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1971 की परछाई में भारत-बांग्लादेश: क्या इतिहास दोहराने जा रहा है खुद को..❓

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1971 की परछाई में भारत-बांग्लादेश: क्या इतिहास दोहराने जा रहा है खुद को..❓

▪️राजेश जयंत▪️

New Delhi: दक्षिण एशिया में इस समय जो घटनाक्रम चुपचाप आकार ले रहे हैं, वे केवल सरकार बदलने या चुनावी अस्थिरता तक सीमित नहीं हैं। बांग्लादेश में चल रही राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक उथल पुथल कई विशेषज्ञों को 1971 के पूर्व हालात की याद दिला रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब संघर्ष पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच था, और अब टकराव बांग्लादेश के भीतर उसकी पहचान, दिशा और सत्ता संरचना को लेकर है।

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▪️सत्ता परिवर्तन के बाद टूटा संतुलन

▫️शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में जो शून्य पैदा हुआ है, वह अब तक भरा नहीं जा सका है। अंतरिम शासन व्यवस्था, कमजोर प्रशासनिक पकड़ और सड़कों पर उतरती राजनीति ने राज्य की संस्थागत ताकत को कमजोर किया है। 1971 से पहले भी हालात कुछ ऐसे ही थे, जब केंद्र कमजोर और जनभावना बिखरी हुई थी। आज बांग्लादेश में सत्ता केवल संसद या सरकार के हाथ में नहीं दिखती, बल्कि सड़क, मस्जिद, मदरसा और सोशल मीडिया के बीच बंटी हुई नजर आती है।

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▪️इस्लामी राजनीति का खुला उभार

▫️पिछले कुछ वर्षों में जिन इस्लामी संगठनों को हाशिये पर माना जा रहा था, वे अब खुलकर राजनीतिक दावेदारी कर रहे हैं। जमात ए इस्लामी और उससे जुड़े संगठनों की वैचारिक वापसी केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि राज्य की प्रकृति बदलने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। 1971 में संघर्ष भाषा और पहचान का था। आज संघर्ष यह तय करने का है कि बांग्लादेश एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र रहेगा या धीरे धीरे एक इस्लामी राज्य की दिशा में बढ़ेगा।

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▪️अल्पसंख्यकों पर बढ़ता दबाव

▫️हिंदू, बौद्ध और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ बढ़ती घटनाएं केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं हैं। ये घटनाएं संकेत देती हैं कि समाज के भीतर डर और असुरक्षा की भावना गहराती जा रही है।

इतिहास गवाह है कि जब किसी देश में अल्पसंख्यकों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू होता है, तो वह केवल मानवाधिकार का नहीं बल्कि भूगोल बदलने का संकेत भी होता है। 1971 में यही हुआ था और करोड़ों शरणार्थी भारत आए थे।

 

▪️शरणार्थी संकट और भारत की चिंता

▫️यदि बांग्लादेश में हालात और बिगड़ते हैं, तो सबसे पहला असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल पर पड़ेगा। असम, त्रिपुरा, मेघालय और बंगाल पहले ही सीमित संसाधनों और संवेदनशील सामाजिक संतुलन से जूझ रहे हैं।

एक नया शरणार्थी प्रवाह केवल मानवीय संकट नहीं होगा, बल्कि भारत के आंतरिक सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को भी झकझोर देगा। यही वह बिंदु है जहां बांग्लादेश का संकट भारत के भूगोल और राजनीति को प्रभावित कर सकता है।

 

▪️बाहरी शक्तियों की सक्रिय भूमिका

▫️1971 में भी वैश्विक शक्तियां पर्दे के पीछे सक्रिय थीं। आज भी चीन, अमेरिका और खाड़ी देशों की दिलचस्पी बांग्लादेश में बढ़ी है। बंदरगाह, व्यापार मार्ग, समुद्री पहुंच और सैन्य प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज है।

यदि बांग्लादेश अंदर से कमजोर होता है, तो बाहरी शक्तियों का दखल बढ़ना तय है। यह स्थिति भारत की पूर्वी सीमाओं के लिए एक नई रणनीतिक चुनौती खड़ी कर सकती है।

 

▪️क्या वाकई विभाजन संभव है

▫️यह कहना जल्दबाजी होगी कि बांग्लादेश का औपचारिक विभाजन तय है। लेकिन यह कहना भी आंख मूंद लेना होगा कि हालात सामान्य हैं।

राज्य की कमजोर पकड़, वैचारिक ध्रुवीकरण, धार्मिक राजनीति और संभावित शरणार्थी संकट मिलकर एक ऐसा दबाव बना रहे हैं, जो आने वाले पांच वर्षों में किसी बड़े भू राजनीतिक परिवर्तन का कारण बन सकता है।

विभाजन हमेशा नक्शे पर खींची गई रेखाओं से नहीं होता। कई बार वह प्रभाव क्षेत्रों, जनसंख्या संतुलन और राजनीतिक प्रभाव के जरिए होता है।

 

▪️भारत के भूगोल पर संभावित असर

▫️यदि बांग्लादेश अस्थिर होता है, तो भारत के लिए चुनौती केवल सीमा सुरक्षा की नहीं होगी। जनसांख्यिकीय दबाव, आंतरिक राजनीति, संसाधनों का बंटवारा और सामाजिक संतुलन सीधे प्रभावित होंगे। इस अर्थ में यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर बांग्लादेश में 1971 जैसे हालात दोहराए जाते हैं, तो इस बार उसका असर केवल ढाका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दिल्ली तक महसूस किया जाएगा।

 

▪️और अंत में••

▫️बांग्लादेश आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यह मोड़ उसे स्थिर लोकतंत्र की ओर भी ले जा सकता है और लंबे अराजक दौर में भी धकेल सकता है।

इतिहास बताता है कि जब सामाजिक असंतोष, वैचारिक उग्रता और कमजोर शासन एक साथ मिलते हैं, तो नक्शे बदलने में देर नहीं लगती।

यह कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि मौजूदा हालात से निकलती एक चेतावनी है।