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Silver Screen : फिल्मों में कला और नग्नता का जीवंत सवाल!

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Silver Screen : फिल्मों में कला और नग्नता का जीवंत सवाल!

फिल्मों में सेक्स एवं ग्लैमर हमेशा से ही चर्चा और विवाद का विषय बना रहा है। आजादी के बाद जब देश प्रेम वाली फिल्मों की संख्या कम हुई, तो फिल्मकारों ने नए विषयों की खोज की!
इसके बाद ही नायिका के अंग-प्रत्यंग से दर्शकों को लुभाने के प्रयास शुरू हुए! इस आँधी से कोई नहीं बच सका। यहाँ तक कि राजकपूर व मनोज कुमार जैसे सार्थक फिल्म बनाने वाले निर्माता भी इससे बच नहीं सके।
राजकपूर ने ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ तथा मनोज कुमार ने अपनी लगभग सभी फिल्मों में ग्लैमर, सेक्स व अंग प्रदर्शन को बखूबी से भुनाया। लेकिन, इन दोनों ही फिल्मकारों ने ग्लैमर को बहुत ही कलात्मक ढंग और ऐसे दृश्यों को फिल्माया कि उन पर जिस्म प्रदर्शन का आरोप नहीं लगा!
जबकि, दूसरी तरफ हृषिकेश मुखर्जी, गुलजार, श्याम बेनेगल और प्रकाश झा जैसे फिल्मकारों की ऐसी जमात थी, जो इस आँधी के बीच भी मकसद पूर्ण फिल्में बनाने में कामयाब रहे!
एक दौर ऐसा भी आया जब ऐसी फ़िल्में खूब बनी। 90 और 2000 के दशक को इसीलिए जाना जाता है, जब सेक्स और व एक्शन फिल्में बहुत बनी! कहा यह गया ये सब डूबते फिल्म उद्योग व ग्लैमर व्यवसाय को बचाने के नाम पर किया गया। 2000 के बाद का दशक जरूरत से ज्यादा बोल्ड निकला।
सेक्स व अंग प्रदर्शन के इस फार्मूले को इस दौर में ज्यादा विकृत तरीके से फिल्माया गया। सशक्त एवं सार्थक फिल्म बनाने वाले महेश भट्ट और उनकी अभिनेत्री बेटी पूजा भट्ट ने जिस्म, पाप, मर्डर जैसी फिल्में बनाकर इसे नया चेहरा दे दिया।
इन फिल्मों की बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ सफलता ने फिल्म-निर्माण की दिशा में एक नया हंगामा भी पैदा किया। बहुत सारे फिल्म निर्माता और निर्देशक अपनी फिल्मों में नायिकाओं एवं अन्य अभिनेत्रियों के शरीर के अधिक से अधिक कपड़े उतारने में जुट गए।
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हिंदी फिल्मों के निर्देशकों का कहना है कि उन पर नायिकाओं को अश्लील अंदाज में पेश करने के आरोप गलत हैं। वे तो वही बनाएंगे, जो मनोरंजन के बाजार में बिकेगा! अपनी बात के पक्ष में उनका तर्क यह रहा कि फिल्मों में नायिका को ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ की तरह दिखाने का चलन पूरी दुनिया की फिल्मों में है।
परदे पर महिला पात्रों का शरीर दिखाने के मौके दोगुने होते हैं। महिला किरदारों को ‘सेक्सी ड्रेस’ में दिखाने के मामले में जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया सबसे आगे हैं। जबकि, भारत का स्थान इसमें तीसरा है। लेकिन, महिलाओं के आकर्षक चेहरे दिखाने के मामले में भारतीय सिनेमा अव्वल है।
संयुक्त राष्ट्र ने भी विश्व सिनेमा पर करवाए गए एक रोचक अध्ययन में कहा था कि भारतीय फिल्मों की नायिकाएं सबसे आकर्षक हैं। लेकिन, परदे पर करीब 35% महिला पात्रों को सामान्य से अधिक नग्नता से पेश किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार सिनेमा पर ऐसा कोई अध्ययन कराया था।
‘यूएन विमेन’ और ‘द रॉकफेलर फाउंडेशन’ की मदद से जीना डेविस इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए इस अध्ययन में कहा गया था कि पूरे विश्व सिनेमा में महिलाओं को पुरुषों से कमतर दिखाया जाता है। इसके लिए उनके साथ भेदभाव, उन्हें वस्तु की तरह देखने का नजरिया और सेक्सी ढंग से पेश करने के विचार जिम्मेदार हैं।
इस रिपोर्ट में कहा गया कि फिल्मों में महिलाओं की सशक्त भूमिकाएं भी कमजोर ढंग से दिखाई जाती हैं। इस अध्ययन में भारतीय फिल्मों के बारे में कहा गया कि इसमें महिला पात्रों के यौनिक पक्ष को बेवजह ज्यादा उभारा जाता है। महिला पात्रों को पेशेवर किरदार नहीं दिए जाते।
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जबकि, रातों-रात शोहरत और पैसा कमाने के लालच में कई अभिनेत्रियों ने भी हर तरह के समझौते किए। देखा जाए तो कला का इससे अधिक पतन दूसरी किसी विधा में नहीं हुआ। आदिकाल से ये सवाल जिंदा रहा है, कि कला वास्तव में कला के लिए है या जीवन के लिए!
कंदराओं में बैठकर कोई कलाकार क्या लिखता, चित्रित करता अथवा गाता, उसका तो समाज पर कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ता! पर, जब जनता के लिए कोई रचना गढ़ी जाती है, तो उसका असर मानव मन पर ही नहीं, अंतर्मन पर भी गहरा पड़ता है।
यह सर्वमान्य है कि दृश्य काव्य बहुत शीघ्र तथा अधिक समय तक अपना प्रभाव रखता है। देश में महिलाओं को अशिष्ट रूप में प्रस्तुत करने पर दंड देने के लिए कानून है। सीधा सा अर्थ है कि अश्लीलता का मतलब है नग्नता!
फिल्मों में कला और कथित स्टोरी की डिमांड के नाम पर महिला शरीरों को निर्लज्जता पूर्वक लगभग बिना कपड़ों के ही दर्शाया जाता रहा है। इस तर्क को कौन स्वीकारेगा!
जबकि, ऐसी फिल्मों के समर्थक और ‘लव इन इंडिया’ जैसी चर्चित फिल्मों के निर्देशक कौशिक मुखर्जी का मानना है कि भारतीय फिल्मों को अगले स्तर पर ले जाने के लिए दोहरी मानसिकता से निजात पाना जरूरी है।
उनका कहना है कि हम खजुराहो जाते हैं और वहां नग्न मूर्तियों को देखकर उसे कला कहते हैं।
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जबकि, फिल्मों में अगर नग्नता दिखाई जाए, तो हम हाय-तौबा मचाने लगते हैं! इस दोहरी मानसिकता से और इस पाखंड से हमें निकलना होगा। अब वक्त आ गया है कि सरकार और सेंसर बोर्ड को अपनी मानसिकता बदलना होगी।
हॉलीवुड की फिल्मों में नग्नता और हिंसा के चरम सीमा पर पहुँच जाने, फिल्म-निर्माताओं की असीम आकांक्षा, लालसा और ललक ने भी फिल्म के कलापक्ष का ताबूत खड़ा करने का प्रयास किया!
लेकिन, बॉलीवुड के निर्माता यह तथ्य भूल गए कि तीन दशक पहले इसी सेक्स और हिंसा की बैसाखी पर खड़ी जापानी, फ्रेंच, स्वीडन एवं ब्राजील की फिल्मों ने भले ही विश्व बाजार में खड़े होने के पायदान ढूंढ लिए थे। लेकिन, अंततः उनकी यही लालसा उनके पतन का कारण भी बनी!
अंततः सशक्त एवं संवेदनशील फिल्मों की तरफ लौटकर उन्हें अपनी अस्मिता बचाना पड़ी। अन्यथा उस दौर में उन्मुक्त सेक्स व नग्नता का जितना खुला प्रदर्शन जापान, फ्रांस, स्वीडन, बाजील व पोलैंड की फिल्मों में हुआ था, उतना अन्यत्र कहीं नहीं!
यहाँ तक कि हॉलीवुड भी इसमें पीछे रह गया था। अब इस दौराहे पर भारतीय फ़िल्मकार क्या करें? सवाल लाख टके का है, पर जवाब तो दर्शक ही देंगे कि वे क्या देखना पसंद करेंगे!
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वास्तव में नायिका पात्र को लगातार सेक्सी अंदाज में बेचा गया।
लेकिन, इस दौर में गुलाब गैंग, कहानी, क्वीन, मर्दानी, हिचकी, मैरी कॉम, राजी, बरेली, की बरफी, तनु वेड्स मनु, सांड की आँख और ‘मिमी’ जैसी फिल्में भी आई, जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़े। नायिकाओं के लिए स्क्रिप्ट्स लिखी जा रही है। उन्हें केंद्र में रखकर फिल्में बन रही हैं।
वास्तव में अब स्थिति बदल रही है। लोगों की रुचि में भी परिवर्तन आ रहा है और सबसे बड़ी बात ये कि माहौल बदल रहा है। एक वक्त था जब निर्माता-निर्देशक नायिका प्रधान विषयों को हाथ नहीं लगाते थे।
परंतु, अब ऐसा नहीं है। ऐसी कई फिल्मों के नाम गिनाए जा सकते हैं, जिन्होंने न सिर्फ अपनी लागत निकाली, बल्कि निर्माता को मुनाफा भी कमा कर दिया। यही कारण है कि अब वे कोई भी जोखिम लेने को तैयार हैं।