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4 मई विशेष: Memories: Prabhu Joshi-“वे सिर्फ मनुष्य नहीं, साहित्य, कला और करुणा की त्रिवेणी थे।”

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4 मई विशेष: Memories: Prabhu Joshi-“वे सिर्फ मनुष्य नहीं, साहित्य, कला और करुणा की त्रिवेणी थे।”

 डॉ. तेजप्रकाश पूर्णानंद व्यास

जब कोई दिव्य आत्मा पंचभूत में विलीन होती है, तो केवल उसका शरीर मिटता है, स्मृतियाँ नहीं। 4 मई 2021—इस दिन हमसे बिछुड़ गए एक ऐसे विराट व्यक्तित्व, जिनकी लेखनी में गाँव की मिट्टी की सोंधी गंध थी, और चित्रों में मानव चेतना की गहराइयाँ। प्रभु जोशी—पीपलरावां की उस पवित्र माटी में जन्मे जहां मां सरस्वती स्वयं वीणा लेकर विचरती हों, ऐसे कलाकार  आज भी हमारी स्मृति में जीवंत हैं।

मेरा सौभाग्य है कि मैं उन्हें केवल एक लेखक या चित्रकार के रूप में नहीं, अपितु बाल्यकाल से एक अंतरंग मित्र, सहयात्री और आत्मीय के रूप में जानता रहा। पीपलरावां जैसे छोटे गाँव से निकलकर उन्होंने साहित्य और चित्रकला के अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर अपनी अमिट छवि छोड़ी।

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उनकी पहली कहानी ‘किस हाथ से’ धर्मयुग में 1973 में प्रकाशित हुई, और उसके बाद ‘उत्तम पुरुष’ तथा ‘प्रभु जोशी की लंबी कहानियाँ’ जैसे संग्रहों ने हिंदी कथा-साहित्य को नई दृष्टि दी। वे केवल कथाकार नहीं थे, वे संवेदना के सच्चे प्रतिनिधि थे। उनकी रचनाएँ जन-संवेदना की पीड़ा और सौंदर्य को एक साथ अभिव्यक्त करती हैं।

प्रभु जोशी ने नई दुनिया जैसे प्रतिष्ठित पत्र में फीचर और संपादकीय पृष्ठों का वर्षों तक सफल संपादन किया। पर उनका वास्तविक परिचय केवल पत्रकार या लेखक के रूप में नहीं है—वे विचारों के हिमालय, और करुणा, कृतज्ञता व मानवीय मूल्यों के जीवंत प्रतीक थे।

चित्रकला में उनकी विशिष्टता जलरंगों में रही। लिंसिस्टोन और हरबर्ट (ऑस्ट्रेलिया) की त्रिनाले में उनके चित्र प्रदर्शित हुए, और अमेरिका की प्रतिष्ठित गैलरी फॉर कैलिफोर्निया द्वारा उन्हें थॉमस मोरान अवॉर्ड से नवाजा गया। ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी गैलरी, न्यूयॉर्क की टॉप 70 सूची में उनका नाम आना, उनकी सृजनात्मक ऊँचाइयों का वैश्विक प्रमाण है।

भारत भवन, म.प्र. साहित्य परिषद और संस्कृति विभाग द्वारा मुक्तिबोध फैलोशिप जैसे सम्मान उनके साहित्यिक और कलात्मक योगदान का प्रमाण हैं। रेडियो प्रसारण में भी उन्होंने युगांतरकारी कार्यक्रम बनाए—धूमिल, मुक्तिबोध, सल्वाडोर डाली, पिकासो, कुमार गंधर्व और उस्ताद अमीर खां जैसे व्यक्तित्वों पर केंद्रित कार्यक्रमों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

उनके रेडियो कार्यक्रम After All How Long को बर्लिन की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में विशेष जूरी पुरस्कार प्राप्त हुआ। ‘इम्पैक्ट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ऑन ट्राइबल सोसायटी’ पर किया गया उनका अनुसंधान ऑडियंस रिसर्च विंग द्वारा सम्मानित हुआ।

2010 में जब उन्होंने शासकीय महाराजा भोज महाविद्यालय में, मेरे प्राचार्यत्व काल में, विद्यार्थियों को जो प्रेरणास्पद व्याख्यान दिया, वह आज भी विद्यार्थियों के हृदय में स्पंदित है।

वे साक्षात सरस्वती के वरद पुत्र थे। उनकी वाणी में चमत्कार था, और उनके विचारों में युगदृष्टा की दृष्टि। दया, करुणा, प्रसन्नता और परोपकार उनके स्वभाव की सहज वृत्तियाँ थीं। वे जहाँ भी जाते, वहाँ प्रकाश ही फैलाते।

आज जब वे शारीरिक रूप से हमारे साथ नहीं हैं, तब भी उनकी स्मृतियाँ, उनकी रचनाएँ, उनके चित्र और उनके विचार—हमारी चेतना में दीप की तरह जलते हैं।