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Prosecution Permission: करोड़ों के ठेके दिलाने वाले पूर्व प्रमुख अभियंता को बचा रहा था विभाग, विधि विभाग की राय पर देना पड़ी अभियोजन मंजूरी

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Prosecution Permission: करोड़ों के ठेके दिलाने वाले पूर्व प्रमुख अभियंता को बचा रहा था विभाग, विधि विभाग की राय पर देना पड़ी अभियोजन मंजूरी

भोपाल: चहेते ठेकेदार को जलसंसाधन विभाग हंसापुर जलाशय और रीवा जलाशय के करोड़ों के काम दिलाने ठेकेदार के काम को बढ़ाचढ़ाकर दिखाने वाले प्रमाणपत्र जारी करने वाले जलसंसाधन के पूर्व प्रमुख अभियंता एमजी चौबे को बचाने पूरा जलसंसाधन विभाग मैदान में आ गया। EOW ने शिकायत की जांच के बाद चौबे के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मांगी तो इसके लिए सक्षम जलसंसाधन विभाग के अफसरों ने चौबे को बचाने के लिए दलील दी कि चौबे ईमानदार,प्रतिभावान, अति ज्ञानवार अधिकारी है उन्होंने कई पुस्तकें लिखी है। दस्तावेज निचले स्तर पर बाबुओं द्वारा तैयार किये गए है। चौबे ने केवल प्रमाणित किया है। इसलिए निचले स्तर पर हुए कामों के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं माना जा सकता इसलिए उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत अभियोजन की स्वीकृति नहीं दी जा सकती।
*यह था मामला-*
कार्यपालन यंत्री हिरन जलसंसाधन विभाग जबलपुर के द्वारा वर्ष 2008-09 में हंसापुर जलाशय से संबंधित कार्य के लिए जारी की गई निविदा 10 डीएल 24 सितंबर 2008 को प्राप्त हुई थी। आरोपी ठेकेदार संतोष मिश्रा  की निविदा में उसके द्वारा प्रस्तुत भौतिक अर्हता के जो प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए गए  उनमें जलसंसाधन विभाग के डिंडौरी में पदस्थ तत्कालीन कार्यपालन यंत्री एमजी चौबे द्वारा जारी प्रमाणपत्र  के आयटमों की मात्राओं तथा वास्तविक कार्य की मात्राओं में भिन्नता पाई गई थी। ईओडब्ल्यू ने विवेचना के दौरान पाया कि यह प्रमाणपत्र चौबे द्वारा जारी किया गया था। इसमें चौबे के ही हस्ताक्षर प्रमाणित पाए गए थे। चौबे ने कूटरचित दस्तावेज जारी कर ठेकेदार को उपकृत किया। जिसका उपयोग संतोष मिश्रा ठेकेदार ने हंसापुर जलाशय के काम के लिए निविदा  प्राप्त करने में किया। इस प्रकार चौबे के हस्ताक्षर से जारी प्रमाणपत्र  में लिखी भौतिक कामों की मात्राएं सही मात्राओं से भिन्न और बढ़ाकर लिखी गई थी। EOW ने माना कि चौबे ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए ठेकेदार के साथ मिलकर कूटरचित दस्तावेज जारी किया और ठेकेदार ने हंसापुर और रीवा जलाशयों के काम के लिए जारी निविदाओं में इसका उपयोग किया। मिथ्या और कूटरचित दस्तावेजों का सत्यापन कराए बिना ही  निविदा स्वीकृति की अनुशंसा कर दी गई। बाद में शिकायत हुई जिसकी जांच  छिंदवाड़ा के अधीक्षण यंत्री ने की  जिसमें पाया गया कि ठेकेदार के द्वारा प्रस्तुत अर्हता प्रमाणपत्र फर्जी और असत्य थे। इसके बाद निविदा निरस्त कर दी गई। यह कार्य आज भी लंबित है।
शासन को हुई आर्थिक क्षति के लिए इस मामले में आरोपी एमजी चौबे रिटायर्ड प्रमुख अभियंता, तत्कालीन कार्यपालन यंत्री और अनुविभागीय अधिकारी शिखरचंद जैन उप संभाग  कुंडम के विरूद्ध अभियोजन स्वीकृति ईओडब्ल्यू ने जलसंसाधन विभाग से मांगी थी।
*ऐसे बचा रहे थे विभाग के अफसर-*
विभाग ने कहा कि ठेकेदारों के अनुभव प्रमाणपत्र  र्काालय सहायकों द्वारा ठेकेदार के पूर्व में संपादित कार्यो के पुराने अभिलेख देखकर तैयार किए जाते है। इसपर इनके इनीशियल हस्ताक्षर भी होते है। कार्यपालन यंत्री के पास बांध, नहर सर्वेक्षण, निर्माण अनुरक्षण, सिचाई, बाढ़ नियंत्रण जैसे काम होते है।वे के वल सहायक द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते है। इसमें उनकी कोई दुर्भावना नहीं होती।  अनुभव प्रमाणपत्र का सत्यापन करना निविदा प्रक्रिया का प्रारंभिक लघु अंग है इसके आधार पर हानि के लिए इन अधिकारियों को उत्तरदायी बनाना उचित प्रतीत नहीं होता। इसमेें अफसरों की दुर्भावना नहीं है इसलिए अभियोजन स्वीकृति नहीं दी जाना चाहिए। चौबे ईमानदार अफसर है, उनका चरित्र अच्छा है, उन्होंने पुस्तके लिखी है।
विधि विभाग ने कहा अच्छा चरित्र बचाव का साधन नही हो सकता
विधि विभाग ने  इस मामले में कहा कि अच्छा चरित्र किसी व्यक्ति का बचाव नहीं हो सकता। आरोपी अधिकारी चौबे ने ठेकेदार के पक्ष में जारी प्रमाणपत्र में  कार्य की मात्रा बढ़ा चढ़ा कर बताई है। यह प्रथम दृष्टया भ्रष्ट आचरण  की श्रेणी में आता है।  अपराध गठित करने के लिए यह साक्ष्य पर्याप्त है। इसलिए आरोपी के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति दी जाना चाहिए।

*ACS राजौरा ने दे दी मंजूरी-*
इस पूरे प्रकरण में विधि विभाग के अभिमत से सहमत होते हुए जल संसाधन विभाग के अपर मुख्य सचिव राजेश राजौरा के निर्देश पर विभाग के उपसचिव आशीष तिवारी ने मामले में चौबे के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम  के तहत अभियोजन स्वीकृति दे दी।