश्तैनी राजघरानों और राजनीतिक घरानों में जंग 

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* नवीन कुमार

 

महाराष्ट्र में 2024 के लोकसभा के चुनाव काफी दिलचस्प है। इस बार चुनाव जीतने के लिए राजघराने और राजनीतिक घराने पर भी दांव लगे हुए हैं। जिस घराने को लेकर ज्यादा चर्चा है उनमें छत्रपति शिवाजी महाराज के घराने से लेकर राजनीति के चाणक्य शरद पवार के घराने के साथ राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत वसंतदादा पाटील के घराने भी शामिल हैं। ये सभी घराने पश्चिम महाराष्ट्र में हैं और पश्चिम महाराष्ट्र चीनी कारखानों के कारण काफी समृद्ध है। शिवाजी महाराज के वंशज कोल्हापुर और सतारा में रहते हैं। कोल्हापुर में शिवाजी घराने के राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज के परपोते शाहू छत्रपति महाराज रहते हैं और सतारा में शिवाजी के 13वें वंशज छत्रपति उदयनराजे भोसले रहते हैं।

पवार का घराना बारामती लोकसभा चुनाव क्षेत्र से चर्चित है तो दिवंगत वसंतदादा पाटील के परिवार को सांगली में अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए देखा जा सकता है। कोल्हापुर में इंडिया और महा विकास आघाडी के घटक दल कांग्रेस ने 76 वर्षीय शाहू छत्रपति महाराज पर दांव लगाया है तो भाजपा ने सतारा में भोसले पर। पश्चिम महाराष्ट्र में दो प्रमुख दलों ने अपने-अपने राजाओं को मैदान में उतारा है। बारामती में पवार परिवार के बीच ही लड़ाई है। पवार के बेटी सुप्रिया सुले और भतीजे अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार के बीच लड़ाई है। सांगली में पाटील परिवार विद्रोही तेवर में है जहां वसंतदादा के पोते विशाल पाटील ने कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय उम्मीदवार बन गए हैं। इससे आघाडी की परेशानी बढ़ गई है।

राजघराने के शाहू छत्रपति महाराज के चुनावी मैदान में होने से कोल्हापुर की प्रजा जागरूक हो गई है। उन्हें अपने राजा के प्रति सम्मान जाहिर करना है और यह भी बताना है कि वे अपने राजा को प्यार करते हैं। राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज की विचारधारा प्रगतिशील रही है और उन्होंने अपने कार्यकाल में समाज सुधार के काफी काम किए थे। उन्होंने सबसे पहले आरक्षण लागू करवाया था और वह बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों को भी मानते थे। इसलिए दलित समाज भी उनसे जुड़ा हुआ है। वैचारिक दृष्टिकोण से प्रगतिशील होने के कारण कोल्हापुर के राजाओं ने प्रजा की भलाई के लिए काम किया है और शाहू छत्रपति महाराज भी अपने पारिवारिक विचारों के साथ प्रजा के जुड़े हुए हैं। इनके बारे में बताया गया है कि वह एक आम किसान की तरह आज भी खेतों में जाकर काम करते हैं। एक आम नागरिक की तरह ही वह अपने क्षेत्र की प्रजा के बीच रहते हैं और उनके लिए काम करते हैं। उनकी सादगी ही प्रजा को मोहित किए रहती है। शाहू छत्रपति महाराज खुद भी कहते हैं कि उनके सामने राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज के आदर्श हैं और उनके आदर्शों पर चलते हुए वह सामाजिक सुधार का काम भी आगे बढ़ा रहे हैं और वह प्रगतिशील विचारों को लेकर ही प्रजा (आम जनता) के साथ हैं। हमारे लिए हमारी जनता ही सब कुछ है। कोल्हापुर और कोल्हापुर की जनता का विकास ही हमारा मकसद है।

कोल्हापुर में भीषण गर्मी है। लेकिन, उनकी पत्नी के अलावा उनके पुत्र छत्रपति मालोजी राजे और छत्रपति संभाजी राजे गांव-गांव में भी घर-घर जाकर लोगों से मिलकर प्रचार कर रहे हैं। 76 वर्षीय शाहू छत्रपति महाराज पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का फैसला इसलिए किया कि यह देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है और इस पार्टी ने देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाई है। आजादी के बाद भी इसने देश के विकास के लिए काम किया है। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी के साथ लोकतंत्र और संविधान को बचाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ने वाले शाहू छत्रपति महाराज अपने प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ नहीं बोलते हैं। उनकी सोच है कि सकारात्मक विचार के साथ जनता के हित में चुनाव लड़ना है। उनके खिलाफ भाजपा की अगुवाई वाली महायुति के घटक दल शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) ने संजय मंडलिक को मैदान में उतारा है। मंडलिक के चुनाव जीतने के दावे के बाद क्षेत्रीय जनता शाहू छत्रपति महाराज के समर्थन में सक्रिय हो गई है।

जब कांग्रेस ने राजघराने के शाहू छत्रपति महाराज को टिकट दिया तो भाजपा इस मामले में पीछे कैसे बैठी रहती। भाजपा ने सतारा से राजघराने के भोसले को टिकट दिया। भोसले टिकट मिलने से पहले से ही अपना चुनाव प्रचार कर रहे थे। टिकट देर से मिलने पर भोसले ने कहा कि उन्हें विश्वास था कि टिकट मिलेगा। भाजपा में टिकट बांटने की प्रक्रिया अलग थी जिससे उन्हें टिकट देर से मिला है। वह टिकट पाकर खुश हैं। शाहू छत्रपति महाराज की तरह भोसले राजनीति के मैदान में नए नहीं है। वह कई साल पहले से राजनीति कर रहे हैं और विधायक, मंत्री के साथ सांसद भी चुने गए थे। उन्होंने राजनीतिक पार्टियां भी बदली है। वह अपने राजनीतिक जीवन में अलग अंदाज में रहते हैं और आम जनता के बीच भी उसी अंदाज में रहते है।

उनका दबंग वाला भी एक चेहरा है। भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने से उनसे यह अपेक्षा की जा रही है कि वह भाजपा के हिंदुत्व और राम मंदिर के मुद्दे को अपने चुनावी क्षेत्र में मुखर करेंगे। लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वह शिवाजी महाराज के सर्वधर्म समभाव पर ही काम करेंगे। राजघराने से आने से भोसले के कारण सतारा में राजनीति गरम है। यहां उनका मुकाबला इंडिया और महा विकास आघाडी के घटक दल एनसीपी (शरद पवार गुट) के शशिकांत शिंदे से है। पवार अपनी चुनावी रणनीति के लिए जाने जाते हैं। पवार अपनी रणनीति से भोसले को लोकसभा के उपचुनाव में हराने में कामयाब हुए थे। इसलिए यहां भोसले और शिंदे का मुकाबला बहुत ही रोचक रहेगा।

यही पवार बारामती में अपने ही परिवार से चुनावी लड़ाई लड़ रहे हैं। भाजपा ने पवार की पार्टी एनसीपी में बंटवारा करा दिया है। इसके लिए भाजपा ने पवार के भतीजे अजित पवार को अपने जाल में फंसाया है। विद्रोह करके अजित अलग हो गए और भाजपा नीत महायुति में शामिल हो गए हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में बारामती वह चुनावी क्षेत्र है जहां पवार को हराने का मतलब है कि राज्य की राजनीति पर कब्जा कर लेना। इसके लिए भाजपा के केंद्रीय नेताओं ने भरपूर रणनीति तय कर रखी है। पिछले चुनाव में भाजपा को सफलता नहीं मिली थी। इस बार अजित के भरोसे भाजपा को जीत संभव लग रहा है। लेकिन पवार भी भाजपा के सपने को तोड़ने की पूरी रणनीति तय कर रखी है। पवार के लिए भी अपनी बेटी सुप्रिया को जिताने की जिम्मेदारी है। इसमें पवार का पूरा परिवार साथ है। पवार परिवार ने अजित का साथ छोड़ दिया है।

अजित को भी अगर राज्य की राजनीति में चाचा पवार से ऊंचा स्थान पाना है तो उनके लिए यहां से अपनी पत्नी सुनेत्रा को जिताना जरूरी है। हालांकि, यह बहुत आसान नहीं लग रहा है। क्योंकि, पवार के समर्थक अलग हैं और उनके भटकने पर ही खेल बिगड़ सकता है। पवार घराने के अलावा सांगली में पाटील घराना भी अपनी राजनीतिक हैसियत से विरोधी को परेशान कर रखा है। सांगली लोकसभा सीट से कांग्रेस को उम्मीदवारी नहीं मिली है। उम्मीदवार के तौर पर वसंतदादा पाटील के पोते विशाल खुद को प्रबल दावेदार बता रहे हैं। लेकिन उद्धव ठाकरे ने अपने नेतृत्व वाली शिवसेना के उम्मीदवार के रूप में पहलवान चंद्रहार पाटील को घोषित कर दिया। इससे कांग्रेस में पाटील समर्थक भड़क गए। वैसे, सांगली पर कांग्रेस का दबदबा रहा है। लेकिन हालिया दिनों में कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है। वैसे, पाटील इस बात से इनकार करते हैं। शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) का दावा है कि कांग्रेस के कमजोर पड़ने से इस सीट को जीतने में शिवसेना सक्षम है।

शिवसेना का दावा है कि चंद्रहार भले ही नए हैं मगर वह युवा हैं और सांगली की जनता बदलाव चाहती है और बदलाव के लिए चंद्रहार सक्षम हैं। लेकिन विशाल के निर्दलीय उम्मीदवार बनने से इंडिया और महा विकास आघाडी को झटका लग सकता है। भाजपा ने संजय काका पाटील को उम्मीदवार बनाया है। पिछले चुनाव में संजय ने विशाल को डेढ़ लाख से ज्यादा मतों से हराया था।

विशाल ने कांग्रेस नहीं बल्कि एसडब्ल्यूपी के टिकट पर चुनाव लड़ा था। शिवसेना (उद्धव गुट) का मानना है कि विशाल का कांग्रेस से नाता टूट गया था। अब आघाडी के उम्मीदवार के रूप में चंद्रहार ही चुनाव मैदान में संजय को हराने में सक्षम हैं। दावे तो अपने-अपने हैं लेकिन तीसरे चरण में 7 मई को जब मतदान होगा और उसके बाद जब नतीजे आएंगे तब पता चलेगा कि किसका सिक्का चला है।