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स्मृति शेष- बशीर बद्र: एक नाजुक लफ्ज शायर

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स्मृति शेष- बशीर बद्र: एक नाजुक लफ्ज शायर

राकेश अचल

पद्मश्री डॉ॰ बशीर बद्र नहीं रहे.. ये खबर ठीक वैसी लगी जैसे नौतपा में कोई बूढा बरगद जडों समेत उखड गया हो. बहुत कम लोग होते हैं जो अपने नाम को सार्थक कर पाते हैं. डा. बशीर बद्र ऐसे ही थे. शुभ सूचना देने वाले पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह.

डा. बशीर बद्र को यदि सुना न होता तो मुमकिन है कि मैं न ढंग का पत्रकार हो पाता और न कवि. बशीर साहब से मुहब्बत की एक वजह उनकी शायरी थी तो दूसरी वजह उनका जन्म 15 फरवरी 1936 को होना था. वे मेरे प्रिय कवि प्रो प्रकाश दीक्षित से 11 दिन पहले पैदा हुए थे. प्रकाश जी उनका जिक्र अपने हर जन्मदिन पर करते थे.

मुझे ठीक से याद नहीं कि मैने बशीर साहब को पहली बार कब सुना था, लेकिन मुमकिन है कि ये 1974 की बात हो. वे ग्वालियर व्यापार मेले के मुशायरों में आते ही थे. दूसरे मुशायरों में भी उनकी मौजूदगी होती थी. उनके खास तरह के श्रोता थे. रुमानियत से भरे, नौजवान और संघर्षरत. बशीर साहब शायद उन्ही के लिए लिखते थे.

बशीर बद्र साहब की शायरी में मोहब्बत थी, तिश्नगी थी, समझाइश थी और चेतावनी थी लेकिन उनकी शायरी में एक भी लफ्ज ऐसा न था जो आम आदमी की समझ में न आए. वे जदीद शायरी भी करते रहे और रिवायती शायरी भी. उन्हे पहचान दी प्रगतिशील शायरी ने.

बशीर साहब के शेर मीर, गालिब की तरह कालांतर में मुहावरे बने, कहावतों में इस्तेमाल किए गये. ये काम कम शायर ही कर पाए. वे न चीखकर पढते थे, न सीना पीटकर. उनका अंदाजे बयां बड़ा मखमली था. जदीद शायरी में बहुत से लोगों ने बशीर साहब की नकल की.वे किसी भी मुशायरे में पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह ही चमके. कभी मंद नहीं पड़े.

बशीर साहब को जो मुकाम, ईनाम, इकराम मिला वो उनकी शायरी का हासिल है, किसी की दया नहीं. बशीर साहब भी देश के उन गिने चुने शायरों में हमेशा शुमार किए जाएंगे जो फानी दुनिया से विदा होने के बाद भी जिंदा रहते हैं. सदियों तक बिना किसी सहारे के.

साहित्य और नाटक अकादमी में किए गये योगदानो के लिए उन्हें 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.वे सैयद थे. कानपुर के थे लेकिन होकर रह गए भोपाल के.देश के बाहर जहाँ भी गजल सुनी जाती है वहाँ बशीर साहब को सुना गया. कोई बीस मुल्कों में उनके चाहने वाले हैं.

उनके जो शेर मुहावरे बने उनमें से एक शेर मुझे हमेशा गुदगुदाता है. वे कहते हैँ –
सँवार नोक-पलक अबरुओं में ख़म कर दे,
गिरे पड़े हुए लफ़्ज़ों को मोहतरम कर दे.!
*
ग़ुरूर उस पे बहुत सजता है मगर कह दो,
इसी में उस का भला है ग़ुरूर कम कर दे.!!

बशीर साहब हमेशा विनम्रता के हामी रहे. उन्होने समझाइश दी और कहा-
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा
*
बशीर साहब को खिराजे अकीदत पेश करने के लिए मेरे पास कुछ नही है, इसीलिए मैं उनके ही शेर का इस्तेमाल करता हूँ.-

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलो तपाक से
ये नये मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो