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Tussle Between Governor & State Govt : राज्यपाल ने 10 विधेयकों को 3 साल लटकाया तो सुप्रीम कोर्ट ने पेश किए जाने की तारीख से उन्हें मंजूरी दी!

तमिलनाडु सरकार ने विधेयकों को मंजूरी न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट की शरण ली!

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Tussle Between Governor & State Govt : राज्यपाल ने 10 विधेयकों को 3 साल लटकाया तो सुप्रीम कोर्ट ने पेश किए जाने की तारीख से उन्हें मंजूरी दी!

New Delhi : राज्यपाल की मंजूरी के बिना कोई विधेयक कानून बन गया, यह देश में पहली बार ऐसा हुआ। यह ऐतिहासिक घटना सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद हुई, जिसमें तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि द्वारा विधेयकों को मंजूरी न दिए जाने के मामले में सुनवाई हो रही थी। न्यायमूर्ति एसबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि इन विधेयकों को उस तारीख से मंजूरी दी गई मानी जाएगी, जिस दिन इसे फिर से पेश किया गया था।

पीठ ने टिप्पणी की थी कि राज्यपाल ने विधेयकों को पहली बार में मंजूरी नहीं दी। जब इसे दोबारा भेजा गया, तो अब राज्यपाल के विचार के लिए आरक्षित नहीं किया जा सकता। इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के रवैये पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि विधेयकों में मुद्दों को खोजने में उन्हें तीन साल क्यों लगे!

तमिलनाडु की सरकार और राज्यपाल के बीच गतिरोध लंबे समय से चला आ रहा है। तमिलनाडु की विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को राज्यपाल की मंजूरी नहीं मिल पा रही थी। विधेयकों को लौटाने के बाद इन्हें दोबारा पारित कर राज्यपाल के पास भेजा गया था, फिर भी ये बिल मंजूरी के बिना लटके हुए थे।

अब 10 विधेयक कानून बन गए

इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। राज्य सरकार ने राज्यपाल पर जानबूझकर विधेयकों में देरी करने और विकास को बाधित करने का आरोप लगाया था। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 10 विधेयक बिना राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी के कानून बन गए। इन विधेयकों में राज्य द्वारा संचालित विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति पर संशोधित नियम शामिल हैं। स्टालिन सरकार ने इसे भारतीय राज्यों के लिए एक बड़ी जीत बताते हुए अदालत का धन्यवाद दिया है।

क्या कहा सुप्रीम की पीठ ने

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास कोई विवेकाधिकार नहीं है और उन्हें मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर अनिवार्य रूप से कार्य करना होता है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा था कि राज्यपाल सहमति को रोककर ‘पूर्ण वीटो’ या ‘आंशिक वीटो’ (पॉकेट वीटो) की अवधारणा को नहीं अपना सकते।

शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य विधानसभा द्वारा विधेयक को पुन: पारित किए जाने के बाद उसे पेश किए जाने पर राज्यपाल को एक महीने की अवधि में विधेयकों को मंजूरी देनी होगी। राज्यपाल के पास कोई विवेकाधिकार नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल द्वारा अपने कार्य निर्वहन के लिए कोई स्पष्ट समय सीमा निर्धारित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पास किए गए 10 लंबित विधेयकों को राज्यपाल द्वारा मंजूर मान लिया है। कोर्ट ने भविष्य के सभी विधेयकों पर कार्रवाई के लिए समय सीमा भी तय कर दी है। संविधान के अनुच्छेद 200 में यह प्रावधान नहीं था।