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साडा में तरुण भ्रष्टाचार

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साडा में तरुण भ्रष्टाचार

प्रशासनिक अधिकारी भले ही लेखक हो, बल्कि प्रगतिशील भी हो तो भी भ्रष्टाचार की अमरवेल से नहीं बच सकता। ग्वालियर विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण ग्वालियर से(साडा) के एक पूर्व मुख्य प्रशासनिक अधिकारी तरुण भटनागर के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस ने भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज किया गया है ‌।

ग्वालियर विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण दर असल एक अभिशप्त संस्था है। नया ग्वालियर बसाने के लिए स्वर्गीय शीतला सहाय और स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की कल्पनाओं को साकार करने की बजाय इस संस्था ने अपने आप को लूट की मशीन बना लिया।इस प्राधिकरण का जो भी अध्यक्ष और सीईओ बना उसने नया ग्वालियर बसाने के नाम पर अपनी जेबें भरीं और चलता बना।

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ग्वालियर विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण में तरुण भटनागर कोई पहले सीईओ या राकेश जादौन कोई पहले अध्यक्ष नहीं है जो भ्रष्टाचार के आरोपी बने हों।इन दोनों से पहले के अधिकांश अध्यक्ष, सीईओ और दीगर अधिकारी इस लूटमार का हिस्सा रहे हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश आज तक किसी को भी न भ्रष्ट साबित किया जा सका और न कोई दंडित किया जा सका।

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बेशर्मी के साथ किया गया भ्रष्टाचार ही नये ग्वालियर की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बना। यहां जैसे -तैसे प्राधिकरण ने आधा अधूरा अधोसंरचना विकास कर जो संपत्ति बेची भी उसके मालिक अब पछता रहे हैं। प्राधिकरण ने बिना व्यावहारिक जरूरत के पूरे इलाके में पहले जमीन का अधिग्रहण किया , फिर धीरे धीरे उसका बंंदर बांट कर दिया।

बाईस साल पहले बने 30 हजार हेक्टेयर भूमि पर साडा में सड़कों के जाल और बिजली के खंभों के अलावा कुछ नहीं है। यहां कभी नया हवाई अड्डा बनाने की योजना बनाई गई तो कभी राज्य सरकार के दफ्तरों को लाने की बात हुई। कुछ ने जमीन सौदे भी किए लेकिन कोई गया नहीं।जाए भी तो कैसे? जो प्रशासन ग्वालियर शहर में नगर बस सेवा शुरू नहीं करा सका वो साडा के लिए परिवहन की व्यवस्था कैसे कर सकता है।

साडा की लूट सरकारी संरक्षण में शुरू हुई।जब कमिश्नर इस संस्था के अध्यक्ष रहे तब वे इसे कामधेनु की तरह दुहते रहे और जब राजनीतिक दलों के लोग अध्यक्ष बने तो उन्हें साडा लूटपाट के लिए लीज पर दे दिया गया। जबकि हर एक ने इतना काला पीला किया कि सबको जेल भेजा जा सकता है।

भ्रष्टाचार के मामले में तरूण भटनागर का नाम आने पर मुझे कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि मैं जानता हूं कि तरुण भटनागर ने जो किया उसके पीछे कोई न कोई राजनीतिक दबाव जरूर रहा होगा। तरूण ने तो बहती गंगा में हाथ धोने का पाप किया हो तो किया हो। भ्रष्टाचार के आरोपी साडा के पूर्व अध्यक्ष राकेश जादौन दूध से नहाते हैं या नहीं, किंतु वे आरोपी हैं। लोकायुक्त की ताकत नहीं जो वो जादौन का बाल बांका कर सके। उन्हें सत्ता का खुला संरक्षण है।आप उन्हें सरकारी संत कह सकते हैं।वे आजकल नर्मदा की सेवा कर रहे हैं।

मप्र सरकार को चाहिए कि वो ग्वालियर साडा को फौरन भंग कर दे और नये ग्वालियर के विकास की जिम्मेदारी किसी समर्पित, परीक्षित एजेंसी को सौंपे, अन्यथा ये लूटपाट निरंतर जारी रहेगी।साडा की नाकामी का ही परिणाम है कि ग्वालियर में विकास अराजक है। जमीनों की कीमत आसमान छू रहीं हैं,और ग्वालियर पहले की तरह आज भी एक गांव बना हुआ है, हालांकि किसी जमाने में ग्वालियर की हैसियत भोपाल से ज्यादा हुआ करती थी।