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अरे कोई तो रोको इन्हें…

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दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीति में समुद्र मंथन का अजीबोगरीब दौर चल रहा है। इसका विषपान कौन करेगा..? बहुत सोचने पर घबराहट होती है। सबसे ज्वलन्त मुद्दा है राहुल गांधी की सांसदी का जाना। सूरत की अदालत ने मानहानि के मामले में उन्हें दो साल की सजा सुनाई और कानून के मुताबिक उनकी लोकसभा की सदस्यता समाप्त कर दी गई। कुछ नेतागण इसकी तुलना उनकी दादी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से करने लगे। आपातकाल के बाद 1977 में यूपी के रायबरेली से लोकसभा का चुनाव जनता पार्टी के राजनारायण से हार गईं। बाद में इंदिरा जी चिकमंगलूर से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंची। जनता पार्टी की सरकार में विशेषाधिकार भंग के मामले में उनकी समाप्त कर दी गई थी। बाद में जपा सरकार भी गिर गई और इंदिरा जी 1980 में पुनः चुनाव जीती और प्रधानमंत्री बनी। कांग्रेस अब राहुल गांधी की लोकसभा से सदस्यता समाप्ति को इंदिरा जी की सदस्यता जाने से जोड़कर देख रही है। उसका मानना है कि भारत जोड़ो यात्रा में आई भीड़ ने राहुल गांधी को अपनी दादी के जितने बड़े कद का नेता बना दिया है और अब 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में पार्टी को जीत हासिल कराकर प्रधानमंत्री बन जाएंगे। सब कुछ उनके हिसाब से हो रहा है। पहली बात तो यह कि इंदिरा जी अलग नेता थीं। किसी और नेता में उनकी छवि खोजना राजनीतिक बचपना ही माना जाएगा। वो जमाना अलग था। वे 1971 युद्ध की हीरो थी। लोग उनमे दुर्गा मां की छवि देखते थे। देश मे उनका बहुत आदर था। जनता उनसे बहुत प्यार करती थी। यह सब उन्हें एक दिन में हासिल नही हुआ था। लेकिन कांग्रेस में राहुल बाबा और प्रियंका जी को इंदिरा जी के जैसा करिश्माई नेता बताकर उनके साथ अन्याय कर रहे हैं।

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल कह रहे हैं कि दो साल की सजा का फैसला आते ही राहुल गांधी की लोकसभा रिक्त हो जाती है। उनकी सदस्यता रद्द कर लोकसभा सचिवालय ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किया है। कांग्रेस की टीम राहुल का मुकाबला पीएम नरेंद्र मोदी की टीम से है। जिसने कांग्रेस को देश के केवल दो राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ तक सीमित कर दिया है। हाल ही में पूर्वोत्तर के तीन प्रदेशों के साथ त्रिपुरा में वामपंथी और कांग्रेस के गठबंधन को भी मात दी है। मतदाता लगातार कांग्रेस का साथ छोड़ते दिख रहे हैं। यह हकीकत जितने जल्दी स्वीकार कर ली जाए उतना भविष्य में सुधार के लिए शुभ माना जाएगा। लेकिन इससे अलग चुनाव आयोग और अदालतों पर संदेह और आरोपों के जरिए लोकतंत्र को मजबूत करने के काम तो नही हो रहे हैं। कांग्रेस के थिंक टैंक ने अदालती लड़ाई को कानून के बजाए सड़क पर लाकर अपनी अपरिपक्वता की तरफ इशारा किया है। इसकी असफलता टीम में हताशा के साथ चिढ़न और कुढ़न पैदा करेगी। कांग्रेस में एक समय जैसे संजय गांधी की टीम हावी थी और इस समय टीम राहुल का जलजला है। तब टीम संजय ने इंदिरा जी की सत्ता में वापसी कराई थी। लेकिन तब और अब के हालत में बहुत फर्क है। गंगा जी मे बहुत पानी बह गया है। मोदी के राज में मतों का धुर्वीकरण हो चुका है। पहले वोट बंट जाया करते थे अब ऐसा नही है। इस सच्चाई को ध्यान में रखे बिना सफलता कठिन है। भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों को रणनीति बदले बिना कामयाबी कठिन लगती है। मोदी और भाजपा की आलोचना उन्हें मजबूत ही करेगी। अब तक के नतीजे तो यही बताते हैं।

सेना से लेकर संसद,अदालत, चुनाव आयोग, पुलिस प्रशासन, मीडिया किसी पर ऐतबार नही। बड़ी निर्लज्जता से सबको दलगत आधार पर विभाजित करने का पाप कर रहे हैं। दुहाई लोकतांत्रिक संस्थाओं की और दुहाई देकर उसी का चौतरफा चीरहरण भी उनका ही। लगता है सबके सब आत्मघात पर उतारू हैं। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, चुनाव आयोग,संसद आरोपों की अराजकता में डूबे लगते हैं। हर कोई वही सुनना चाहता है जो उसके माफिक पड़े। गैरजिम्मेदारी की इन्तेहा हो रही है।

जनताजनार्दन के फैसले और संवैधानिक संस्थाओं पर संदेह और सवालों से आगे बढ़कर उनकी मर्यादाओं पर अमर्यादित टीका टिप्पणियों का सिलसिला थमने का नाम नही ले रहा है। जिसके भी हक में फैसला नही आ रहा है वही विरोध के पागलपन की हद से गुजर जाना चाहता है। अदालत से इंसाफ तो चाहते हैं बशर्ते फैसला उसके हक में हो बस…वरना
आखिर जाना कहां चाहते हैं..? एक एक कर सभी संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा खत्म कर हमें हासिल क्या होने वाला है सिवाए अराजकता के।

क्या एंग्री यंगमैन बनना चाहते हैं

सियासी हालात ऐसे हैं कि समझ नहीं आता किस पर विश्वास किया जाए। कौन लोकतंत्र का चीरहरण कर रहा है और किसका कौन मान मर्दन कर रहा है..? हर कोई हर तरफ अपने आप को भला मानुष साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। सभी दलों के वरिष्ठों को अगर उनकी बातें सुनी समझी जा रही हों तो अवश्य पहल करनी चाहिए। क्योंकि आक्रामक बनने के चक्कर में लोकतंत्र का बड़ा नुकसान न हो जाए। कोई तो इस प्रवृत्ति को रोके। क्योंकि न तो भाजपा और मोदी देश हैं और न गांधी परिवार कांग्रेस है…कड़वा लग सकता है लेकिन सच तो यही है… राहुल गांधी का मुद्दा अदालती है। इस पर रेल रोकने, सड़कें जाम करने से तात्कालिक सुर्खियां तो मिल सकती है लेकिन नेतृत्व संजीदा है, यह तमगा हासिल करने का एक मौका राहुल गांधी के हाथ से निकल जाएगा। राहुल की संसद से सदस्यता समाप्ति पर विधि सम्मत बहस, सेमिनार, आमरण अनशन, मौन जुलूस इत्यादि से भारत का जनमानस गम्भीरता से पूरे प्रकरण को सुनता- समझता फिर कोई निर्णय लेता जो चुनाव के दौरान वोट में बदलता। किसी भी व्यक्ति, नेता और दलों के बारे में देश की राय एक दिन में नही बनती। उसके लिए अच्छे – बुरे वक्त, हार -जीत, मान -अपमान में संतुलित व्यवहार, सधी हुई टीका टिप्पणी और उस हिसाब से भाव भंगिमा बहुत मायने रखती है।

बिन मांगी सलाह…

राहुल बाबा और उनकी युवा टीम जो उन्हें एंग्री यंगमैन बनाने पर तुली है वह भारतीय राजनीति में सफल रहे राज नेताओं के जीवन चरित्र से काफी कुछ सीख सकती है। बहुत दूर न जाएं तो सीखने के लिए अपने और कांग्रेस के पुरखों में शामिल पंडित जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और अपनी माता सोनिया गांधी भी एक बड़ा नाम हैं। सोनिया जी ने राजीव जी को खोने के बाद की कठिन परिस्थितियों में विरासत को संभाला, कांग्रेस और यूपीए का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया वह उल्लेखनीय है। पिछले लगभग दस वर्षों में कांग्रेस की जो भी दशा- दुर्दशा हुई है उसकी जिम्मेदारी राहुल और उनकी टीम को अपने सिर और कंधों पर लेकर काम करना पड़ेगा। पार्टी के बुजुर्ग नेताओं की इज्जतफजाई करनी पड़ेगी। तभी राज करने के रण जीतने के हालात बनेंगे। क्योंकि मुकाबला भाजपा, संघ परिवार और टीम नरेंद्र मोदी से है। खाली यह कहने से काम नही चलेगा कि मोदी नाम के सब लोग चोर क्यों हैं? इसका नतीजा भी देख लिया। इससे उपजी परिस्थितियों में कांग्रेस के संजीदा लीडर राहुल बाबा की हुल्लड़ ब्रिगेड के साथ मैदान में नही दिख रहे हैं। एक सफल नेता की इमेज तो ऐसे ही कठिन हालात में लिए गए फैसलों से बनती है। जैसे 2003 में अकेली सोनिया गांधी ने अटल-आडवाणी की भाजपा के शाइनिग इंडिया नारे के बीच मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनाई और उसे दस चलाया भी। लेकिन लगता है राहुल बाबा इन दिनों अपने चाचा संजय गांधी से ज्यादा प्रभावित लग रहे हैं। जैसे संजय गांधी ने आपातकाल के चलते 1977 में बुरी तरह हारी कांग्रेस को 1980 में जनता पार्टी को हराकर सत्तारूढ़ कराने में अहम भूमिका अदा की थी।

नड्डा उवाच- कांग्रेस में अहंकार बढ़ा…, कार्यकर्ताओं को जोड़ें

भोपाल में प्रदेश भाजपा कार्यालय के भूमि पूजन कार्यक्रम में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जय प्रकाश नड्डा ने कहा कॉन्ग्रेस अहंकारी नेताओं की पार्टी बनेगी करेक्शन और डिवीजन करने की राजनीति करती है। लेकिन उनकी इस बात पर भाजपा के भीतर जो अहंकारी और भ्रष्टाचार करने वाले नेता हैं उन पर भी कार्यकर्ता बातचीत करते देखे गए। इस दरमियान भाजपा अध्यक्ष ने कहा प्रदेश भाजपा भवन के निर्माण में कार्यकर्ताओं को भी जोड़ा जाए और इसके लिए उन्होंने धनराशि संग्रह करने की बात भी कही। उनकी मौजूदगी में भाजपा ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मोना सुस्तानी और भाजपा से निष्कासित प्रीतम लोधी को पार्टी की सदस्यता प्रदान की। समझा जा रहा है कि सुश्री मोना को सत्ता या संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। ऐसा होने पर भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं में चुनावी साल में मायूसी बढ़ सकती है।