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ईश्वर और अल्लाह को क्यों लड़वाएं?

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भाजपा ने अपने प्रवक्ता और मीडिया सेल के प्रमुख के विरुद्ध सख्त कार्रवाई तो की ही, अपने आधिकारिक बयान में उसने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह भारत में प्रचलित सभी धर्मों के प्रति सम्मान की भावना रखती है। उस बयान में यह भी बताया गया कि उसके प्रवक्ता और मीडिया प्रमुख ने पैगंबर मुहम्मद और इस्लाम के बारे में जो कुछ भी कहा है, उससे वह सहमत नहीं है।

भारत सरकार के प्रवक्ता ने कहा है कि भाजपा के इन कार्यकर्ताओं की टिप्पणी सनकीपने के अलावा कुछ नहीं है। भारत सरकार किसी धर्म, संप्रदाय या उसके महापुरुष के बारे में कोई भी निषेधात्मक विचार नहीं रखती है। भारत का संविधान सभी धर्मों को एक समान दृष्टि से देखता है। जरा खुद से आप पूछिए कि भाजपा और भारत सरकार को इतनी सफाइयां क्यों देनी पड़ गई हैं? इसका पहला कारण तो यह है कि इस्लामी देशों के सरकारें भाजपा के कार्यकर्ताओं की उन टिप्पणियों से बहुत नाराज हो गई हैं।

सउदी अरब, ईरान, पाकिस्तान, कुवैत, बहरीन, कतर, ओमान आदि देशों की सरकारों ने न सिर्फ उक्त टिप्पणियों के भर्त्सना की है बल्कि इन देशों में भारतीय माल का बहिष्कार भी शुरु हो गया है। कोई आश्चर्य नहीं कि इन देशों में रहनेवाले भारतीयों का वहां जीना भी दूभर हो जाए। इस्लामी सहयोग संगठन ने संयुक्त राष्ट्र संघ से अपील की है कि वह भारत के विरूद्ध कार्रवाई करे। भारत में भी, खासतौर से कानपुर में भी इस मामले को लेकर भारी उत्पात मचा है। भाजपा के जिन दो पदाधिकारियों ने ये टिप्पणियां की हैं, उनका कहना है कि टीवी वाद-विवाद में जब शिवलिंग के बारे में भद्दी बातें कही गईं तो उसके जवाब में उन्होंने भी जो ठीक लगा, वह पैगंबर मुहम्मद और इस्लाम के बारे में कह डाला। लेकिन वे क्षमा-याचनापूर्वक खेद व्यक्त करते हैं। वे किसी का दिल नहीं दुखाना चाहते।

लेकिन मेरा असली सवाल यह है और यह सवाल हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों और अन्य धर्मावलंबियों से भी है कि क्या वे सच्चे धार्मिक हैं? क्या वे सच्चे ईश्वरभक्त हैं? यदि हैं तो फिर किसी भी संप्रदाय की निंदा क्यों करना? सभी कहते हैं कि उनका धर्म, मजहब या संप्रदाय ईश्वर का बनाया हुआ है। क्या ईश्वर, अल्लाह, यहोवा, गाॅड, अहुरमज्द अलग-अलग हैं? यदि आप उनको अलग-अलग मानते हैं तो आपको यह भी मानना पड़ेगा कि ये सब प्रकार के ईश्वर और अल्लाह मनुष्यों के बनाए हुए है। मनुष्य ही ईश्वरों और अल्लाहों को लड़ा देते हैं। क्या इसीलिए एक-दूसरों के धर्मों और महापुरुषों की निंदा की जाती है?

दुनिया का कोई धर्मग्रंथ ऐसा नहीं है, जिसकी सब बातें आज भी मानने लायक हैं। सभी धर्मग्रंथों और सभी धार्मिक महापुरुषों में आप अत्यंत आपत्तिजनक दोष भी ढूंढ सकते हैं लेकिन उससे किसको क्या फायदा होनेवाला है? यदि हम सभी धर्मप्रेमियों और सारी मनुष्य जाति का हित चाहते हैं तो हमें सभी धर्मग्रंथों और धार्मिक महापुरुषों की सिर्फ सर्वहितकारी बातों पर ही ध्यान देना चाहिए।