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AIIMS में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: मंचित हुआ भावनात्मक नाटक — “मैं अनिकेत हूं” एक युवा की आत्म-खोज की गहराइयों में उतरता कोर्ट रूम ड्रामा

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AIIMS में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: मंचित हुआ भावनात्मक नाटक — “मैं अनिकेत हूं” एक युवा की आत्म-खोज की गहराइयों में उतरता कोर्ट रूम ड्रामा

 

रायपुर: विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की पूर्व संध्या पर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), रायपुर में हिंदी नाटक “मैं अनिकेत हूं” का मंचन किया गया। यह नाटक एक युवा के अपने अस्तित्व की तलाश और मानसिक संघर्ष की गहन झलक प्रस्तुत करता है।

नाटक के दौरान जब मुख्य पात्र अनिकेत की आंखों में आंसू और आवाज में कंपन के साथ यह संवाद गूंजता है — “जरा एक बार मेरे बारे में सोचो… मैं मरा भी हूं और जिंदा भी, जिंदा भी हूं और मरा भी। क्या विडंबना है ये…” — तो पूरा सभागार सन्न रह जाता है। दर्शक सोच में डूब जाते हैं कि आखिर यह युवक कौन है, जो खुद अपनी पहचान से जूझ रहा है।

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इस नाटक में मराठी और हिंदी रंगमंच के वरिष्ठ कलाकार शशि वरवंडकर ने न केवल अनिकेत की प्रमुख भूमिका निभाई, बल्कि निर्देशक के रूप में भी अपनी नई पारी की शुरुआत की है। अनिकेत के रूप में उन्होंने खोई हुई पहचान को पाने के संघर्ष को इतनी सजीवता से प्रस्तुत किया कि दर्शक भावनाओं से भर उठे।

उनके साथ मंच पर डॉ. अनुराधा दुबे, प्रकाश खंडेकर, दिलीप लांबे, रंजन मोडक, चेतन दांदवते, डॉ. प्रीता लाल, रविंद्र थेनगडी, समीर तल्ली, भारती पलसोडकर, पंकज साराफ, श्याम सुंदर खंगन और डॉ. अभया जोगलेकर ने भी दमदार अभिनय किया।

महाराष्ट्र मंडल, रायपुर के कुमुदिनी वरवंडकर मेमोरियल ऑडिटोरियम में हुआ हैं। इस मंचन के माध्यम से भारती पलसोडकर, समीर तल्ली और पंकज साराफ ने हिंदी रंगमंच में अपना पदार्पण किया है।

सेट डिज़ाइन का काम अजय पोटदार और प्रवीण क्षीरसागर के निर्देशन में किया गया, मेकअप की जिम्मेदारी दिनेश धनकर ने निभाई, कॉस्ट्यूम डिजाइन डॉ. अभया जोगलेकर ने किया, जबकि लाइटिंग लोकेश साहू और बैकस्टेज मैनेजमेंट अस्मिता कुसरे द्वारा संभाला गया।

दिलचस्प बात यह है कि शशि वरवंडकर ने अनिकेत की यही भूमिका लगभग 23 वर्ष पहले भी निभाई थी, और तब भी डॉ. अनुराधा दुबे ने उसी नाटक में एक अहम किरदार अदा किया था।

यह नाटक न केवल एक कलाकार की अभिनय क्षमता को उजागर करता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और आत्मपहचान के गूढ़ प्रश्नों पर भी समाज को सोचने पर मजबूर करता है।