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सदन में नोटों की गड्डी का मिलना             

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 सदन में नोटों की गड्डी का मिलना                         

संसद का शीतकालीन सत्र वैसे तो मौसम से ज्यादा ठंडा पड़ा हुआ था । मगर बीते शुक्रवार यानी 06 दिसम्बर को कुछ ऐसा हुआ कि ठंडी पड़ी संसद के उच्च सदन में एकदम गर्माहट आ गई । गर्माहट की वजह सीट नम्बर 222 के किन्हीं सांसद की सीट से पांच सौ के नोटों की एक गड्डी का मिलना । बस फिर क्या था । नोटों की गड्डी को किसी ने छुआ तक नहीं । फिर भी नोटों की गड्डी की गर्माहट में ही पक्ष-विपक्ष के कई सदस्य अपनी हथेलियां तपाने लग गए । दोपहर बाद तक हथेलियां तपती रही , तब कहीं जाकर सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित करनी पड़ी । खैर ! कुछ भी हो संसद हंगामे से ही सही , थोड़ी देर के लिए चली तो ।

संसद चलती क्यों नहीं । रूपया है ही ऐसी ताकत , जो हर किसी को चला देता है । लोगों को यह भ्रम है कि वे रूपया चलाते हैं । जबकि रूपए को ये गुरूर है कि वह आदमी को चलाता है । चूंकि रूपयों की गड्डी संसद में किसी माननीय की टेबल से मिली है तो इसमें भी हैरान होने जैसी कोई बात नहीं है । सीधी सी बात है कि जो माननीय होगा , रूपया उसी की टेबल पर होगा । अमाननीय के पास ऐसी टेबल थोड़े ही होती है । उसके पास तो सड़क होती है । फूटपाथ होते हैं । वहां रूपयों की गड्डी नहीं होती , वहां तो थोड़े बहुत मैले कुचैले नोट और बाकी की चिल्लर होती हैं ।

फिर टेबल और नोट की गड्डी का भी आपस में अच्छा तालमेल है । टेबल की अपनी एक गुरुत्वाकर्षण शक्ति होती है । वह नोट को अपनी ओर खींच लेती है । या यूं कह लें कि नोट खुद चलकर टेबल तक आता है । टेबल तक आना उसकी मजबूरी है । नोट के टेबल पर आते ही टेबल खुद चलने लगती है । टेबल के साथ – साथ नोट भी चलने लगते हैं । नोटों को चलते देख महीनों से दबी हुई फाइलें भी चलने लगती हैं । एक टेबल से दूसरी , दूसरी से तीसरी टेबल । हर कोई तल्लीनता के साथ अपने काम में लगा नजर आता है । यही तो है सबका साथ , सबका विकास । इसे ही कहते हैं गति का नियम । न्यूटन के गति के नियम से भी पुराना नियम । इस हाथ दाम , उस हाथ काम । यानी एक्शन टू रिएक्शन ।

ऐसे में नोटों की गड्डी मिलने से सदन की गरिमा को ठेस पहुंचने का तो सवाल ही नहीं उठता है । संसद की गरिमा तो तब और बढ़ गई जब सीट नम्बर 222 के सदस्य बोले कि नोट मेरे नहीं हैं । सदन के अन्य सदस्यों में से भी नोटों का कोई दावेदार नहीं निकला । वरना चाहते तो कोई भी कह सकता था कि नोट मेरे हैं , चश्मा निकालते हुए कुर्ते की जेब से गिर गए होंगे । मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । इसे कहते हैं ईमानदारी । वैसे देखा जाए तो सदन में नोट मिलना एक शुभ संकेत है। यह हमारी मजबूत होती अर्थ व्यवस्था का प्रमाण भी है । कारण नोट , मात्र नोट नहीं हैं । नोट हैं तो वोट हैं । बीते सात दशकों से मतदान करते-करते भारतीय मतदाता भी परिपक्व हो चुका है । कुछ तो जरूरत से ज्यादा ही परिपक्व और जागरूक हो चुके हैं । चुनाव की पूर्व संध्या से लेकर मतदान की घड़ी तक वे तटस्थ रहते हैं । जब तक कहीं से संकेत न मिल जाएं कि ‘ तुम मुझे वोट दो , मैं तुम्हें नोट दूंगा ।’ तब जाकर किसी निर्णय पर पहुंचते हैं । ऐसे में तय है कि बिना रेवड़ियां बांटे अब कोई माननीय नहीं बन सकता । रेवड़ियां न सही कुछ तो बांटना ही पड़ेगा । थोड़ा बहुत भी नहीं बांट सकते तो फिर घर बैठिए । बांटोगे तो आगे बढ़ोगे , नहीं बांटोगे तो अपनों से ही कटोगे ।

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– डॉ. श्रीकांत द्विवेदी – धार

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