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गणतंत्र दिवस समारोह: राहुल गांधी और खरगे को तीसरी कतार में बैठाने पर सियासी बहस

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गणतंत्र दिवस समारोह: राहुल गांधी और खरगे को तीसरी कतार में बैठाने पर सियासी बहस

New Delhi: नई दिल्ली में 76वें गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान परेड से अधिक चर्चा दर्शक दीर्घा में बैठने की व्यवस्था को लेकर हुई। लोकसभा में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को तीसरी कतार में बैठाए जाने के बाद राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस ने इसे स्थापित प्रोटोकॉल का उल्लंघन और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ बताया है, जबकि भाजपा ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित करार दिया है।

● क्या है पूरा मामला

गणतंत्र दिवस परेड में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, विदेशी अतिथि, राज्यों के मुख्यमंत्री और प्रमुख संवैधानिक पदाधिकारी शामिल होते हैं। परंपरागत रूप से विपक्ष के नेता को अग्रिम पंक्तियों में स्थान दिया जाता रहा है। इस बार राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे को अपेक्षाकृत पीछे तीसरी कतार में बैठाया गया, जिसे कांग्रेस ने जानबूझकर किया गया कदम बताया।

● कांग्रेस का आरोप, प्रोटोकॉल नहीं मानसिकता उजागर

इस मुद्दे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस का कहना है कि यह केवल बैठने की व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सम्मान और संवैधानिक मर्यादा का विषय है। पार्टी के अनुसार, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे दोनों ही विपक्ष के शीर्ष संवैधानिक प्रतिनिधि हैं, ऐसे में उन्हें पीछे बैठाना विपक्ष को नीचा दिखाने की कोशिश है। कांग्रेस नेताओं ने इसे सरकार की हीन भावना और असहमति को बर्दाश्त न करने की मानसिकता से जोड़ा।

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● लोकतांत्रिक मूल्यों पर उठे सवाल

कांग्रेस का तर्क है कि राष्ट्रीय पर्व जैसे अवसर पर सत्ता और विपक्ष दोनों का समान सम्मान होना चाहिए। अगर ऐसे मौके पर भी विपक्ष के नेताओं के साथ भेदभाव किया जाता है, तो यह लोकतंत्र की भावना को कमजोर करता है। पार्टी का कहना है कि मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन अपमान लोकतांत्रिक संस्कृति का नहीं।

● भाजपा का पलटवार, बेवजह का विवाद

भाजपा ने कांग्रेस के सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि गणतंत्र दिवस समारोह की बैठने की व्यवस्था सुरक्षा और प्रशासनिक प्रोटोकॉल के तहत तय की जाती है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस हर मुद्दे पर राजनीतिक रंग देने की कोशिश करती है और इस मामले को भी अनावश्यक रूप से तूल दिया जा रहा है।

● राजनीति से आगे की बहस

यह विवाद अब सत्ता और विपक्ष के बीच संबंधों को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। क्या राष्ट्रीय आयोजनों में राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर संस्थागत सम्मान दिखाया जाना चाहिए या फिर ऐसे मंच भी सियासी संदेश देने का माध्यम बनते जा रहे हैं। गणतंत्र दिवस, जो संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक है, उसी दिन विपक्ष के सम्मान को लेकर उठे सवाल इस बहस को और गहरा कर रहे हैं।