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क्या मध्य प्रदेश अपने ही शहरों की उड़ान रोक रहा है? मास्टर प्लान की देरी, महंगे स्टाम्प शुल्क और थमा शहरी विकास — इंदौर-भोपाल को वर्टिकल ग्रोथ की ज़रूरत

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क्या मध्य प्रदेश अपने ही शहरों की उड़ान रोक रहा है? मास्टर प्लान की देरी, महंगे स्टाम्प शुल्क और थमा शहरी विकास — इंदौर-भोपाल को वर्टिकल ग्रोथ की ज़रूरत

के के झा की विशेष रिपोर्ट

इंदौर और भोपाल — मध्य भारत की विकास गाथा के दो प्रमुख अध्याय। एक, जो लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर बनकर नई पहचान गढ़ रहा है; दूसरा, जो प्रशासनिक राजधानी होने के कारण नीति निर्माण का केंद्र है। दोनों शहरों में प्रतिभा है, निवेश की क्षमता है, जनसंख्या का दबाव है और विस्तार की आकांक्षा भी।

लेकिन सवाल सीधा है — क्या इन शहरों का शहरी विकास उनकी संभावनाओं की गति से चल रहा है, या नीतिगत सुस्ती उनकी उड़ान रोक रही है?

मास्टर प्लान: दिशा के बिना विकास

किसी भी शहर का मास्टर प्लान उसका भविष्य-मानचित्र होता है। यही तय करता है कि कहाँ आवास होगा, कहाँ उद्योग, कहाँ हरित क्षेत्र, कहाँ परिवहन कॉरिडोर।

भोपाल का मास्टर प्लान वर्षों से संशोधन की प्रतीक्षा में है। इंदौर का मास्टर प्लान 2021 के बाद से नए स्वरूप का इंतजार कर रहा है। जब विकास का आधार दस्तावेज ही समय पर अपडेट न हो, तो निवेशक दीर्घकालिक रणनीति कैसे बनाएँ?

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मास्टर प्लान की अनुपस्थिति या देरी का सीधा असर दिखता है — परियोजनाएँ अटकती हैं। अनुमतियाँ लंबित रहती हैं। भूमि उपयोग पर अस्पष्टता बनी रहती है और निवेशक वैकल्पिक राज्यों की ओर रुख कर लेते हैं। हाल ही में इंदौर में आयोजित IMA Conclave में देश के अग्रणी रियल एस्टेट डेवलपर निरंजन हीरानंदानी ने इसी चिंता को सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया।

उन्होंने स्पष्ट कहा — “नीतियाँ बनाना पर्याप्त नहीं है, उन्हें समयबद्ध तरीके से लागू करना ज़रूरी है। जब तक मास्टर प्लान अपडेट नहीं होंगे और जमीन पर स्पष्टता नहीं होगी, तब तक निवेशक पूरी तरह भरोसा नहीं करेंगे।” हिरानंदानी, जो NAREDCO के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, ने यह भी जोड़ा कि मध्य प्रदेश में स्टाम्प ड्यूटी की ऊँची दरें रियल एस्टेट गतिविधियों की गति को सीमित कर रही हैं।

उनके शब्दों में — “यदि स्टाम्प ड्यूटी दरें व्यावहारिक हों, तो लेन-देन बढ़ेगा और अंततः राज्य को अधिक राजस्व प्राप्त होगा।”

पड़ोसी राज्यों से सीख

यदि तुलना करें तो महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों ने समयबद्ध मास्टर प्लान, डिजिटल अनुमोदन प्रणाली और वर्टिकल ग्रोथ को अपनाकर अपने शहरों को नई दिशा दी है।

मुंबई और पुणे में ऊँची इमारतों की अनुमति देकर सीमित भूमि का अधिकतम उपयोग किया गया। परिणाम — आवासीय आपूर्ति में वृद्धि, व्यावसायिक स्पेस का विस्तार तथा बड़े पैमाने पर निवेश। गुजरात में सिंगल-विंडो क्लीयरेंस और स्पष्ट शहरी नीतियों ने निवेशकों का विश्वास मजबूत किया।

इसके विपरीत, मध्य प्रदेश में अनुमतियों की जटिल प्रक्रिया और मास्टर प्लान की देरी विकास की रफ्तार को धीमा करती दिखती है।

वर्टिकल ग्रोथ: समय की मांग

इंदौर और भोपाल का क्षैतिज विस्तार तेजी से बढ़ रहा है। शहर दूर-दूर तक फैल रहे हैं। इसका सीधा असर है: बढ़ता ट्रैफिक और लंबी यात्रा दूरी। बुनियादी ढांचे पर अधिक लागत। कृषि और हरित भूमि का क्षरण तथा बढ़ता कार्बन फुटप्रिंट
यदि सरकार नियंत्रित, वैज्ञानिक और सुरक्षित ढांचे के साथ वर्टिकल डेवलपमेंट को बढ़ावा दे — FAR (Floor Area Ratio) में तर्कसंगत वृद्धि करे, अग्नि और संरचनात्मक सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू करे, और आधुनिक हाई-राइज परियोजनाओं को प्रोत्साहित करे तो कम भूमि में अधिक आवास उपलब्ध होंगे, शहरी फैलाव नियंत्रित होगा और निवेश तथा रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। मुंबई, हैदराबाद और गुरुग्राम जैसे शहरों ने यही मॉडल अपनाकर आर्थिक गतिविधियों को नई ऊँचाई दी है।

स्टाम्प ड्यूटी: राजस्व बनाम विकास

आर्थिक सिद्धांत स्पष्ट कहता है — अत्यधिक कर दरें लेन-देन को हतोत्साहित करती हैं। यदि स्टाम्प ड्यूटी दरें अधिक हों, तो संपत्ति पंजीकरण कम होते हैं। अनौपचारिक लेन-देन की प्रवृत्ति बढ़ती है तथा बाजार की गति धीमी पड़ती है।
जबकि तार्किक और संतुलित दरें अधिक पंजीकरण और व्यापक कर आधार सुनिश्चित कर सकती हैं।

हीरानंदानी ने इसी संदर्भ में कहा — “उच्च स्टाम्प ड्यूटी अल्पकालिक राजस्व तो दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह बाजार की गति को सीमित करती है।”

आगे का रास्ता: निर्णय की घड़ी

मध्य प्रदेश के सामने अवसर है —मास्टर प्लान को समयबद्ध तरीके से अंतिम रूप देना। वर्टिकल विकास को स्पष्ट नीति समर्थन देना। अनुमतियों की प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाना तथा स्टाम्प ड्यूटी संरचना की पुनर्समीक्षा करना।
इंदौर यदि स्वच्छता में देश का नंबर वन बन सकता है, तो क्या वह नियोजित शहरी विकास में भी मिसाल नहीं बन सकता?

भोपाल यदि प्रशासनिक राजधानी है, तो क्या वह शहरी प्रबंधन का मॉडल नहीं बन सकता? नीतियाँ घोषणाओं से नहीं, क्रियान्वयन से प्रभावी बनती हैं।

अब सवाल सरकार के सामने है —क्या वह देरी की संस्कृति से बाहर निकलकर विकास की ऊँचाइयों को स्वीकार करेगी, या मध्य प्रदेश अपने ही शहरों की उड़ान सीमित करता रहेगा?

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(लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)