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आज की बात:अभिभावकों पर बच्चों की शिक्षा खर्च का बोझ कैसे हो कम!

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बकरोनिया

आज की बात:अभिभावकों पर बच्चों की शिक्षा खर्च का बोझ कैसे हो कम!

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अशोक बरोनिया

 

आज से हमारे मध्यप्रदेश में स्कूल खुल गए हैं। मैं पिछले एक वर्ष से कार नहीं चला रहा हूँ। एक चालक रखा है। आज सुबह चालक ने बताया कि उसके दोनों बच्चों के स्कूल खुल गए हैं। लेकिन वह अभी तक उनकी किताबें नहीं खरीद पाया है। कारण पूछने पर बताया कि बड़ा बेटा पांचवीं में है और उसकी किताबों की कीमत साढ़े आठ हजार रुपये है। छोटा बेटा पहली में है और उसकी किताबों की कीमत साढ़े तीन हजार रुपए है। चालक के दोनों बच्चे बेहद कम फीस वाले प्राइवेट स्कूल में हैं।

चालक की बात सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। अगर बच्चों की किताबें इतनी मंहगी हैं तो कोई कैसे अपने बच्चों को शिक्षा दिला पाएगा। शायद यह भी एक कारण है हजारों बच्चों के स्कूल न जाने का जबकि बच्चों को शिक्षा उनका एक मौलिक अधिकार है।

सरकार विभिन्न सामग्रियों तथा दवाइयों की कीमत निर्धारित करती है। इसी तरह बच्चों की पाठ्य पुस्तकों की अधिकतम कीमत भी निर्धारित कर देनी चाहिए जो सरकारी तथा प्राइवेट स्कूलों दोनों पर लागू हों। एक अन्य उपाय यह है कि सरकारी प्रेस में सभी किताबें छपवाई जाएं और विद्यार्थियों को न्यूनतम मूल्य पर या निशुल्क उपलब्ध कराई जाएं। ऐसा करने पर अभिभावकों पर बच्चों की शिक्षा खर्च का बोझ कम होगा।

खैर जो भी हो सरकार को इस दिशा में जरूर मंथन करना चाहिए और बच्चों को न्यूनतम खर्च पर पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध करानी चाहिए। पाठ्य पुस्तकों की आसमान छूती कीमतें अभिभावकों पर एक बड़ा बोझ है। सरकारी तथा प्राइवेट स्कूलों में अन्य सुविधाओं का अंतर हो सकता है और तब प्राइवेट स्कूल तदनुसार फीस तय कर सकते हैं। लेकिन बच्चों के पाठ्य पुस्तकों पर यह फार्मूला नहीं लगना चाहिए। प्रत्येक बच्चे को चाहे वह सरकारी स्कूल में हो या प्राइवेट स्कूल में, पाठ्य पुस्तकें न्यूनतम मूल्य पर ही प्रदाय की जानी चाहिए।