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आज सोमनाथ, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल को याद करने का दिन है…

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आज सोमनाथ, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल को याद करने का दिन है…

11 मई 1951 का दिन भारत के इतिहास में बहुत खास है। बारह ज्योतिर्लिंगों में पहले सौराष्ट्र स्थित सोमनाथ के वर्तमान स्वरूप की स्थापना आज की तारीख को ही 1951 में हुई थी। और इसमें अगर किसी का योगदान था, तो वह पहला नाम सरदार वल्लभ भाई पटेल का था। और वर्तमान शिवलिंग की स्थापना की थी देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने। और इसमें शामिल न होने की वजह से अगर किसी की आलोचना होती है तो वह देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की होती है। सोमनाथ का मंदिर हिंदू धर्म और भारत की वह तस्वीर है, जिसके इर्द-गिर्द देश की राजनीति वर्तमान में केंद्रित है।

सोमनाथ का मन्दिर हिन्दू धर्म के उत्थान-पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है। अत्यन्त वैभवशाली होने के कारण इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा तथा पुनर्निर्मित किया गया। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बन्दरगाह में स्थित इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में स्पष्ट है। मुस्लिम आक्रांताओं ने इसे बार-बार तोड़ा और हिंदू राजाओं ने बार-बार इसका पुनर्निर्माण किया। आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद , महमूद ग़ज़नवी, दिल्ली सल्तनत और मुगल बादशाह औरंगजेब ने मंदिर को नष्ट किया। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और पहली दिसम्बर 1955 को भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया। सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई 1950 को मन्दिर की आधारशिला रखी तथा 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मन्दिर में ज्योतिर्लिग स्थापित किया। नवीन सोमनाथ मन्दिर 1962 में पूर्ण निर्मित हो गया। 1970 में जामनगर की राजमाता ने अपने पति की स्मृति में उनके नाम से ‘दिग्विजय द्वार’ बनवाया। इस द्वार के पास राजमार्ग है और पूर्व गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा है।

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जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ मन्दिर के पुनर्निर्माण के प्रस्ताव का ‘हिन्दू पुनरुत्थानवाद’ कहकर विरोध भी किया। उस समय नेहरू से हुई बहस को कन्हैयालाल मुंशी ने अपनी पुस्तक ‘पिलग्रिमेज टू फ़्रीडम’ में दर्ज किया है। वे लिखते हैं-

… कैबिनेट की बैठक के अन्त में जवाहरलाल ने मुझे बुलाकर कहा—मुझे सोमनाथ के पुनरुद्धार के लिए किया जा रहा आपका प्रयास पसन्द नहीं आ रहा। यह हिन्दू पुनरुत्थानवाद है। ‘मैंने जवाब दिया कि मैं घर जाकर, जो कुछ भी घटित हुआ है उसके बारे में आपको जानकारी दूँगा …

के.एम. मुंशी ने आगे लिखा है-

नवम्बर 1947 के मध्य में सरदार प्रभास पाटन के दौरे पर थे जहाँ उन्होंने मन्दिर का दर्शन किया। एक सार्वजनिक सभा में सरदार ने घोषणा की: ‘नए साल के इस शुभ अवसर पर हमने फैसला किया है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण करना चाहिए। सौराष्ट्र के लोगों को अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देना होगा। यह एक पवित्र कार्य है जिसमें सभी को भाग लेना चाहिए।’ …कुछ लोगों ने प्राचीन मंदिर के भग्नावशेषों को प्राचीन स्मारक के रूप में संजोकर रखने का सुझाव दिया जिन्हें मृत पत्थर जीवन्त स्वरूप की तुलना में अधिक प्राणवान लगते थे। लेकिन मेरा स्पष्ट मानना था कि सोमनाथ का मन्दिर कोई प्राचीन स्मारक नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय के हृदय में स्थित पूजा स्थल था जिसका पुनर्निर्माण करने के लिए अखिल राष्ट्र प्रतिबद्ध था।

तो सोमनाथ मंदिर अगर हर सनातनधर्मी की आत्मा में बसता है। तो उसे वर्तमान स्वरूप में हर सनातनधर्मी की आत्मा में बसाने का श्रेय सरदार वल्लभ भाई पटेल को जाता है और इसके साथ अगर और कोई नाम जुड़ा है तो देश के पहले प्रथम नागरिक डॉ. राजेंद्र प्रसाद का। तो आज सोमनाथ, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सरदार वल्लभ भाई पटेल को याद करने का दिन है…।