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Book Review: IAS अधिकारी भास्कर लाक्षाकार का कविता संग्रह- रामदास का मरना तय था- गहरे अर्थ सुझाती हर कविता

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Book Review: IAS अधिकारी भास्कर लाक्षाकार का कविता संग्रह- रामदास का मरना तय था- गहरे अर्थ सुझाती हर कविता

आनंद कुमार शर्मा

(भास्कर लक्षाकार वर्ष 2010 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। मध्यप्रदेश की माटी के इस कविहृदय अधिकारी का जन्म शिवपुरी जिले की खनियाधान तहसील का है। वर्तमान में वे मध्यप्रदेश शासन के कोष एवं लेखा विभाग के आयुक्त हैं और यह उनका पहला कविता संग्रह है, जो प्रशासनिक सेवा में आने के पूर्व से अब तक रची कविताओं का संकलन है)

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भास्कर के इस कविता संग्रह को मैं एक बारगी पढ़ गया था, सोचा था इस पर जाते ही लिखूँगा, पर तुरंत तो न लिख पाया। कविताएँ फिर पढ़ीं, सोचा अब लिखूँ, पर फिर रह गया। हर बार कविताएँ और गहरे अर्थ सुझाती हैं, इस कारण ही इतने दिनों बाद लिखने का साहस कर पा रहा हूँ।

कविताओं को पढ़ो और जानो कि ये किसी ऐसे शख़्स ने लिखी हैं जो भारतीय प्रशासनिक सेवा का अफ़सर है, तो यकीन नहीं होता। फिर फिर पढ़ो और फिर सोचो तो लगता है, ये वस्तुतः उपजी है उस गहन ऊष्मा से जो संस्कार के बीज में रोप दी गई थी बरसों बरस पहले। ये केवल वितृष्णा के अवसाद या प्रेम से उपजी पीड़ा का स्वर बस नहीं है, बल्कि गहन अंतस्चेतना का नाद है। तब लगता है ये भास्कर ने रचा है जो बाक़ी सब होने के अलावा है, एक आदमी जिसकी चेतना जाग्रत है।

शीर्षक जिस कविता से आया है इसे ही देखें “ रामदास का मरना तय था, हत्या चाहे जिस दिन हो, उसने गली ही वह पकड़ रखी थी, जो सीधी थी। सीधे सादे आदमी पे घटते प्रहार की कैसी मारक अभिव्यक्ति।

एक और कविता है “ईश्वर “ पहले उन्होंने ईश्वर बनाया, फिर उसकी पसंद नापसंद तय की, यहाँ तक कि ईश्वर के कपड़े भी उन्होंने चुने, फिर धीरे से उन्होंने बताया कि ईश्वर दरअसल चाहता है रक्त। मुझे यकायक लगा जैसे बरसों पहले के ओशो को सुन रहा हूँ। धर्म के ठेकेदारों को ललकारती ये कविता गहन विद्रोह और आत्मचेतना का संयुक्त प्रयास है।
“रक्त मूल्य” में भास्कर लिखते हैं, एक आदमी मरता है सड़क पर एक्सीडेंट में, एक मरता है बीजापुर के जंगलों में भिनभिनाती मक्खियों के बीच। एक आदमी मरता है सरहद पर किसी एक तरफ़ की गोली या पत्थर से। और तीनों तफ़ा आदमी मरता है एक। आदमी के आदमी होने और परिस्थिति के संयोग दुर्योग पर ग़ज़ब की बानगी है, कविता में।
कविता “ रफू” तो और ग़ज़ब है, जहाँ दुनिया में मूल्यों के ह्रास पर ग़ज़ब व्यंग्योक्ति है। राजनीति को भी उनकी कलम छोड़ती नहीं है, देखें, किसी ने कहा नहीं इस बार कि राजा नंगा है, आँखों में ही इशारा हुआ, या बहुत हद फुसफुसाहट हुई हो। विग्रह मंत्री ने आँखवालों को राजद्रोही घोषित किया।

“बादशाह सीढ़ियों पर“ में भास्कर लिखते हैं बादशाह लड़खड़ाया लेकिन गिरा नहीं, गिरने के लिए जगह अंदरूनी महलों में मुक़र्रर थी।

भास्कर से जब भी मैं मिला लगा नहीं कि इतना सब उसके अंतस् में खदबदाता रहा है, उसकी इस कविता की तरह। “कविता ऐसे छिपाई मैंने”

कविता ऐसे छिपाई मैंने,
जैसे स्वैरिणी छिपाती है अंतस् का प्रेम,
जैसे ययाति छुपाता है वार्धक्य,
जैसे ग्रंथ छुपाते हैं सत्य,
और महात्मा छुपाते हैं ईश्वर को।
श्रापित है मेरी कविता
जिसमें आशंका है अपने ही भतार को खाने की।

मुझे लगता है यही भास्कर का साहस और आत्मस्वीकारोक्ति है, सच के इस तूफ़ान की नाव खेने वाले नाविक के अंदेशे की तरह।

भास्कर की ये कविता संग्रह न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन के ज़रिए प्रकाशित है और इसे आप ले सकते हो इस लिंक के ज़रिए। https://www.amazon.in/dp/9364070747?ref=cm_sw_r_ffobk_cp_ud_dp_8J18VD351Z0P3K8035XT&ref_=cm_sw_r_ffobk_cp_ud_dp_8J18VD351Z0P3K8035XT&social_share=cm_sw_r_ffobk_cp_ud_dp_8J18VD351Z0P3K8035XT&bestFormat=true&previewDoh=1