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Ex IPS NK Tripathi: एक अद्वितीय व्यक्तित्व की प्लेटिनम जुबली पारी

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Ex IPS NK Tripathi: एक अद्वितीय व्यक्तित्व की प्लेटिनम जुबली पारी

 

आनंद कुमार शर्मा की विशेष प्रस्तुति

Anand Sharma, who was Ujjain Commissioner, got the ...

एन.के. त्रिपाठी जी से मेरी पहली मुलाक़ात सन 2001 में ग्वालियर में गोपाचल के रखरखाव और अतिक्रमण के संबंध में बुलाई एक बैठक में हुई थी , जहाँ वे आई.जी. पुलिस हुआ करते थे । मैं ग्वालियर विकास प्राधिकरण का सी.ई.ओ. हुआ करता था और श्री बिमल जुल्का ग्वालियर संभाग के आयुक्त होने के साथ साथ प्राधिकरण के अध्यक्ष भी थे । ये मुलाकात अत्यंत संक्षिप्त और याद न रखने जैसी थी , कम से कम त्रिपाठी जी के हिस्से की । कुछ महीनों बाद वे स्थानांतरित हो गए और सन 2004 में मेरी पदस्थापना परिवहन विभाग में उपायुक्त प्रशासन के पद पर हो गई । पूरा बरस भी ना बीता होगा कि सूबे का साम्राज्य बदला और उमा जी की जगह प्रदेश की कमान बाबूलाल गौर जी के हाथों में आ गई , तभी परिवहन विभाग में भी रमन कक्कड़ के स्थान पर श्री एन.के.त्रिपाठी की पदस्थापना परिवहन आयुक्त के पद पर हुई । त्रिपाठी जी का नाम थोड़ा चौंकाने वाला था , क्योंकि वे राजनीतिक कनेक्शन के बजाए मुख्य सचिव श्री विजय सिंह की पसंद पर पदस्थ किए गए थे । विभाग में पहले प्रतिक्रिया ये थी कि “ये तो बड़े मनमानी करने वाले कड़क तबीयत के अफसर हैं , क्या पता विभाग चला भी पायें या नहीं”।

प्रशासन के उपायुक्त होने के कारण जॉइनिंग और रिलीविंग की औपचारिकता मेरे पास थी , तो समय पर मैं फाइल लेकर आयुक्त के चेम्बर में पहुंच गया । कार्यभार ग्रहण की औपचारिकता पूरी होने के दौरान मुझे बातचीत से पता लग गया कि कक्कड़ साहब और त्रिपाठी जी पुराने परिचित थे , पर एक बात मुझे खली कि चार्ज हैंडओवर करने के बाद भी कक्कड़ साहब कमिश्नर की कुर्सी पर ही बैठे रहे , जबकि अमूमन यह प्रक्रिया कुर्सी के आदानप्रदान के साथ भी सम्पादित होती है । मैंने देखा कि त्रिपाठी जी के चेहरे पर इस बाबत कोई प्रतिक्रिया नहीं थी , और पहली बार मुझे लगा कि ये शख़्स मामूली औपचारिक मामलों में प्रभावित होने वाला नहीं है ।

जल्द ही त्रिपाठी साहब के उन गुणों से मैं परिचित हुआ जो दुर्लभ थे । त्रिपाठी जी ने कहा कि वे एक ऐसी बैठक करना चाहते हैं जिसमें परिवहन विभाग के सभी लिपिक उपस्थित हों । मुझे लगा प्रदेश के विभाग के मुखिया स्तर के अधिकारी को इतने निम्न कर्मचारियों से संवाद की क्या जरूरत हो सकती है , पर जब हमने बैठक प्रारंभ कीं, तो कौन कैसे काम करता है और समयबद्धता के लिए क्या किया जा सकता है इसके लिए उनके बड़े बेजोड़ फार्मूले थे ।

मैं झूठ ना कहूँगा पर पुलिस के अधिकारी से प्रशासन के इतने बारीक पहलुओं पर पहल मेरी सोच से बाहर थी । जल्द ही हम उन कर्मियों की विभागीय समस्याओं और उनके सुझावों पर बात करने लगे इन सब के इतने सकारात्मक परिणाम हुए कि क्या कहना , हर एक को लगता वो विभाग के लिय कुछ व्यक्तिगत योगदान कर रहा है । स्थानांतरण , पदोन्नतियाँ , क्रमोन्नतियाँ सारी प्रक्रियाएँ समयबद्धता से होने लगीं ।

शासन ने उसी दौरान निर्णय लिया कि परिवहन निगम बंद कर दिया जाए । इसके बड़े वृहद परिमाणिक प्रभाव थे । एक ओर पड़ोसी राज्यों में परिवहन सुविधाओं का बदस्तूर जारी रखना , उनसे आपसी करारों का पुनर्स्थापन कराना तो दूसरी ओर मान. उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में प्रायवेट बसों के संचालन को निगम के पुराने कर्मचारी संगठनों की चुनौतियों से बचाना दोहरी धार पर चलने की तरह था । लेकिन सरकार को कभी भी परिवहन विभाग की ओर से इस विषय में हार नहीं झेलनी पड़ी ।

परिवहन विभाग तब आई टी और जन सुविधा के विस्तार की नई परिभाषा भी गढ़ रहा था । ऑनलाइन ड्राइविंग लाइसेंस , ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन , ऑनलाइन परमिट आदि के सफल संचालन को कार्यान्वित करना एक बड़ा चुनौती पूर्ण कदम था । मैं आज सोचता हूँ तो पाता हूँ कि विभाग में पनप रहे आंतरिक असंतोष को किस धैर्य से उस समय त्रिपाठी जी ने सँभाला था , कोई और होता तो शायद ऐसा न हो पाता ।

विभाग के लोगों के असन्तोष को सकारात्मकता में बदलने के लिए त्रिपाठी जी ने विभाग में संवर्गीय सुधार और संवर्धन की प्रक्रिया शुरू की । बरसों से पड़े पदोन्नतियों के बैकलॉग को भरना तो अकेला एक ही कदम था , पर वे उससे आगे गए “विभागीय ढांचे का पुनर्निर्माण और पदोन्नति के लिए नए पदों का सृजन” । आज जो विभाग में उप आयुक्त संयुक्त आयुक्त आदि के पद हैं , नई भर्तियों में नई प्रतिभाओं की आवक है उसकी बुनियाद एन.के.त्रिपाठी जी के कार्यकाल में ही रखी गई थी ।

फ़ोटो के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.

त्रिपाठी साहब के बारे में कहने के लिए मेरे पास इतना है , कि शायद एक पुस्तक ही लिख जाए , पर आज समय है उनके पचहत्तरवें जन्मदिन का तो एक छोटी सी याद से इस विषय को समाप्त करता हूँ जिससे आप सब जान पाएंगे की वे कितने सहज और दयालु थे । विभाग में अनुकम्पा नियुक्तियों के लिए त्रिपाठी जी के निर्देश में मुहिम चल रही थी । ऐसे आश्रित जिनके परिवार के मुखिया असमय काल कवलित हो गए थे उन्हें यथायोग्य सरकारी नौकरी विभाग में मिल सके इसकी वे प्रति माह समीक्षा करते थे ।

जाहिर है इतनी तेजी से काम हो रहा था सो सारे पद लगभग भर ही गए थे । अब क्या करें इस विषय पर माथापच्ची करते हुए एक दिन वे बोले “ क्या परिवहन आरक्षक के पद पर अनुकम्पा नियुक्ति दी जा सकती है “? मैंने परीक्षण किया , नियमों में कोई बाधा नहीं थी बस आवश्यक शैक्षिक और शारीरिक योग्यता के साथ विभागीय परीक्षा पास करना जरूरी था । हमने नौकरी से शेष रह गए आश्रित आवेदकों को आरक्षक के पद पर नियुक्ति के लिए स्क्रूटनी प्रारंभ कर दी । एक दिन मैं ऑफिस में बैठा कोई काम कर रहा था कि मुख्यमंत्री जी के कार्यालय से उनके उपसचिव श्री अजातशत्रु जी का फ़ोन आया और उन्होंने कहा “ आनंद एक नाम नोट करो , माननीय जानना चाहते हैं कि इस आवेदक को परिवहन विभाग में आरक्षक के पद पर अनुकंपा नियुक्ति दी जा सकती है या नहीं ? मेरे सामने मेज पर ही हाल ही में जारी नई नियुक्तियों के आदेश पड़े थे , मुझे नाम कुछ सुना हुआ लगा तो मैंने कहा सर एक मिनट रुकें “। मैंने लिस्ट चेक की तो उस बंदे को नियुक्ति आदेश जारी किया जा चुका था । मैंने अजातशत्रु साहब से कहा सर बिलकुल किया जा सकता है , और इसको तो नियुक्ति दी भी जा चुकी है । अजातशत्रु साहब बोले क्या कह रहे हो ? उनके स्वरों में मुझे अविश्वास सा लगा , शायद वे सोच रहे थे कि जिस काम के लिए लोग मुख्यमंत्री जी के पास गुहार लगा रहे हैं वो कैसे ये लोग सहज भाव से दे रहे हैं । अजातशत्रु जी बोले “ परिवहन विभाग में परिवहन आरक्षक के पद पर बिना सिफारिश तुम लोग इतनी सहजता से अनुकंपा पर नियुक्ति दे रहे हो , कमाल है , बहरहाल बढ़िया काम कर रहे हो , मैं मुख्यमंत्री जी को इस बाबत बता दूँगा । सो ऐसे हैं त्रिपाठी जी , जिनके लिए इस बात पर मानस की एक चौपाई स्मरण में आ रही है “ सोई सम्पदा विभीषन्ही सकुची दिए रघुनाथ” ।

फ़ोटो के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.
ईश्वर उन्हें शतायु करें और ऐसे ही सदैव स्वस्थ व प्रसन्न रखें ।
सामने मेज पर ही हाल ही में जारी नई नियुक्तियों के आदेश पड़े थे , मुझे नाम कुछ सुना हुआ लगा तो मैंने कहा सर एक मिनट रुकें “। मैंने लिस्ट चेक की तो उस बंदे को नियुक्ति आदेश जारी किया जा चुका था । मैंने अजातशत्रु साहब से कहा सर बिलकुल किया जा सकता है , और इसको तो नियुक्ति दी भी जा चुकी है । अजातशत्रु साहब बोले क्या कह रहे हो ? उनके स्वरों में मुझे अविश्वास सा लगा , शायद वे सोच रहे थे कि जिस काम के लिए लोग मुख्यमंत्री जी के पास गुहार लगा रहे हैं वो कैसे ये लोग सहज भाव से दे रहे हैं । अजातशत्रु जी बोले “ परिवहन विभाग में परिवहन आरक्षक के पद पर बिना सिफारिश तुम लोग इतनी सहजता से अनुकंपा पर नियुक्ति दे रहे हो , कमाल है , बहरहाल बढ़िया काम कर रहे हो , मैं मुख्यमंत्री जी को इस बाबत बता दूँगा । सो ऐसे हैं त्रिपाठी जी , जिनके लिए इस बात पर मानस की एक चौपाई स्मरण में आ रही है “ सोई सम्पदा विभीषन्ही सकुची दिए रघुनाथ” ।
ईश्वर उन्हें शतायु करें और ऐसे ही सदैव स्वस्थ व प्रसन्न रखें ।

मीडियावाला परिवार की ओर से त्रिपाठी साहब को हार्दिक बधाई

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