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कहानी :” स्मृति-विस्मृति “

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कहानी :” स्मृति-विस्मृति “

शीला मिश्रा 
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ऑफिस से लौटकर राहुल ने जैसे ही घर में प्रवेश किया, श्वेता की खिलखिलाहट उसके कानों में पड़ी, जो बालकनी में खड़े होकर किसी से फोन पर बात कर रही थी। सोफे पर बैठते हुए उसने बच्चों से पूछा -” क्या बात है…, आज मम्मी बहुत खुश नजर आ रही हैं?”
रोहन ने धीमी आवाज में कहा -“आपको पता है…कल मम्मी की बचपन की सहेलियाँ आ रहीं हैं इसलिए बहुत देर से मम्मी सलाह -मशविरा में लगीं हैं।”
“ओह …!तो यह है उन की हँसी का कारण।” राहुल ने चुटकी लेते हुए कहा। तब तक श्वेता फोन पर अपनी बात समाप्त कर राहुल के पास आकर बहुत चहकते हुए बोली -“आज मैं बहुत खुश हूँ मेरी बचपन की सहेलियाँ कल मेरे घर पर इकट्ठा हो रही हैं।”
अरे वाह…पर अचानक…..?”राहुल ने प्रश्न भरी निगाहों से श्वेता की और देखकर कहा।
” तुम्हें तो मालूम है न कि डाॅली पूरे चार साल बाद आस्ट्रेलिया से आई हुई है। उसी ने आगे बढ़कर हम सबके मिलने का कार्यक्रम तय किया। हमारे घर से नोएडा से आगरा व गुड़गांव की दूरी एक-दो घंटे की ही है,इसलिए सब हमारे यहाँ इकट्ठे हो रहें हैं।प्रियंका डॉली के साथ आगरा से आ जायेगी और रागिनी व बानी गुड़गांव से।हम सब इस मुलाकात को लेकर बहुत उत्साहित हैं।”श्वेता ने बहुत प्रसन्नता के साथ कहा फिर कुछ देर रुककर अनुनय भरे स्वर में बोली -” मुझे तुम्हारी सहायता चाहिए।”
” तुम अपनी सहेलियों से मिल रही हो ….तो मैं इसमें क्या सहायता कर सकता हूँ?”राहुल ने बहुत भोलेपन के साथ कहा।
“कल तुम्हें बच्चों की जिम्मेदारी उठानी होगी । सिनेमा देखने ,खरीदारी करने कहीं भी जा सकते हो और खाना भी बाहर ही खा लेना।” श्वेता ने वाणी में अतिरिक्त मिठास घोलते हुए कहा।
“हाँ, हाँ, क्यों नहीं ,परन्तु तुम अकेले चाय -नाश्ता-खाना कैसे संभालोगी?”राहुल ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा।
“खाना तो हमलोग बाहर से बुला लेंगे और चाय -नाश्ते व अन्य सहायता के लिए मैंने बिन्नी को दिन भर रुकने के लिए कह दिया है।” श्वेता ने बताया।
” ठीक किया ।”ऐसा कहते हुए राहुल ने एक निगाह श्वेता पर डाली।बचपन के मित्रों से मिलना निश्चित ही जीवन को नई स्फूर्ति, ऊर्जा व आनंद से भर देता है ,उस आनंद की कल्पना मात्र से ही श्वेता के मुख पर सुनहरी सी आभा परिलक्षित हो रही थी।
अगले दिन सुबह से ही एक-एक करके श्वेता की सहेलियां पहुँचने लगीं। उन सबकी हँसी व खिलखिलाहट से पूरा घर गूँज उठा ।जल्दी से नाश्ता कर , श्वेता की सहेलियों से औपचारिक मुलाकात कर राहुल ,रोहन व पिंकी को लेकर बाजार की तरफ निकल गया।
चार बजे तीनों घर वापस आ गए, चूँकि थके हुए थे तो पलंग पर लेटते ही उन तीनों की आँख लग गई ।कुछ देर बाद तेज हँसी की आवाज से राहुल की नींद खुली। वह उठकर टी वी खोलने जा ही रहा था कि श्वेता की आवाज उसके कानों में पड़ी-” अरे,मैं तो शादी के तुरंत बाद ही समझ गई थी कि राहुल अपनी माँ का बहुत लाड़ला है ।एक दिन भी उनसे बिना बात किए नहीं रह सकता। तभी मैंने ठान लिया कि राहुल की इस आदत पर लगाम तो कसनी ही पड़ेगी। बस दो-तीन महीने बाद ही मैंने कहना शुरू कर दिया- ‘क्या बच्चों की तरह माँ -माँ करते रहते हो,अब आप आपकी शादी हो गई है । माँ ने आपकी जिम्मेदारी मुझे दे दी है ,तो हर रोज फोन करके उन्हें क्यों परेशान करना।’ ‌राहुल को थोड़ा बुरा तो लगता था पर साल दो साल बीतते मैंने नियम सा बना दिया कि प्रत्येक रविवार को ही हम फोन पर उनसे बात करते फिर बच्चों के होने के बाद तो अंतराल बढ़ता ही गया।” इतना कहकर श्वेता ने जोर से ठहाका लगाया।उसके साथ उसकी सारी सहेलियां भी हँस पड़ीं।
राहुल को ऐसा लगा मानो गर्म सीसा उसके कानों में उड़ेला गया हो। वह अपमान के भाव से तिलमिला उठा। श्वेता की सोच पर उसे जहाँ गुस्सा आ रहा था वहीं आश्चर्य भी हो रहा था। भावनात्मक रुप से ठगे जाने के ख्याल से वह अत्यंत विचलित हो उठा।धीरे-धीरे उसे स्वयँ पर भी क्रोध आने लगा परन्तु मुट्ठियाँ भींचे किसी तरह मन को काबू में रखने की कोशिश कर रहा था। अनायास माँ की मुस्कुराती छवि उसकी आँखों के समक्ष उपस्थित हो गई।स्वयँ के द्वारा उनके प्रति की गई उपेक्षा से वह उद्वेलित हो उठा तथा पलंग से उठकर चहलकदमी करने लगा और कुछ ही पलों में हिरण की तरह छलांग लगाता बचपन उसकी स्मृति में तैरने लगा …….कितना प्यार करती थी माँ उसे… ,दीदी व भैया से भी ज्यादा, छोटा जो था। दीदी व भैया की शिकायत करने पर पापा जब डाँटते तो माँ तुरन्त बचाने आ जातीं और जब कभी वे डाँटती भी ,तब भी उनकी आँखों में उसे अपने लिए अथाह प्रेम ही नजर आता।जब नौकरी के लिए वह पहली बार उनसे ,अपने शहर से दूर जा रहा था तो माँ कितना कुछ कहना चाह रहीं थीं…. पर गले में रूँधी हुई सिसकी से बस इतना ही तो कह पाईं थीं-” अपना ख्याल रखना ‌।”मैं भी कहाँ कुछ कह पाया था ,मेरे अनबहे आँसू मेरी शिराओं में सिमट गए थे ।पर यहाँ आकर एक दिन ऐसा नहीं बीता जब मैं माँ से बात नहीं करता। कभी -कभी तो एक दिन में तीन बार….। माँ कितनी भी व्यस्त हों, मेरी पूरी बात सुनतीं और न जाने कितनी हिदायतें देतीं फिर पूछतीं -“तूने आज क्या खाया?” माँ के द्वारा पूछे गए ये शब्द मुझे अलौकिक दुनिया में ले जाते ।सच तो यह था कि मैं माँ की आवाज में यह सुनने के लिए ही तो उन्हें फोन करता था। अश्रुओं की बहती धार के साथ वह वर्तमान में लौटा , पलंग पर बैठकर अपने अश्रुओं को पोंछते हुए सोचने लगा कि उसने आखिरी बार माँ से कब बात की है …….?.बहुत सोचने के बाद उसे याद आया… डेढ़ महीने पहले पापा के जन्मदिन पर बात हुई थी और माँ के पास गए तो दो साल से ज्यादा समय बीत गया है। उसे सीने में बहुत भारीपन सा महसूस होने लगा।छत की ओर देखते हुए वह अपराध -भाव से सोचने लगा कि वह इतना स्वार्थी व निर्मोही कैसे हो गया…? स्वयं को दोषी मानते हुए वह आत्मग्लानि के भाव से भर उठा। माँ उसे कितना याद करती होंगी।मैंने उनका दिल दुखाया है,इस बात की पीड़ा से व्यथित हो उसने अनायास अपने पास लेटे हुए रिंकी व रोहन की तरफ देखा,उसके मन में यह विचार कौंधा कि ये दोनों भी बड़े होकर मुझसे इतने दिन बात ना करें तो……. यह ख्याल आते ही वह पसीना -पसीना हो गया ।शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई। उसका मन किया कि वह अभी दौड़कर माँ के पास जाए और उनकी गोदी में सिर रख कर लेट जाए और माँ हमेशा की तरह उसके सिर पर हाथ फेरें।उस स्नेहिल स्पर्श के लिए वह तड़प उठा और शनै:-शनै: घनीभूत होती पश्चाताप की भावना पिघलकर आँखों से बह निकली, उस धार का हर एक कतरा माँ को पुकार रहा था ।तभी रिंकी के उठने की आहट हुई तो वह अपने को संयत कर सामान्य होने की कोशिश करने लगा। तब तक रोहन भी जाग गया, उधर श्वेता की सहेलियाँ भी विदा हो रहीं थीं।
कुछ ही देर में श्वेता ने बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में कमरे में प्रवेश किया, दोनों बच्चे माँ से लिपट गए। श्वेता भी उन्हीं के पास लेटकर अपनी सहेलियों के बारे में उत्सुकता से बताने लगी। राहुल अनमने भाव से केवल ‘हाँ-हूँ ‘करता रहा। उसके अवचेतन को तो उदासी ने घेर लिया था ।वह मन ही मन स्वयँ से वादा करता रहा कि कल ऑफिस पहुँचकर सबसे पहले माँ से बात करेगा।
सुबह वह आफिस के दरवाजे पर पहुँचा ही था कि फोन की घंटी बजी, भाभी का फोन था-” भैया आप से बात हो सकती है?”
उसके ‘ हाँ’ कहते ही वह जल्दी से बोलीं- “कुछ दिन से माँ की तबीयत ठीक नहीं है। आप चाहो तो एक बार आकर मिल जाओ।”
“अरे….क्या हुआ माँ को….?” राहुल ने घबराते हुए पूछा।
“कुछ दिनों से वे गुमसुम- सी रहने लगीं हैं ।कभी हम सब को पहचानती हैं तो कभी अजनबी आँखों से देखती हैं।” भाभी ने कुछ परेशानी के साथ कहा।
“डॉक्टर को दिखाया ..?वे क्या कहते हैं?” राहुल ने माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए पूछा।
” हाँ दिखाया ना….! डॉक्टर ने कहा है कि इस उम्र में इस तरह की परेशानी हो जाती है। अल्जाइमर बताया है बीमारी का नाम। साथ ही यह भी कहा है कि अभी शुरुआत है। वैसे हम सब उनका ख्याल रख रहे हैं।” भाभी एक साँस में सब कह गईं।
“आप लोगों ने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?” यह कहते हुए राहुल के हृदय में टीस उठ रही थी।
” भैया,हम सब माँ को एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर को दिखाने में लगे रहे। कई तरह की जाँचें भी करानी पड़ीं। हम सब उसी में व्यस्त थे। पिताजी भी घबरा गए थे, उनका भी ख्याल रखना था। वैसे आप लोगों के फोन दस- पंद्रह दिन में पिताजी के पास आ ही जाते हैं, तो हमने सोचा कि उन्होंने बता दिया होगा किन्तु आज पिताजी ने ही कहा कि बिट्टू का बहुत दिन से फोन नहीं आया है। उसको मम्मी की तबियत के बारे में बता दो ।”भाभी के स्वर कुछ उलाहना से भरे हुए थे।
” माँ मुझसे बात कर पाएंगी ना…?” उसने रुआँसे स्वर में पूछा।
“उनकी तबियत देखते हुए बात कराने की कोशिश करूँगी।” इतना कहकर भाभी ने फोन रख दिया।
राहुल ने श्वेता को फोन लगाकर माँ की स्थिति के बारे में बताया ,साथ ही कहा कि वह तुरंत ही माँ के पास जाना चाहता है। टिकट की व्यवस्था होते ही वह सूचित करेगा। श्वेता ने दुख व्यक्त किया साथ ही चलने की इच्छा भी जाहिर की पर कुछ क्षण रुककर कहा कि वह अभी अकेला ही चला जाए ।बच्चों की मासिक परीक्षा के बाद वे सब भी वहीं आ जाएंगे।
राहुल का सारा दिन बेचैनी में गुजरा ।रात में ट्रेन में लेटते ही बचपन की स्मृतियों ने धीरे से दस्तक दी -गर्मी के दिन थे, उसे बहुत तेज बुखार था। माँ ठंडे पानी की पट्टी उसके माथे पर लगाती रहीं, बुखार उतरते ही वह पसीने से भीग गया ,फिर कमजोरी महसूस होते ही उसकी आँख लग गई।आधी रात में उसकी नींद खुली तो वह देखकर हैरान था कि माँ अभी भी सिरहाने बैठे उसके बालों पर हाथ फेर रहीं हैं,वह आश्चर्य से बोला -“अरे!आप सोईं नहीं…?” मेरे इतना पूछते ही वे कहने लगीं -“मेरा पल्लू अपने हाथ में दबाए तुम सो रहे थे,अगर मैं खींचती तो तुम्हारी नींद खुल जाती।” मैंने विस्मय से कहा -“क्या माँ….आप भी…. अच्छा अब तो आप सो जाओ।” “नहीं… फिर से अगर तेरा बुखार बढ़ जाएगा तो मुझे कैसे पता चलेगा…., इसलिए यहीं बैठती हूँ ।”उन्होंने चिंतित शब्दों में कहा फिर मेरे बहुत अनुरोध करने पर ही वे अपने कमरे में सोने के लिए गईं ‌। आँखों के कोरों से बहते आँसुओं को राहुल ने धीरे से पोंछा और करवट ली । माँ की छवि को आँखों में बसाए वह सोने का प्रयत्न करने लगा किन्तु अतीत के बादलों ने फिर उसे घेर लिया। बादल के हर टुकड़े में उसे माँ का चेहरा दिखाई दे रहा था ;कभी मुस्कुराता……, कभी डाँटता…. तो कभी खिलखिलाता…..।ममता की छांव में उसे अपना बचपन दिखाई दे रहा था ;दवाई खिलाने के लिए उसके पीछे भागती माँ…. पापा की डाँट से उसे बचाती माँ…… अपने हाथों से उसे खाना खिलाती माँ………खेलकर घर लौटने पर उसके पाँव दबाती माँ……..।उसे याद आने लगा बचपन में जब वह शैतानी करता तो माँ कहती थीं कि ‘एक चपत लगाऊंगी।’वह मन ही मन बोला ‘माँ मुझे एक नहीं ,बहुत सारी चपत लगाना।’
घर पहुँच कर वो सीधे माँ के कमरे में गया। भाभी उनको चाय पिला रहीं थीं। उसने माँ के पैर छुए तो वे उसकी तरफ अजनबी भाव से देखने लगीं।पिताजी बोले -‘देख तेरा लाड़ला आया है।’ तो वह पिताजी की तरफ देखकर पूछने लगीं -‘कौन?’
राहुल को गहरा धक्का लगा….. दर्द का एक बड़ा सा घूँट उसके गले में अटक गया ..।पिताजी के पैर छूने के साथ ही वह उनसे लिपट गया ।राहुल का मन हुआ कि वह जोर-जोर से चीखकर रोए परन्तु गले से आवाज ही नहीं निकली। उसकी बढ़ी हुई धड़कन को महसूस कर पिताजी उसे ढाढस बँधाते हुए बोले-“तुम मुँह-हाथ धो लो फिर हम दोनों माँ को बाहर बगीचे में ले चलेंगे , वहाँ उनके पास बैठकर तुम अपनी बचपन की बातें याद दिलाना। देखना…. !फिर तेरे को कैसे नहीं पहचान लेंगी।”
राहुल जब हाथ- मुँह धो कर आया तो भैया बाहर ही मिल गए ।भैया के पैर छूकर राहुल उनसे लिपट गया। अपनत्व की गर्माहट से उसका कंठ रुंध गया।वह भर्राए स्वर में बोला -“भैया सच-सच बताओ, माँ ठीक तो हो जाएंगी ना?’
“उम्मीद तो है क्योंकि माँ की इस हालत को ज्यादा समय नहीं हुआ है। पता है…, माँ के स्वभाव में परिवर्तन तो कुछ महीनों से आना शुरु हो गया था, किन्तु हमलोग समझ ही नहीं पाए। कभी-कभी वे अचानक अपने बचपन की या कोई पुरानी बात बताने लगतीं तो हमें यही लगता कि उन्हें अपना बचपन याद आ रहा है फिर माँ कई बार अचानक गुमसुम- सी हो जातीं तो हमें लगता कि एक तरफ जहाँ हम दोनों ऑफिस में व्यस्त रहते हैं ,वहीं दूसरी तरफ अंश व रितिका पढ़ने के लिए पूना चले गए हैं तो शायद वे अकेलेपन के कारण उदास रहने लगीं हैं।”
“तो आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया भैया …..?”राहुल के स्वर में गहरी निराशा थी।
“मैंने यह बताने के लिए तुम्हें एक बार फोन भी लगाया था ।श्वेता ने उठाया और कहा कि तुम बच्चों को पढ़ा रहे हो, बाद में बात करा देगी, लेकिन तुम्हारा फोन नहीं आया ।मैंने सोचा कि तुम बच्चों को पढ़ाने में व्यस्त रहते हो, इसलिए समय नहीं निकाल पा रहे हो।” भैया ने खुले मन से सच्चाई बता तो दी किन्तु अपने छोटे भाई की आँखों में नमी देखकर उसे ढाढस बँधाते हुए बोले -“वैसे तुम चिंता नहीं करो !डॉक्टर का कहना है कि उनसे लगातार बातें करते रहें तो वे ठीक भी हो सकती हैं क्योंकि अभी तो इस रोग की शुरुआत ही है।”

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तभी पिताजी माँ को बगीचे में लेकर आए ,राहुल उनके पास गया और भैया की तरफ इशारा करके उनसे पूछा-” माँ यह कौन है?” तो वह हँसकर बोली -“रोहित है।”
राहुल को दिल में असंख्य किरचें चुभती हुई -सी महसूस होने लगीं।इस बीच भाभी चाय -नाश्ता लेकर आ गयीं। उसने भैया के साथ चाय -नाश्ता किया। थोड़ी देर रुककर भैया आफिस के लिए तैयार होने चले गए। वह भारी मन से माँ को अपलक देखे जा रहा था। उनका पथरीला मौन उसे सिहरा रहा था। राहुल का निराश चेहरा देख पिताजी उससे बोले-” तुम अपने बचपन की बातें करो, उन्हें अच्छा लगेगा।”
राहुल माँ के पैर के पास बैठ गया, फिर अपने बचपन की कई बातें उन्हें सुनाने लगा। माँ कभी हँसतीं तो कभी उसकी तरफ आश्चर्य से देखतीं तो कभी दूसरी तरफ मुँह घुमा कर कहीं और देखने लगतीं ।उसे ऐसा महसूस होता मानो पत्थर से टकराकर उसकी आवाज वापिस आ रही है। अस्तित्व के नकारे जाने की पीड़ा से उसकी निराशा बढ़ती जा रही थी। राहुल के चेहरे पर फैलती जा रही उदासी की चादर को पिताजी ने समेटने का प्रयत्न करते हुए कहा-” हम सब भी इसी तरह कोशिश करते रहते हैं ।कभी -कभी किसी बात पर प्रतिक्रिया भी देतीं हैं ।तुम तो उनके लाड़ले हो, देखना ! वे तुमसे जरूर बात करेंगीं।”
इसी तरह चार दिन बीत गये।इन चार दिनों में राहुल ज्यादा से ज्यादा अपनी मां के पास रहने की कोशिश करता……वह माँ को बचपन की ढेर सारी बातें सुनाता,कभी उनके मुख पर हल्की सी मुस्कान आती तो कभी वे अजनबी नजरों से राहुल को तकने लगतीं। जैसे-जैसे दिन बीतने लगे , उसकी निराशा बढ़ने लगी …….वह माँ के पास… रहता जरुर किन्तु……. बस…….. उन्हें तकता.. लेकिन रहता….. मौन …….एकदम मौन…. उसके शब्द होंठों पर आकर ठहर जाते….ठीक वैसे ही जैसे बचपन में माँ के दूर जाते ही आँसू आँखों में आकर ठहर जाते थे और निगाहें बस माँ का इंतजार करतीं रहतीं थीं………।
एक दिन खाना खाकर वह माँ के कमरे में आया। वे पलंग के सिरहाने में तकिया से पीठ टिकाए बैठीं ,स्थिर आँखों से शून्य में ताक रही थीं । माँ की यह अवस्था उसे विचलित करने लगी। वह माँ का प्यार पाना चाहता था… उनके वात्सल्य से सराबोर होना चाहता था…. उसका भावुक मन ममता के लिए व्याकुल हो उठा…….और …उसकी तीव्र इच्छा हुई कि वह बचपन की तरह माँ की गोदी में सिर रखकर लेटे। उसने पिता जी से पूछा ,उनके ‘ हाँ” कहते ही वह माँ की गोदी में सिर रख कर लेट गया और माँ ,जो लोरी सुनाया करती थीं, वही गुनगुनाने लगा। थोड़ी देर में माँ ने उसका सिर एक तरफ किया और स्वयँ दूसरी तरफ मुँह करके लेट गईं। राहुल उठा…. अंतस् में घनीभूत होती पीड़ा से बिधा हुआ माँ को तकता हुआ एक छोटे बच्चे की तरह बिलख पड़ा……। उसका सारा दुख….., अपने प्रति का रोष…… ,पश्चाताप….. सब आँखों के माध्यम से बह निकला ।वह जोर-जोर से रोते हुए कहता जा रहा था “माँ ! मुझे मेरे नाम से पुकारो न…….. मुझसे बात करो ना ………कुछ बोलो ना ……. माँ !कुछ बोलो ना……..!”
पिताजी असहाय से राहुल को देख रहे थे। तभी सहसा माँ उठीं, पिताजी की ओर देखकर बोलीं -“जरा बाहर जाकर देखो, बिट्टू के रोने की आवाज आ रही है।”
इतना सुनते ही राहुल का शरीर काठ की तरह स्थिर तथा निस्पंद हो गया।वह हक्का-बक्का माँ को घूरे जा रहा था।कुछ क्षणों के पश्चात खुशी व दर्द की मिश्रित अनुभूति से भौंचक्का- सा वह कभी माँ की और देख रहा था तो कभी पिताजी की ओर। भावविभोर हो वह बुदबुदाने लगा -‘माँ मुझे नहीं पहचान रहीं… पर मेरा रुदन पहचानतीं हैं, इसका मतलब….. इसका मतलब ….मैं.. .. मैं…. माँ के विस्मृत संसार में कहीं मौजूद हूँ….मतलब….. माँ मुझे…. मुझे भूली नहीं हैं….” धीरे-धीरे उसके मन में भावनाओं का ज्वार सा उमड़ पड़ा। वह माँ से कहना चाह रहा था कि ” माँ! मैं यहीं हूँ… मेरी तरफ देखो ना….. मैं यहीं हूँ… माँ मैं… तुम्हारा बिट्टू…..!”पर भावातिरेक में शब्द उसके होठों पर आकर रुक गए और आँसू भी शब्द की तरह कृपण होकर मन की धरती पर ही गिरने लगे,तभी उसका ध्यान माँ की पुकार पर गया ,बुढ़ापे की विशाल ममता टूटे हुए हृदय से निकल कर अत्यंत आर्त्त स्वर में पुकार रही थी….. “बिट्टू….. बिट्टू …. बिट्टू..…..!”
वह तुरन्त माँ के नजदीक जाकर खड़ा हो गया, माँ भी पलंग से उठकर खड़ी हो गईं और… और ….. बहुत देर तक उसे टकटकी बाँधे देखती रहीं फिर उनके मुख पर अनेक भाव तेजी से आने- जाने लगे……मानो अंदर बहुत कुछ उमड़-घुमड़ रहा हो …… विस्मृति का पर्दा धीरे-धीरे हट रहा था .. और……फिर धीरे से उनके होंठ हिले और कुछ ही क्षणों में ………”तू……. बिट्टू………मेरा बिट्टू………”कहतीं हुईं वे राहुल से लिपट गईं …. उनकी आँखों से खुशी झर-झर-झर-झर झरने लगी…। छलकते वात्सल्य की सरिता में भावपूर्ण डुबकी लगाते हुए राहुल ने माँ को अपनी बाँहों में समेट लिया ……कभी न छोड़ने के लिए……।

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शीला मिश्रा
बी-4,सेक्टर-2,राॅयल रेसीडेंसी,
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बावड़ियां कलां, शाहपुरा,
भोपाल (म.प्र.)
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