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कविता : गाँव में सेमर का फूल खिलना

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गाँव में सेमर का फूल खिलना

तृप्ति पटेरिया

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गाँव में सेमर का फूल खिलना,
सिर्फ़ मौसम का बदलना नहीं होता,
ये उस चुप खड़े पेड़ का
अचानक बोल पड़ना होता है।
साल भर जो खामोश रहा,
सूखी शाखों में जैसे कोई उम्मीद दबाए,
वही एक दिन लाल हो उठता है
जैसे दर्द ने रंग ओढ़ लिया हो।

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सेमर का अस्तित्व…
भीड़ में अलग दिखने का साहस है,
जब बाकी पेड़ हरियाली में खो जाते हैं,
वो नंगे तन पर भी
अपनी पहचान लिख जाता है।
उसके फूल कहते हैं
खूबसूरती हमेशा कोमल नहीं होती,
कभी-कभी वो तपती धूप में,
काँटों के बीच भी जन्म लेती है।

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सेमर का फूल खिलना,
जीना सिर्फ़ हरा होना नहीं,
कभी सूखकर भी
खुद को रंग देना पड़ता है।
वो पेड़ नहीं, एक ज़िद है…
जो कहता है
मैं रहूँगा,
अपनी तरह,
अपने रंग में !!

लेखिका प्रकृति और  संवेदनशील विषयों पर समय समय पर सभी  विधाओं में लिखती हैं वे बेतूल में  डिप्टी कलेक्टर के पद पर पदस्थ हैं .

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