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लघुकथा: दोहरी जिम्मेदारी

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लघुकथा

दोहरी जिम्मेदारी

श्रद्धा जलज घाटे

‘’अच्छा! तो पास वाली कुर्सी पर आज आप हैं?” बाल ठीक करते-करते मुस्कुराते हुए तिवारी मैडम ने पूछा
” हांजी,गुडमॉर्निंग।”
चश्मा पहनने के बाद, तेजी से फार्म्स और केवाईसी वे जमा रहीं थी कि तभी उनका मोबाइल फोन बज उठा। किसी बुजुर्ग महिला की आवाज पर उन्होंने नरमी से कहा ‘’बाम अलमारी के दूसरे खाने में है। हां,ठीक है, सब्जियां लेती आऊंगी।” गैस सिलेंडर भी शाम तक आ जायेगा।

अब वे डॉक्यूमेंट्स भरने में तल्लीन दिख रही थीं। मैं भी अपने काम में व्यस्त हो गया।
अचानक उन्होंने पूछा “पदोन्नति परीक्षा की तारीख आ गई क्या ?” मैं जवाब दूं ,उसके पहले ही उनका मोबाइल फिर बजा। इस बार नंबर देखकर उनकी बांछे खिल गईं।
“हां वादा रहा, आज जल्दी आ जाऊंगी और दो दिन की छुट्टी भी ले लूंगी।’’कौन था मैं समझ नहीं पाया क्योंकि तभी मैनेजर आए और बोले- “कल भोपाल से ऑडिटर आ रहे हैं। कुछ भी पेंडिंग न रहे, और हां, अब अगले सप्ताह किसी को छुट्टी नहीं मिल पाएगी।’’
यह सुनते ही उनका चेहरा उतर गया। पीठ कुर्सी पर टिका उन्होंने एक गहरी सांस ली। अब उनके हाथ बड़ी तेजी से कंप्यूटर की बोर्ड पर चल रहे थे, कि मैनेजर ने उन्हें बुलवाया।
“जी सर ‘’
“पहले मुख्य शाखा का निरीक्षण तय हुआ है, अपनी शाखा का बाद में होगा। आपको छुट्टी मिल सकेगी।”
उनका बुझा हुआ चेहरा फिर से खिल उठा। “ओह! धन्यवाद सर,वो क्या है न… परसों बेटे की फिजिक्स की परीक्षा है। तनाव ग्रस्त बेटा चाह रहा है, मैं उसकी मदद करूं।

अपनी दोहरी जिम्मेदारियों को भली-भांति निभा सकने का उल्लास अब तिवारी मैडम के चेहरे पर दिख रहा था।

श्रद्धा जलज घाटे
रतलाम
मो 9425103802