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पचमढ़ी पहुंचते ही याद आ जाएंगे भभूत सिंह…

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पचमढ़ी पहुंचते ही याद आ जाएंगे भभूत सिंह…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

नर्मदापुरम जिले में पचमढ़ी पर्यटकों का स्वर्ग है। पिपरिया से पचमढ़ी जाते समय पर्यटकों का स्वागत वन्य जीव अभयारण्य पचमढ़ी लिखा हुआ बड़ा एक बड़ा स्वागत द्वार करता है। अब इस स्वागत द्वार पर राजा भभूत सिंह का नाम जुड़ जाएगा। और लिखा जाएगा, राजा भभूत सिंह वन्यजीव अभयारण्य पचमढ़ी। यहां से पचमढ़ी तक की करीब 35 किलोमीटर की यात्रा पर्यटक भभूत सिंह को याद करते हुए तय करेंगे। मध्यप्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार की पचमढ़ी में कैबिनेट बैठक आयोजित करने का आंशिक लक्ष्य इससे हासिल हो गया है। इसके बाद पूरा आकाश खुला है, सरकार भभूत सिंह को घर-घर पहुंचाने की कवायद भी कर सकती है।

फिलहाल हम आज भभूत सिंह की चर्चा ही करते हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा है कि पचमढ़ी अभयारण्‍य अब “राजा भभूत सिंह पचमढ़ी अभयारण्य” के नाम से जाना जाएगा। यह राजा भभूत सिंह के पर्यावरण प्रेम और पचमढ़ी को विदेशी ताकतों से संरक्षित रखने के आजीवन अथक प्रयासों को समर्पित है। अभयारण्‍य में राजा भभूत सिंह के जीवन, संघर्ष, वीरता और योगदान से संबंधित जानकारी को प्रदर्शित किया जाएगा। यह कदम न केवल स्थानीय गौरव को बढ़ावा देगा बल्कि अभयारण्‍य की पहचान को भी मजबूत करेगा। यह क्षेत्र के ऐतिहासिक और प्राकृतिक महत्व का प्रतीक बनेगा।

 

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि राजा भभूत सिंह का आदिवासी समाज पर बहुत अधिक प्रभाव रहा है। उनकी वीरता के किस्से आज भी लोकमानस की चेतना में जीवंत हैं। राजा भभूत सिंह के योगदान को स्मरण करने के लिए मंत्रि-परिषद की बैठक पचमढ़ी में आयोजित की गई है। यह राजा भभूत सिंह के योगदान को समाज के सामने लाने का एक प्रयास है। राजा भभूतसिंह की वीरता और बलिदान को कोरकू समाज ने लोकगीतों और भजनों के माध्यम से जीवित रखा है। पचमढ़ी क्षेत्र के गाँवों, मंदिरों और लोक संस्कृति में आज भी उनकी गाथाएँ सुनाई जाती हैं। राजा भभूतसिंह न केवल एक योद्धा थे, बल्कि वे जनजातीय चेतना और आत्मसम्मान के प्रतीक बन चुके हैं। राजा भभूतसिंह की वीरगाथा, अंग्रेज अधिकारी एलियट की 1865 की सेटलमेंट रिपोर्ट में भी दर्ज है। राजा भभूतसिंह एक ऐसा नाम हैं, जो केवल कोरकू समाज का नहीं, पूरे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का गौरव है। उनका जीवन आदिवासी अस्मिता, देशभक्ति, और आध्यात्मिक शक्ति का जीवंत उदाहरण है। राजा भभूत सिंह का जीवन अनुकरणीय है, उनके बलिदान और शौर्य की गाथा को राष्ट्रीय पटल पर लाना हम सभी का नैतिक कर्तव्य है।

देवी अहिल्याबाई होल्कर हों या राजा भभूतसिंह, मध्यप्रदेश सरकार ने यह तय कर लिया है कि अतीत में भारत का गौरव रहे व्यक्तित्व को याद करते हुए समाज के सामने लाना है। और ऐसे कार्यक्रम लगातार करना है। इस माह जून में अनुसूचित जनजाति आधारित तीन सम्मेलन आयोजित किए जायेगे। डिण्डौरी के बजाग में 7 जून को बैगा सम्मेलन, बिरसा मुण्डा जन्म दिवस पर शहडोल के ब्यौहारी में 9 जून को कोल सम्मेलन और 18 जून को शिवपुरी के कोलारस में सहारिया सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा। जन-कल्याणकारी कार्यकाल के 11 वर्ष पूर्ण होने पर पूरे प्रदेश में 9 जून से 21 जून तक कार्यक्रम आयोजित किए जायेगे। इसके साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वायपेयी का जन्म शताब्दी वर्ष भी मनाया जाएगा।

तो पचमढ़ी की पहचान राजा भभूत सिंह हैं,यह अहसास यहां आने वाले लाखों पर्यटक जल्दी ही करने लगेंगे। और अब यह उम्मीद कर सकते हैं कि महान व्यक्तित्व प्रदेश में पहचान के मोहताज नहीं रह पाएंगे। और इनके साथ ही विरासत संग विकास की मध्यप्रदेेश की यात्रा जारी रहेगी…।