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“जंगल कटे तो सबसे पहले पानी की चाल बिगड़ी”: सेंधवा DFO गड़रिया की भावुक टिप्पणी ने छेड़ी पर्यावरण पर नई बहस

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“जंगल कटे तो सबसे पहले पानी की चाल बिगड़ी”: सेंधवा DFO गड़रिया की भावुक टिप्पणी ने छेड़ी पर्यावरण पर नई बहस

गणेश पांडे की विशेष रिपोर्ट

बड़वानी। जंगलों के लगातार घटते दायरे, सिकुड़ती नदियों और बदलते प्राकृतिक संतुलन को लेकर बड़वानी जिले के सेंधवा वन मंडल में पदस्थ IFS अधिकारी आई एस गड़रिया की भावुक टिप्पणी चर्चा का विषय बन गई है। उन्होंने नर्मदांचल की नदियों, जंगलों और मानव हस्तक्षेप पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए एक विस्तृत लेख लिखा, जिसे उन्होंने अपने वन मंडल के सोशल मीडिया समूह में साझा किया। लेख में उन्होंने जंगलों और नदियों के पारंपरिक रिश्ते, पर्यावरणीय असंतुलन और मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न संकट को बेहद संवेदनशील शब्दों में व्यक्त किया है।

DFO गड़रिया ने लिखा कि नर्मदांचल की नदियाँ हिमालयी नदियों की तरह बर्फ से नहीं, बल्कि जंगलों की कोख से जन्म लेती हैं। उनका अस्तित्व पूरी तरह जंगलों पर निर्भर है। उन्होंने कहा कि इस अंचल में जंगलों की कीमत सिर्फ लकड़ी से नहीं, बल्कि पानी से आंकी जाती रही है। विंध्याचल से लेकर सतपुड़ा तक फैले जंगल बरसात के पानी को रोककर धरती में उतारते हैं और वही पानी महीनों बाद झिरियों, सोतों और छोटी धाराओं के रूप में नदियों तक पहुंचता है। यही वजह थी कि कभी नर्मदा और उसकी सहायक नदियाँ सालभर बहने वाली सदानीरा नदियाँ मानी जाती थीं।

उन्होंने चिंता जताई कि जैसे-जैसे जंगल कटे, सबसे पहले पानी की चाल बिगड़ गई। पहले जो पानी धीरे-धीरे जमीन में समाकर नदी तक पहुंचता था, अब वह तेज बहाव के साथ बह जाता है। पहाड़ियों के नंगे होने से मिट्टी ढीली पड़ी और नदियों का स्वभाव बदल गया। अब बरसात में नदियाँ उफान पर दिखती हैं, जबकि गर्मियों में उनकी धाराएँ सूखने लगती हैं।

DFO गड़रिया ने नदी क्षेत्रों में बढ़ते अतिक्रमण और मानवीय हस्तक्षेप को भी नदियों के पतन का बड़ा कारण बताया। उन्होंने लिखा कि जहां पानी कम हुआ, वहीं खेत बढ़ा दिए गए, मेड़ें खिसका ली गईं और नदी किनारों पर निर्माण होने लगे। इसके चलते नदियों का दायरा लगातार सिकुड़ता गया। उन्होंने स्टॉप डेमों के अंधाधुंध निर्माण पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि बिना नदियों के स्वभाव को समझे किए गए ऐसे हस्तक्षेप उनके प्राकृतिक बहाव को बाधित कर रहे हैं।

रेत खनन को लेकर भी उन्होंने गंभीर चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार बड़ी नदियों की तुलना में छोटी सहायक नदियाँ रेत माफियाओं का ज्यादा शिकार हो रही हैं। रातों में मशीनें उतरकर नदी की तलहटी को खोखला कर देती हैं, जिससे नदी की संरचना और जलधारण क्षमता प्रभावित होती है।

अपने लेख में उन्होंने बदलते सामाजिक व्यवहार का भी उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि पहले गांव नदियों को देखकर बसते थे और घरों का मुंह घाट की ओर होता था, लेकिन अब गांव सड़क देखकर बसते हैं और घरों का रुख हाईवे की तरफ हो गया है। डीएफओ गड़रिया की यह भावुक अभिव्यक्ति अब पर्यावरण संरक्षण और नदियों के अस्तित्व को लेकर नई बहस को जन्म दे रही है।