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त्वरित टिप्पणी: मतदाताओं के मौन से निकला बीजेपी के प्रति भरोसा

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त्वरित टिप्पणी:
मतदाताओं के मौन से निकला बीजेपी के प्रति भरोसा

– हेमंत पाल

चुनाव के नतीजे सामने आ गए और इसके साथ ही मतदाताओं का मौन भी मुखर होकर सामने आया कि उनके मन में क्या है! सारे अनुमान और दावे सब फीके पड़ गए। जिस तरह की सफलता और सीटों पर जीत का आंकड़ा सामने आया, वह बीजेपी के अनुमानों से भी बहुत आगे कहा जा रहा है। पहले कहा जा रहा था कि अंदर की रिपोर्ट के अनुसार इस बार बीजेपी चुनाव हार रही है। लेकिन, यह बात गलत साबित हुई और जो नतीजा सामने आया उसका इशारा यह है कि अभी बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस बहुत कमजोर है। इतनी कमजोर कि दोनों के बीच में करीब 100 सीटों का अंतर है। ऐसे माहौल में ये बात सही साबित हुई कि ‘मोदी के मन में मध्यप्रदेश है और मध्यप्रदेश के मन में मोदी!’

वास्तव में तो इस विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी की चुनाव रणनीति की सफलता का उत्कृष्ट नमूना है, जिसमें कांग्रेस हर तरफ कमजोर दिखाई दी। बीजेपी के संगठन, उसकी चुनावी समितियों और उसके नेताओं की मेहनत ने पार्टी को चुनाव जिताया, वहीं कांग्रेस संगठन पूरे चुनाव अभियान में बहुत कमजोर दिखाई दिया। पार्टी का पूरा नेतृत्व कमलनाथ और दिग्विजय सिंह तक से सीमित रहा और दोनों के बीच खींचतान भी किसी से छुपी नहीं रही। इसके विपरीत भाजपा ने प्रदेश की चुनाव अभियान समिति से लगाकर विधानसभा क्षेत्र की चुनाव समितियों तक में अपनी पार्टी को संगठनात्मक रूप से मजबूत बनाकर रखा। इसके अलावा बीजेपी ने चुनाव जीतने की किसी कोशिश को हाथ से नहीं जाने दिया। सात सांसदों और एक पार्टी राष्ट्रीय महासचिव को चुनाव मैदान में उतारना, इसी रणनीति का हिस्सा था। जबकि, कांग्रेस में उम्मीदवारों का चयन हमेशा ही विवाद बनता रहा। यहां तक कि घोषणा के बाद आधा दर्जन उम्मीदवारों को बदला गया। इसके बावजूद पार्टी अपनी पकड़ बनाकर नहीं रख सकी।

हमेशा कहा जाता है, कि कांग्रेस कभी पार्टी की तरह चुनाव नहीं लड़ती, उसके उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं वह तो सिर्फ टिकट की घोषणा करती है। जबकि, बीजेपी संगठन की मौजूदगी हर सीट पर दिखाई देती है। वही इस बार भी हुआ, जब पार्टी ने कांग्रेस को कोई मौका नहीं दिया कि वह किसी भी सीट पर कमजोर पड़े। यहां तक कि बीजेपी ने कई हारी हुई सीटें भी जीती और बागियों को हावी नहीं होने दिया। जबकि, कांग्रेस के बागी पार्टी पर हावी हो गए और इतने ज्यादा प्रभावी हो गए कि कई सीटों पर उन्होंने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को ही हरा दिया।

इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि इस पार्टी की इस जीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने प्रदेश में कई जनसभाएं ली और रोड शो किए। आदिवासी इलाके झाबुआ, अलीराजपुर के अलावा मालवा-निमाड़ में जहां भी कांग्रेस को जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, वहां नरेंद्र मोदी की जनसभाओं ने मतदाताओं को प्रभावित करने में कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेस के बारे में कहा जाता है कि वो ​हर राज्य में अलग रणनीति के साथ आगे बढ़ती है। किसी राज्य में मुस्लिम वोटों को लुभाने की कोशिश करती है, तो किसी राज्य में ‘सनातन ‘ आधार पर वोट पाने की रणनीति अपनाती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कमलनाथ हनुमान जी के भक्त हैं। लेकिन, वे सिर्फ चुनाव के दौरान ही अपनी भक्ति दिखाते हैं। वहीं दिग्विजय सिंह अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कारण कई बार आलोचनाओं का शिकार हो चुके थे।

मध्य प्रदेश में बीजेपी 2003 से सत्ता में है। 2018 से कांग्रेस शासनकाल के 15 महीनों को छोड़ दिया जाए, तो 2003 से ही कांग्रेस सत्ता से बाहर है। कमलनाथ का नेतृत्व नए मतदाताओं को आकर्षित नहीं करता। कमलनाथ ने इस बार भी यूथ लीडर को आगे नहीं आने दिया। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जोड़ी ने युवाओं को चुनाव अभियान से जोड़ने के बजाए परंपरावादी रणनीति से ही चुनाव जीतने की योजना बनाई। कांग्रेस के दोनों नेता वृद्ध हो गए, इसलिए वे युवाओं की नब्ज को नहीं पकड़ पाए। इसका खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ा और बीजेपी को सीधा लाभ मिला। जबकि, इस बार नए मतदाताओं की संख्या ज्यादा थी, पर कांग्रेस उन्हें अपने पक्ष में नहीं कर सकी।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चुनाव से कुछ महीने पहले ‘लाडली बहना योजना’ की घोषणा की थी। कहा जा रहा है कि इसी एक योजना ने मध्य प्रदेश में बीजेपी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस बात से इंकार नहीं कि बीजेपी को ये अंदाजा हो गया था कि उसके लिए इस बार का चुनाव आसान नहीं है। ऐसे माहौल में सरकार ने गरीब महिलाओं को हर महीने हजार रूपए देने की घोषणा की और इसे आगे बढाकर तीन हजार तक करने का विश्वास दिलाया। इसका इतना असर हुआ कि महिलाओं ने मुख्यमंत्री को हाथों-हाथ लिया। इसी का असर हुआ कि ‘लाडली बहना योजना’ ने चुनाव में पार्टी को बड़ी जीत दिला दी।

शिवराज सिंह चौहान ने महिलाओं की एक सभा में इस योजना की घोषणा की थी। योजना के तहत प्रदेश की 1.32 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को पहले 1000 रुपए फिर 1250 रुपए महीने देना शुरू किया। यही नहीं, लाड़ली बहनों को घर देने तक कि घोषणा की। पार्टी की ये रणनीति इतनी सफल रही, कि कांग्रेस के पास इसका कोई जवाब नहीं था। क्योंकि, महिलाओं को फायदा होने का मतलब है कि पूरे परिवार का फायदा। इस योजना ने एक परिवार के औसतन 5 वोट पर असर डाला जो बीजेपी के खाते में गए। जबकि, पहले कहा जा रहा था कि इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी जीत के प्रति आश्वस्थ नहीं थी। लेकिन, बीजेपी को महिलाओं की इस योजना ने जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब, जबकि स्थिति स्पष्ट हो चुकी है और मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार बनना तय हो गया, कांग्रेस को मध्यप्रदेश में अपने नेतृत्व पर गंभीरता से विचार करना होगा। किसी नए युवा को नेतृत्व सौंपना होगा ताकि पार्टी को कपड़ा फाड़ राजनीति से निजात मिले।