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57. In Memory of My Father- जानी वॉकर इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में मेरे पिता के साथ पढ़ते थे!

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मेरे मन/मेरी स्मृतियों में मेरे पिता

पिता को लेकर mediawala.in ने शुरू की हैं शृंखला-मेरे मन/मेरी स्मृतियों में मेरे पिता।इस श्रृंखला की 57  th किस्त में आज हम प्रस्तुत कर रहे है इंदौर की लेखिका नीति अग्निहोत्री को। नीति विगत कई वर्षों से लेखन से जुडी हुई है,समसामयिक विषयों पर लिखती हैं ,वे कविताएँ भी बहुत गंभीर विषयों पर लिखती रही हैं। उनके लेख ललित निबन्धों की शैली में भी हैं। उनके पिताजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे।और इंदौर के सार्वाधिक चर्चित प्रतिष्ठित क्रिश्चियन कॉलेज के छात्र रहे हैं सुप्रसिद्ध कलाकार जॉनी वॉकर उनके सहपाठी थे। अपने पिता से मिले स्वतंत्र वातावरण में संस्कारों के साथ साहित्य भी नीति को मिलता रहा है। वे उन्हें स्मरण कर रही है —–

57. In Memory of My Father–जानी वॉकर इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में मेरे पिता के साथ पढ़ते थे!

मेरे पिता हमेशा एक वाक्य लिखते थे -“God help those who help themselves”

नीति अग्निहोत्री

मेरे पिताजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। पिताजी ,यानि दुनिया की सबसे बड़ी नियामत जो अपने बच्चों के लिए ही जीते हैं और उन्हें योग्य ,होनहार व श्रेष्ठ मानव बना कर अपने जीवन की सार्थकता अनुभव करते हैं । पिताजी जिन्होंने ,हमें अनुकूल वातावरण देकर हमारी प्रतिभा को निखारा। साहित्य में रूचि इसीलिए पैदा हुई कि बचपन में उनके कारण ही हमें अच्छी पुस्तकें और पत्रिकाएं पढ़ने को मिलीं। चंदामामा ,पराग,धर्मयुग ,साप्ताहिक हिंदुस्तान और सारिका आदि पत्रिकाएं बचपन से पढ़ते आ रहें हैं । हम बड़ों की पत्रिकाएं भी पढ़ते थे और कभी कुछ समझ नहीं में आने पर पूछते भी थे। कुछ बड़े हुए तो किसी सामयिक विषय पर विचार-विमर्श भी करते थे। इन पत्रिकाओं ने हमारे व्यक्तित्व को निखारा व एक सुंदर आकार दिया ।
घर में बहुत स्वतंत्र माहौल था जहां बड़ों का सम्मान और अनुशासन भी था। पिताजी स्तरीय कवि सम्मेलन और मुशा मुशायरों में भी हमें ले जाते थे और बड़े -बड़े साहित्यकारों को बचपन से सुना है। रतलाम के काली माताजी के मंदिर के पास और देवास में माताजी की टेकरी के मंदिर के नीचे उद्यान में लगने वाले मीना बाजार में बड़े -बड़े कवि आते थे ,जिनमें नीरज जी ,बशीर बद्र जी,माया गोविन्द जी,सरोज कुमार जी ,दिनकर सोनवलकर जी ,राहत इंदौरी जी आदि बड़े कवियों को वहीं सुना था। बहुत आनंद आता था और सुबह चार बजे तक डटे रहते थे हम।
मुझे गर्व है कि मुझे सह- शिक्षा में पढ़ने को मिला ,क्योंकि जहां -जहां पिताजी के स्थानांतर हुए वहां के महाविद्यालयों में विज्ञान विषय के लिए लड़कियों के लिए अलग से व्यवस्था नहीं थी । उस समय महाविद्यालयों का वातावरण भी बहुत अच्छा था ,परन्तु रूढ़िवादी परिवार लड़कियों को कम ही सहशिक्षा में पढ़ने भेजते थे।
ईमानदारी और नेकी की शिक्षा हमें पिताजी से मिली। वे ऊपर की कमाई, यानि रिश्वत लेने से परहेज करते थे। एक बार की घटना है कि एक सज्जन उनकी अनुपस्थिति में फल ,मिठाई और लिफाफा रख गए। वो सज्जन मकान मालिक के रिश्तेदार थे इसलिए माताजी ने कुछ नहीं कहा। जब पिताजी घर आए तो वह सब मकान मालिक के द्वारा वापस करवाया और डांटा कि क्यों रख लिया। उनके आदर्शों ने हमें सदा सत्य की राह दिखाई व हमें अच्छे संस्कारों में ढाला।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे पिताजी फिर चाहे वह खेल हो ,गायकी हो या अदाकारी हो। जाॉनी वॉकर इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में उनके साथ पढ़ते थे और गाने के लिए मुम्बई ले जाना चाहते थे ,परन्तु दादा जी ने मना कर दिया ,क्योंकि उन दिनों फिल्म लाईन अच्छी नहीं मानी जाती थी। उन्हें शास्त्रीय संगीत का अच्छा ज्ञान था।50 से 70 के दशक तक हिंदी सिनेमा में तब की फिल्मों में जॉनी वॉकर एक ऐसे अभिनेता के तौर पर नजरों के सामने तैरने लगते हैं, जिन्होंने अपनी अदाकारी से न केवल लोगों को गुदगुदाया, बल्कि उनके चहरे पर मुस्कान भी बिखेर दी। जॉनी वॉकर ने जीवन में कभी शराब नहीं पी, लेकिन शराबी के किरदार वह इस तरह से निभाते मानों कितनी पी ली हो। मेरे पिताजी को संगीत के लिए अवसर मिल रहा था पर वे नहीं जा पाए। पिताजी ने बताया था कि जॉनी वॉकर का वास्तविक नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन था। मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में एक मिडिल क्लास मुस्लिम फैमिली में जन्में बदरुद्दीन जमालुद्दीन मुंबई जाकर जॉनी वॉकर हो गए थे।  लीजेंड्री कॉमेडियन जॉनी वॉकर का जन्म 11 नवंबर 1920 को इंदौर में हुआ था.

पिताजी ने  एल.एल .बी  किया था वे  उस जमाने में और बड़े जज बन सकते थे पर भाग्य को कुछ और मंजूर था  ,परन्तु एक रिश्तेदार ने उनकी फाइल गायब करवा दी ,क्योंकि वे पी.एससी में जनरल सेकेट्री थे।पिताजी
टेबल टेनिस ,लॉन टेनिस ,क्रिकेट ,फुटबाल ,बैडमिंटन आदि सभी खेल खेल लेते थे। चालीस -बयालीस की उम्र में झाबुआ में युवा बच्चों को हरा कर कई कप जीते थे प्रतियोगिता में।
हमारी किसी सफलता पर पिताजी बहुत प्रसन्न होते और हमारा सदा उत्साहवर्धन करते। हमारी जितनी भी उड़ान है उनके कारण ही है। पिताजी का व्यक्तित्व बताने के लिए शब्द भी बौने हैं।वे हमेशा एक वाक्य लिखते थे -“गॉड हेल्प दोज हू हेल्प देमसेल्वज”
चंद पंक्तिया प्रस्तुत हैं –
पिताजी हैं तो जीवन उजियारा है
हमारा जीवन आलोकित हुआ है
उनसे मिली सद्गुणों की दौलत ,
हमें ज्ञान का प्रकाश दिखाया है ।
पिताजी को सादर नमन।

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नीति अग्निहोत्री
जन्म तिथि -1.7. 1954
3.शैक्षणिक योग्यता-एम.एस-सी.,बी .एड
4.कार्यक्षेत्र-गृहिणी। कविता ,उपन्यास सहित अब तक चार पुस्तकें प्रकाशित। बड़ी संख्या में लेख प्रकाशित।
5.निवास -इंदौर (म.प्र.) 57,सॉंई विहार
6ईमेल-neetiagnihotri7292
@gmal.com
मो.न-918839775035
57,सॉंई विहार ,इंदौर (म.प्र.
मो. न.-918830775035

55. In Memory of My Father-Pandit Deenanath Vyas: पिता के विलक्षण व्यक्तित्व के कुछ रंग -स्वाति तिवारी